बंगाल में वोटों की गिनती से पहले उठे सवाल: सत्ता विरोधी 'पोरिबर्तन' या एसआईआर विरोधी 'प्रत्याबोर्तन'

बाकी राज्यों के साथ ही पश्चिम बंगाल में भी कल वोटों की गिनती होगी। बंगाल में एसआईआर किसके खिलाफ गया, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे, लेकिन कुछ सवाल और घटनाएं हैं जिनसे कई सवाल खड़े हुए हैं।

सांकेतिक तस्वीर (एआई निर्मित)
i
user

ए जे प्रबल

आज के भारत का कोई भी वयस्क, जिसे संविधान से वोट देने का अधिकार मिला है, एसआईआर को कभी नहीं भूलेगा। यहां तक कि भारत के वे लाखों अशिक्षित भी नहीं, जिन्हें इन डरावने अक्षरों का मतलब पता भी नहीं होगा। 

4 नवंबर 2025 को शुरू हुए एसआईआर के दूसरे चरण में चुनाव आयोग का पश्चिम बंगाल पर खास ध्यान रहा, हालांकि इस दौर में कुल 12 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में एसआईआर हो रहा था। बंगाल के लोगों को बखूबी अंदाजा था कि क्या होने वाला है, क्योंकि बिहार उनके सामने था जहां वोटर लिस्ट से हटाए लाखों लोग अपने नाम जुड़वाने के लिए पसीने बहा रहे थे। चाहे उनका झुकाव किसी भी तरफ हो- न वोटर, न जानकार और न कोई ईमानदार चुनावी सर्वे करने वाला- कोई भी यकीन से नहीं कह सकता कि यह तथाकथित ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ प्रक्रिया असल में कितनी ज्यादा ‘मैनेज’ की गई। क्या चुनाव आयोग ने अपने राजनीतिक आकाओं के फायदे के लिए इस प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए बहुत कुछ किया है?

कई चुनावी मुकाबलों पर बारीक नजर रखने वाले एक जानकार ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ‘अगर बीजेपी बंगाल जीत जाती है, तो इसकी वजह एसआईआर होगा। लेकिन अगर इतनी कोशिशों के बाद भी वह फिर हार जाती है, तो इसकी वजह भी एसआईआर ही होगी।’ सुनने में यह विरोधाभासी लग रहा, लेकिन असल में है नहीं।

अगर आप एक पल के लिए एसआईआर को नजरअंदाज कर दें और सिर्फ मतदाताओं के मिजाज पर गौर करें, तो पाएंगे कि यहां की जनता और बीजेपी, दोनों एक-दूसरे के लिए अभी तैयार नहीं, ममता के 15 साल की सत्ता और ‘पोरिबोर्तन’ की जरूरत के बारे में इतनी सारी बातों के बाद भी नहीं। शायद फिर भी ‘पोरिबोर्तन’ हो जाए- स्वाभाविक रूप से जनता के जनादेश से नहीं, तो बीजेपी और चुनाव आयोग के साझा प्रयास से। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो इसमें चुनाव आयोग को लेकर मतदाताओं में बैठे जबर्दस्त गुस्से की बड़ी भूमिका होगी।

कुछ समय तक लगा कि चुनाव आयोग अपने असली एजेंडे यानी बीजेपी के फायदे के लिए वोटर लिस्ट में बदलाव, को छिपाने की कोशिश कर रहा है। बीजेपी ने इसके लिए अपने समर्थन को कभी नहीं छिपाया और कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति यह सोच सकता है कि आखिर सिर्फ विपक्ष ही बड़े पैमाने पर लोगों के नाम काटे जाने को लेकर क्यों चिंतित है।

बीजेपी के एक बड़े मतुआ नेता और राज्य की बनगांव लोकसभा सीट से पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने कहा कि 2 लाख रोहिंग्याओं को बाहर निकालने के लिए 20,000 हिन्दुओं की कुर्बानी बेहतर है। लेकिन दिसंबर 2025 की ड्राफ्ट लिस्ट में एएसडीडी (अनुपस्थित/स्थानांतरित/मृत/ डुप्लीकेट) श्रेणी के तहत काटे गए 58.2 लाख नामों में से एक भी नाम न तो रोहिंग्या था और न बांग्लादेशी।

