मुजफ्फरनगर: ‘हम न होते तो मोदी जी भी नहीं बन पाते पीएम’ कहने वालों के होंगे मुकदमे वापस !

मुजफ्फरनगर दंगे के आरोपियों के मुकदमे वापस लिए जाने की अटकलों के बीच कुछ ऐसी बातें सामने आ रही हैं, जिनसे ध्रुवीकरण की आशंका तेज हो गई है।

फोटो सोशल मीडिया
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आस मोहम्मद कैफ

मुज़फ्फरनगर से बीजेपी सांसद संजीव बालियान के एक करीबी अक्सर अपने मित्रों में यह गुणगान करते रहते है कि कैसे उन्होंने मुज़फ्फरनगर दंगे से ध्रुवीकरण किया। उनका दावा होता है कि, “हम यहां ध्रुवीकरण के चाणक्य हैं। हम न होते तो फिर कोई मुल्ला यहां से सांसद होता और केंद्र में मोदी जी भी पीएम न होते।” वो कहते हैं कि, “हम यहां सत्ता के बदलाव की सबसे बड़ी वजह हैं।”

यह बात हमें असद फारूकी बताते हैं। वो यह भी कहते हैं कि, “संजीव बालियान को मंत्री पद से हटाये जाने के बाद यह बात सिर्फ ड्राइंग रूम तक सीमित हो गयी है। पहले यह बात चौराहे -चौराहे होती थी। आप यहां जाटों को गहराई से सुनोगे तो आपसे कह ही देंगे, भाईजी हम सरकारें बदल देते हैं, जैसे 2013 में बदल दी थी।”

पिछले कुछ समय से जाटों को एक सवाल बेचैन कर रहा है कि दंगे से उन्हें हासिल किया हुआ। इसी बेचैनी में यहां कई समूह दंगों में समझौते की पहल कर रहे है ! मगर मुक़दमे वापसी की चर्चाओं के बीच पिघलती हुई बर्फ फिर जमने लगी है। करीब आते जाट और मुस्लिमों की नजदीकी फिर किसी को तकलीफ देने लगी है ! फ़िज़ा में फिर नफरत का गुब्बारा फोड़ा जा सकता। हाल के कुछ दिनों से यहां जाट नेतृत्व में शह और मात का एक खेल चल रहा है।

इसी मंगलवार को बीजेपी नेताओं के एक समूह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात की है, और उनसे तमाम जाटों पर दर्ज मुक़दमे वापस लेने का आग्रह किया है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सांसद संजीव बालियान ने किया। उन्होंने मुज़फ्फरनगर दंगो में जाटों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे वापस लेने की बात कही। बकौल संजीव बालियान, “मुज़फ्फरनगर दंगों में लगभग 402 मुक़दमे फर्जी दर्ज किये गए और 1400 के आसपास बेगुनाह लोग जेल भेज दिए गए। पहले की सरकार ने मुसलमानो को खुश करने के लिए ऐसा किया, अब हम चाहते है कि नई सरकार इन मुकदमो को वापस ले।”

इससे पहले पिछले माह सरकार ने कुछ बीजेपी नेताओं के मुक़दमे वापस लेने की शुरुआती हलचल की थी, बाद में इसका भारी विरोध हुआ और जाटों ने ही इसके खिलाफ प्रतिक्रिया दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने वाले इस प्रतिनिधिमण्डल में सांसद संजीव बालियान के साथ बुढ़ाना विधायक उमेश मलिक भी थे। इन दोनों का नाम मुकदमे वापसी वाली सूची में था।

पूर्व विधायक पंकज मलिक के मुताबिक यह पूरे जाट समुदाय का प्रतिनिधिमंडल नहीं था, बल्कि दंगो में आरोपी बनाए गए या बीजेपी से सहमत लोगों का एक समूह था। उनका कहना है कि , “इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। अगर उन्हें लगता है कुछ गलती हुई है तो उनकी सरकार को यह आज ही याद क्यों आया है?”

दरअसल मुज़फ्फरनगर दंगो का जिन्न एक बार फिर बाहर निकल आया है। वैसे इसकी शुरुआत दो महीने पहले मुलायम सिंह यादव ने अपने आवास पर एक बैठक बुलाकर की थी। इस बैठक में जाटों और मुसलमानों के कुछ जिम्मेदार लोगों के बीच आपसी सुलह समझौते की बात कही गयी। एक समिति बनाई गई, जिसको मुज़फ्फरनगर में जाकर दोनों पक्षो से बात कर बीच का रास्ता निकालने का काम दिया गया। इस पहल से विपिन बालियान का नाम जुड़ा था, और उनको गुलाम मोहम्मद जोला सहित कई बड़े नामो का समर्थन मिला। इनमें पूर्व सांसद क़ादिर राणा और पूर्व सांसद अमीर आलम भी शामिल रहे। इस समिति ने दंगा पीड़ितों के बीच जाकर बात की, जहां सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रिया मिली।. ज्यादातर लोगो का मानना था कि जाट और मुसलमानों, दोनों पक्षों को एक साथ बैठकर आपस के सभी मुक़दमे वापस लेने चाहिए और पहले जैसी बात दिल साफ़ कर कायम करनी चाहिए।

गाँव गाँव जाकर यह बात बताई जा रही थी, कि पिछले माह मुक़दमे वापसी की कार्यवाही होने लगी। इसमें कुछ बीजेपी नेताओं के नाम थे। इसके बाद जगह जगह इस कार्रवाई का विरोध हुआ। सूत्रों का कहना है कि तीखी आलोचना और विरोध देखकर इसे टाल दिया गया। तब सिर्फ बीजेपी नेताओं के मुक़दमे वापस होने की बात थी। अब जाटों के 402 मुक़दमे वापस करने की मांग की गयी है।

इस सिलसिले में एडवोकेट अब्दुल्लाह आरिफ कहते हैं, “इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बीजेपी किस स्तर पर जाकर राजनीति करती है।" उन्होंने सवाल पूछा कि, “क्या दंगा पीड़ितों ने अपने घरों में खुद आग लगा ली और खुद मर गए? बेहतर होता ये लोग भाईचारे की बात करते।”

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