पंजाबः कोरोना ने हिला दी सामाजिक ताने-बाने की नींव, अपनों का शव लेने से भी मना कर रहे लोग

कोरोना वायरस के खौफ ने पंजाब में प्राकृतिक मौत मरने वालों के ‘अंतिम सफर’ को भी बेहद मुश्किल बना दिया है। कहीं अर्थियों को चार कंधे नसीब नहीं हो रहे, तो कहीं मृतक को चिता नहीं मिल रही। करोना को तो देर-सबेर जाना ही है लेकिन ये कटु स्मृतियां कभी नहीं जाएंगी।

फोटोः अमरीक
फोटोः अमरीक
user

अमरीक

कोरोना वायरस का संकट अर्थव्यवस्था को तो तबाह कर ही रहा है, सामाजिक ताने-बाने की बुनियादें भी हिला रहा है। पंजाीब में इस वायरस से पीड़ितों की संख्या पंजाब 79 हो चली है और अब तक राज्य में इस महामारी से 8 लोगों की मौत हो चुकी है। समूचा सूबा कड़े कर्फ्यू की जद में है। रोज ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जो साफ संकेत देती हैं कि वायरस सामाजिक स्तर पर किस तरह उथल-पुथल मचा रहा है।

कहीं परिजन शव लेने से इंकार कर रहे हैं तो कहीं श्मशान घाट पर ताला लगा दिया जाता है ताकि वायरस से मरी देह को वहां जलाया न जा सके। बेशुमार गांवों में ग्रामीणों ने खुद नाकेबंदी की हुई है कि कोई बाहरी शख्स उनके गांव की हद में प्रवेश न कर पाए। वायरस के खौफ से लोग खुदकुशी कर रहे हैं। मानसिक रोगियों की तादाद में जबरदस्त इजाफा हुआ है।

इन सबके बीच सोशल मीडिया के जरिये फैल रही फिरकापरस्ती के जहर ने अमन और सद्भाव के लिए मशहूर पंजाब में भी रंग दिखाना शुरू कर दिया है। वर्षों से दूध का काम कर रहे और स्थानीय लोकाचार का हिस्सा बन चुके मुस्लिम गुर्जरों को निशाना बनाया जा रहा है। कर्फ्यू के दौरान गली-मोहल्लों में रेहड़ी पर सब्जियां-फल बेचने वालों से उनका मजहब पूछा जा रहा है। मुनाफाखोर और कालाबाजारिये इस आलम में भी मानवता को पीठ दिखा रहे हैं।

ऐसी ही एक इंसानी रिश्तों को शर्मसार करने वाली घटना लुधियाना में देखने को मिली है। 7 अप्रैल को शहर के शिमलापुरी मोहल्ले की रहने वाली 69 वर्षीया सुरेंद्र कौर का कोरोना वायरस से निधन हुआ तो उनके भरे-पूरे (खाते-पीते) परिवार ने शव लेने से भी साफ इंकार कर दिया। आखिरकार ड्यूटी मजिस्ट्रेट तहसीलदार जगसीर सिंह ने सुरेंद्र कौर की मृत देह रिसीव की। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस कर्मचारियों को साथ लेकर उन्होंने शव अनाज मंडी स्थित श्मशान घाट पहुंचाया। परिजन सौ मीटर दूर गाड़ियों में बैठे रहे।

सुरेंद्र कौर के बेटे से प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि दूर से ही कोई रस्म करनी हो तो कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए भी कोई तैयार नहीं हुआ। शव को चिता तक पहुंचाया गया। दोबारा परिवार के सदस्यों को कहा गया कि मुखाग्नि के लिए कोई व्यक्ति आगे आना चाहे तो उसे पीपीई किट डालकर भेजा जाएगा। साथ ही मुखाग्नि देने के लिए 12 फुट लंबा बांस मुहैया करवाया जाएगा, लेकिन इतने आश्वासनों के बाद भी कोई तैयार नहीं हुआ। आखिरकार प्रशासन की ओर से श्मशान घाट के माली को इस काम के लिए तैयार किया गया और उसने सबके रहते 'लावारिस' बना दी गईं सुरेंद्र कौर का अंतिम संस्कार किया।

बदनसीब सुरेंद्र कौर की अंतिम अरदास का जिम्मा भी तीन अधिकारियों, एडीसी इकबाल सिंह संधू, एसडीएम अमरिंदर सिंह मल्ली और डीपीआरओ प्रभदीप सिंह नत्थोवाल ने उठाया है। एडीसी संधू के मुताबिक गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह में श्री अखंड पाठ साहिब का प्रकाश करवाया जाएगा और शनिवार को अंतिम अरदास होगी। तीनों अधिकारी इसका तमाम खर्च अपनी जेब से करेंगे।गौरतलब है कि मृतका सुरेंद्र कौर लोक इंसाफ पार्टी के नेता विधायक सिमरजीत सिंह बैंस के जीजा की चाची हैं।

पंजाबः कोरोना  ने हिला दी सामाजिक ताने-बाने की नींव, अपनों का शव लेने से भी मना कर रहे लोग

इसी तरह 5 दिन पहले जब हजूरी रागी पद्मश्री निर्मल सिंह खालसा की कोरोना वायरस से मौत हुई तो उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए अमृतसर के वेरका श्मशान घाट लाया गया, लेकिन स्थानीय पार्षद ने श्मशान घाट के गेट पर ताला लगवा दिया। आखिरकार निर्मल सिंह खालसा का अंतिम संस्कार शामलाट जमीन पर किया गया। निर्मल सिंह खालसा विश्व प्रसिद्ध रागी थे और प्रख्यात गजल गायक गुलाम अली के शागिर्द रहे थे। वह कई बरस तक श्री स्वर्ण मंदिर साहिब के हजूरी रागी रहे। 500 शब्द वह पक्के रागों पर गाते थे। उनकी कैसेट/सीडी 'आसा दी वार' की अब तक 70 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं।

भारत सरकार ने निर्मल सिंह खालसा को पद्मश्री से नवाजा था और उन्हें 'पंथ का अनमोल हीरा' कहा जाता था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनका परिवार उनके मुरीदों में शुमार है। ऐसे गुरबाणी के गहरे विद्वान और विलक्षण गायक निर्मल सिंह खालसा को मौत के बाद श्मशान घाट में दो गज जमीन भी मयस्सर नहीं हुई और वो सिर्फ इसलिए कि वेरका के लोगों का तर्क था कि उन्हें यहां अग्निभेंट किया गया तो संक्रमण फैल जाएगा। प्रशासनिक और चिकित्सा अधिकारियों ने बेहद समझाया कि ऐसा बिल्कुल नहीं होता लेकिन लोग नहीं माने।

पूरा पंजाब इस वक्त कर्फ्यू की जद में है। जगह-जगह पुलिस के साथ सीआरपीएफ और अन्य अर्द्धसैनिक बल भी तैनात हैं। जिलेवार सीमाएं सील हैं। फिर भी हजारों गांवों में ग्रामीणों ने अपने-अपने तौर पर नाकेबंदी की हुई है। पड़ोसी गांव के शख्स को भी नहीं आने दिया जाता। वे लोग भी खासे परेशान होते हैं जो मजबूरी के चलते बाहर निकलते हैं और नाकेबंदी वाले गांवों से होकर अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं।

पंजाबः कोरोना  ने हिला दी सामाजिक ताने-बाने की नींव, अपनों का शव लेने से भी मना कर रहे लोग

ऐसे तमाम नाकों पर नौजवान बैठे मिलते हैं। ज्यादातर ने इन गैरकानूनी नाकों को 'रौब का अड्डा' बना लिया है। गांव स्तर की यह नाकेबंदी सामुदायिक एकता छिन्न-भिन्न कर रही है। इस कर्फ्यू से पहले पंजाब में 1984 में कर्फ्यू झेला था। तब सामाजिक दूरी इस कदर नहीं थी, जैसी आज है। बेशक ये संक्रमण के खतरे के चलते है। लोग मजबूरी के एकांतवास में हैं।

पेशे से नामवर चिकित्सक और पटियाला से पूर्व सांसद डॉक्टर धर्मवीर गांधी के अनुसार कोरोना वायरस ने राज्य में मानसिक रोगियों की तादाद में बेहिसाब इजाफा किया है। इसी हफ्ते वायरस से खौफजदा तीन लोगों ने खुदकुशी की। जबकि उन्हें कोरोना तो क्या कोई मामूली बीमारी भी नहीं थी। तीनों के सुसाइड नोट से यह जाहिर हुआ कि उन्होंने वायरस होने की आशंका से डरकर आत्महत्या की। जालंधर के एक नौजवान ने 7 अप्रैल को खुदकुशी की कोशिश की। वजह, मौजूदा हालात में दरपेश हुई बेरोजगारी! उक्त नौजवान दिहाड़ीदार मजदूर है और उसका मकान मालिक उस पर किराए के लिए दबाव बनाए हुए था। अब वह नौजवान अस्पताल में इलाजरत है।

दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के प्रकरण के बाद सोशल मीडिया के जरिये फैल रही सांप्रदायिक नफरत का जहर पंजाब में खासा नागवार असर दिखा रहा है। सूबे के कई बाशिंदों ने मरकज में शिरकत की थी। उनकी गहन चिकित्सीय जांच की जा रही है। लेकिन इस बीच उन्मादी लोग पंजाब में वर्षों से दूध का कारोबार करते आ रहे मुस्लिम गुर्जरों को निशाना बना रहे हैं, जबकि इन मुस्लिम गुर्जरों का मरकज से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। कई जगह मुस्लिम गुर्जरों का सार्वजनिक बहिष्कार किया जा रहा है और उन्हें आने नहीं दिया जा रहा।


आलम यह है कि वे अपना दूध नहरों-नालों में बहाने को मजबूर हैं। होशियारपुर के तलवाड़ा इलाके के कई गांवों में गुर्जरों के घूमने-फिरने पर कट्टरपंथियों ने पाबंदी लगा दी है। वहां के एक वरिष्ठ पत्रकार दीपक ठाकुर बताते हैं कि कई जगह गुर्जरों के 'डेरों' को घेरकर उनसे मारपीट की गई। सोमवार को तलवाड़ा और हाजीपुर गांव के नूर हुसैन, मीरो सुपुरा, शरीफ मोहम्मद, वीरू, आलमदीन, राणू और साईं मोहम्मद को पीटा गया। तलवाड़ा की बीबीएमबी कॉलोनी में दूध बेचने गए फरमान अली, नूर और अली हुसैन से बदसलूकी की गई।

ये लोग लंबे अरसे से इस कॉलोनी में दूध बेचते रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया के जरिये फैल रही नफरत ने इनका कारोबार बंद करवा दिया है। पशुओं के लिए चारा भी नहीं मिल रहा। तलवाड़ा के निकटवर्ती गांव कमलूह में भी मुस्लिम गुर्जरों को पीटा गया और उन्हें चले जाने को कहा गया। होशियारपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौरव गर्ग के मुताबिक इन तमाम घटनाओं की उन्हें फौरी तौर पर कोई जानकारी नहीं है।

गौरतलब है कि मूलतः कश्मीर के रहने वाले मुस्लिम गुर्जर कई दशकों से पंजाब में सपरिवार दूध का कारोबार कर रहे हैं और उन्हें इस तरह के हालात का कभी सामना नहीं करना पड़ा। राज्य के हर कोने में इनके 'डेरे' हैं। स्थानीय लोगों में ये अच्छी तरह रचे-बसे हुए हैं। पंजाब सांप्रदायिक अमन-सद्भाव के लिए भी जाना जाता है। कोरोना वायरस और तबलीगी जमात के मरकज प्रकरण ने एक बेहद नागवार असर यह दिखाया है कि कई जिलों से ऐसी खबरें हैं कि लोग-बाग गलियों-मोहल्लों में फल-सब्जियां बेचने वालों से उनका मजहब पूछ रहे हैं। जिला कपूरथला की एक पॉश कॉलोनी में इस पत्रकार ने खुद यह देखा-सुना। यानी इंसानियत तार-तार हो रही है और सूबे का इकबाल भी!

पंजाबः कोरोना  ने हिला दी सामाजिक ताने-बाने की नींव, अपनों का शव लेने से भी मना कर रहे लोग

देशव्यापी लॉकडाउन और पंजाब में जारी कर्फ्यू ने प्राकृतिक मौत मरने वालों के 'अंतिम सफर' को भी बेहद मुश्किल बना दिया है। कहीं अर्थियों को चार कंधे नसीब नहीं हो रहे। ऐसे में कई जगह पुलिस के लोग इस काम के लिए आगे आ रहे हैं तो इसके लिए जरूरी मानी जाने वाली पूजा-सामग्री का अभाव है। बेशुमार लोगों के पास फिलहाल रोजगार नहीं है और न ही अपनों के अंतिम संस्कार के लिए पैसे। ऐसे में प्रदेश भर में स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आईं हैं, जो अभावग्रस्त मृतकों का अंतिम संस्कार करवा रही हैं।

हर श्मशान घाट में अस्थियों की पोटलियां जमा हैं क्योंकि परिजन उन्हें विसर्जित करने के लिए तय मुकाम तक जा नहीं सकते। अंतिम अरदास/प्रार्थना/क्रिया स्थगित हैं। बाहर के साथ-साथ घरों में भी लोगों के जुटने पर प्रतिबंध है। औपचारिक अफसोस के लिए भी कोई कहीं नहीं जा पा रहा। सगे भी अपनों की मृत देह के आखिरी दीदार से वंचित हैं। जाने वाले और परिजनों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि ऐसा वक्त आएगा। करोना वायरस को तो देर-सबेर जाना ही है लेकिन इन गाढ़े दिनों की यह सब कटु स्मृतियां कभी नहीं जाएंगीं...।

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia


;