इसके फौरन बाद चुनाव आयोग ने एक रहस्यमयी सॉफ्टवेयर लागू किया, जिसने 1.3 करोड़ मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति’ अस्थायी रूप से नाम हटाने की एक नई श्रेणी- के लिए चिह्नित किया, और उनसे व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान दस्तावेज पेश करने को कहा। प्रवासी मजदूर, पुरुष, महिलाएं, बुज़ुर्ग और बीमार लोग, जो भी दस्तावेज जुटा सके, उन्हें पेश करने के लिए कतारों में खड़े हो गए। कलकत्ता हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस शाहिदुल मुंशी ने बताया कि उन्हें न तो कोई रसीद दी गई और न ही इस बात का कोई सबूत कि उनकी बात ‘सुनी’ गई। ‘बार एंड बेंच’ में प्रकाशित एक इंटरव्यू के बाद, उनका नाम तो तुरंत बहाल कर दिया गया, लेकिन बाकी इतने भाग्यशाली नहीं रहे।


एसआईआर से पहले का 7.66 करोड़ का मतदाता आधार दिसंबर 2025 की ड्राफ्ट सूची में घटकर 7.08 करोड़ रह गया। 28 फरवरी 2026 की अंतिम सूची में लगभग 60 लाख नाम ‘निर्णय के अधीन’ रखे गए थे। न्यायिक अधिकारियों द्वारा 32 लाख नामों को मंजूरी देने के बाद भी 27 लाख लोग मताधिकार से वंचित रह गए। 23 अप्रैल तक (पहले चरण की वोटिंग का दिन), कुल 138 अपीलों पर सुनवाई हुई और 136 को लिस्ट में शामिल करने की मंजूरी दी गई; दूसरे चरण तक (29 अप्रैल को) 1,474 और अपीलों पर सुनवाई हुई और 1,468 नामों को फिर सही ठहराया गया। इस रफ्तार से अगर काम चलता रहा, तो बाकी अपीलों पर सुनवाई में ट्रिब्यूनल को 10-12 साल लग जाएंगे!

बंगाल के एसआईआर दुःस्वप्न के खत्म होने पर, इस चुनाव के लिए राज्य में वोट डालने के लायक लोगों की संख्या, एसआईआर से पहले के 7.66 करोड़ के आंकड़े से करीब 90 लाख कम थी!

हैरानी नहीं कि बीजेपी के जिस वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बात की, उन्हें लगा कि लोगों का गुस्सा पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है; लेकिन उन्होंने यह भी माना कि उनमें दिल्ली में बैठे पार्टी के बड़े नेताओं को इस संभावित विरोध के बारे में आगाह करने की हिम्मत नहीं थी। उन्होंने बताया कि बंगाल में एसआईआर ने सत्ता-विरोधी लहर को पूरी तरह दबा दिया। एसआईआर से पहले चर्चा में रहे सभी मुद्दे- भ्रष्टाचार, रोजगार, उद्योगों की कमी, भर्ती घोटाले- चुनावी चर्चा से पूरी तरह गायब हो चुके थे।

मुसलमानों इस मामले में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के साथ नजर आए, क्योंकि उन्हें पक्का यकीन था कि एसआईआर उन्हें नागरिकता से वंचित करने की एक शैतानी साजिश है। यहां तक कि मतुआ समुदाय- बांग्लादेश से आए अनुसूचित जाति के हिन्दू, जिनमें कई के नाम लिस्ट से हटा दिए गए थे- ने भी खुद को छला महसूस किया। प्रवासी मजदूरों में भी आने-जाने के दौरान होने वाली परेशानी और आर्थिक नुकसान को लेकर भारी गुस्सा था।

