पेड़ों-पहाड़ों के संरक्षक सुंदरलाल बहुगुणा का कोरोना से निधन, चिपको समेत कई आंदोलनों का किया नेतृत्व

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 1927 में उत्तराखंड के टिहरी के पास मरोदा में हुआ था। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बाद में 1965 से 1970 तक राज्य की महिलाओं को शराब विरोधी अभियानों में संगठित करना शुरू किया। उन्होंने चिपको समेत कई आंदोलनों का नेतृत्व किया।

फोटोः @aradhanam7000
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आसिफ एस खान

चिपको आंदोलन का पर्याय रहे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का शुक्रवार को 94 वर्ष की आयु में कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया। बहुगुणा एक समर्पित पर्यावरणविद् थे, जिन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए चिपको आंदोलन समेत कई आंदोलन खड़े किए और लंबी लड़ाई लड़ी।

सुंदरलाल बहुगुणा को 8 मई को कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया था, जहां वरिष्ठ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था। लेकिन बहुगुणा की कल रात से हालत गंभीर थी और ऑक्सीजन का स्तर गिर जाने के कारण उन्हें आईसीयू में स्थानांतरित कर दिया गया था। एम्स के निदेशक रविकांत ने शुक्रवार को बताया कि उन्होंने आज दोपहर 12.05 बजे अंतिम सांस ली।

दिग्गज पर्यावरणविद् के निधन पर कांग्रेस ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी है। पार्टी ने ट्वीट कर कहा, "पर्यावरण के रखवाले और प्रकृति के प्रहरी मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा जी का निधन एक बड़ी क्षति है। पर्यावरण के संरक्षण में उनका योगदान अविस्मरणीय है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।"


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शोक संदेश में ट्वीट किया, "श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी का निधन हमारे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने के हमारे सदियों पुराने परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी सादगी और करुणा की भावना को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और कई प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।" उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत ने कहा, "यह एक बड़ी क्षति है, क्योंकि उन्होंने चिपको को जनता का आंदोलन बनाया।"

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 1927 में उत्तराखंड के टिहरी के पास मरोदा में हुआ था। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बाद में 1965 से 1970 तक राज्य की महिलाओं को शराब विरोधी अभियानों में संगठित करना शुरू किया। उन्होंने पहले चिपको आंदोलन के नेता के रूप में हिमालय में जंगलों के संरक्षण के लिए लड़ाई लड़ी और एक दशक बाद टिहरी बांध विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्हें हमेशा एक पर्यावरण के रखवाले के रूप में याद किया जाता रहेगा।

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