बंगाल में मतदान रिकॉर्ड 92.4 फीसदी रहा और टीएमसी और बीजेपी, दोनों ही आश्वस्त दिखे कि जनादेश उनके पक्ष में है। बीजेपी यकीन दिलाना चाहती है कि सियासी हवा ‘पोरिबोर्तन’ की तरफ बह रही है, वहीं टीएमसी का जोर है कि हवा ‘प्रत्याबोर्तन’ के लिए बह रही है- यानी 71 साल की ममता बनर्जी की चौथी बार मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी। दिल्ली लौटने से पहले, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पूरा भरोसा दिखाया कि बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलेगा, यहां तक कि उन्होंने एक आंकड़ा भी बताया- 177- जो कुछ ज्यादा ही सर्वज्ञानी जैसा था। याद रखें, उन्होंने 2021 में बीजेपी के लिए 200+ बहुमत की भविष्यवाणी की थी!

अगर भाजपा का लोगों के मूड के बारे में दावा सच है, तो चुनाव से पहले इतना सुरक्षा बंदोबस्त क्यों? 2.8 लाख सीएपीएफ जवानों की तैनाती चुनाव के बजाय एक हमले जैसा लग रहा है। (संदर्भ के लिए, मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा के पीक पर 29 हजार सीएपीएफ जवान भेजे गए थे।) एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी), जिसे आम तौर पर आतंकवाद-विरोधी काम सौंपा जाता है, पोलिंग बूथों के आसपास क्यों घूम रही थी। केंद्रीय सुरक्षा बल मतदान के दिन सुबह 1 बजे भवानीपुर (ममता बनर्जी का चुनाव क्षेत्र) में कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम को क्यों धमका रहे थे- ‘आप मेयर साब हो ना? अगर कुछ हुआ तो आप के लिए अच्छा नहीं होगा’? 


अगर ममता हारती हैं, तो उन्हें एक ऐसे शहीद के तौर पर देखा जाएगा जिसे एक बेईमान विरोधी ने सरकारी मशीनरी और पक्षपाती चुनाव आयोग की मदद से हरा दिया। ज्यादातर एग्जिट पोल ने कांटे की टक्कर का अनुमान लगाया है; कुछ ने बीजेपी को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की, तो कुछ ने टीएमसी को। ऐतिहासिक रूप से, बंगाल में चुनावी फैसला एकतरफा रहा है- जीतने वाली पार्टी ने 294 में से 200 से ज्यादा सीटें हासिल कीं। पिछले तीन चुनावों (2011, 2016, 2021) में, टीएमसी ने क्रमशः 226, 211 और 215 सीटें जीतीं। 1996 में वाम दल 200 सीटों के आंकड़े से चार सीट पीछे रह गया, लेकिन अगले चुनाव में उसने सीट संख्या 235 तक पहुंचाकर इसकी भरपाई की। देखना है कि क्या यह रुझान जारी रहता है।

पांच साल पहले, पीपल्स पल्स और ऐक्सिस माई इंडिया ने अनुमान लगाया था कि बीजेपी 173-192 सीटें जीतेगी पर बीजेपी के खाते में आईं 77 सीटें। इस बार, ऐक्सिस माई इंडिया ने अनुमान लगाने से इस आधार पर परहेज किया कि 70 फीसदी मतदाताओं ने नहीं बताया कि उन्होंने किसे वोट दिया। पीपल्स पल्स ने बीजेपी के लिए 95-110 सीटों का अनुमान लगाया, और टीएमसी को 177-187 सीटों के साथ आसान जीत हासिल करते दिखाया है। 

हालांकि एग्जिट पोल शेयर बाजार और ‘सट्टा बाजार’ में हलचल मचा देते हैं, और जोखिम उठाने वाले एक-दो करोड़ कमा भी लेते हैं। बाकी के लिए, जिन्हें राजनीतिक ड्रामे में दिलचस्पी है, एग्जिट पोल बेहतरीन मनोरंजन हैं।

(कुणाल चटर्जी के इनपुट के साथ)

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia