मोदी सरकार की ना-नुकुर के बाद कानून तो लागू, लेकिन झारखंड की रघुवर सरकार नहीं दे रही मातृत्व लाभ के पैसे

अर्थशास्त्री और सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज ने सर्वे जारी करते हुए कहा कि झारखंड की बीजेपी सरकार ने 60 फीसदी गर्भधारण को मातृत्व पात्रता के लाभ से बाहर रखा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने एक शानदार योजना को अपने रवैये से बर्बादी की तरफ मोड़ दिया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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रवि प्रकाश

कुपोषण के मामले में ‘बदनाम’ झारखंड में गर्भवती महिलाओं को मातृत्व लाभ के पैसे नहीं मिल पा रहे हैं। यह खुलासा हाल में आए एक सर्वे में हुआ है। यह हाल तब है जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) लागू हुए छह साल हो चुके हैं और मुख्यमंत्री रघुवर दास इन दिनों अपने भाषणों में कुपोषण से लड़ने की बात जोरशोर से कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में जन्म लेने वाले 45 फीसदी बच्चे अविकसित और 48 फीसदी नवजात अंडरवेट होते हैं। इसका मुख्य कारण गर्भवती महिलाओं का एनिमिक होना है। यह सर्वेक्षण झारखंड के छह प्रखंडों में पिछले जून महीने में कराया गया। मशहूर अर्थशास्त्री और सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज और उनके साथियों ने सर्वे जारी करते हुए कहा कि झारखंड की बीजेपी सरकार ने 60 फीसदी गर्भधारण को मातृत्व पात्रता के लाभ से बाहर रखा है। यह कानूनन अपराध है। उन्होंने बताया कि सरकार ने एक शानदार योजना को अपने स्टिंगनेस और टेक्नोक्रेसी से बर्बादी की तरफ मोड़ दिया है।

गौरतलब है कि एनएफएसए के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को छह हजार रुपये का मातृत्व लाभ देने की वकालत की गई थी, जब तक कि वे औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारियों के रूप में इस तरह का लाभ लेने के योग्य न हो जाएं। नरेंद्र मोदी सरकार ने चार साल तक इस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया लेकिन साल 2017 में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना (पीएमएमवीवाई) की शुरुआत की। इसके तहत गर्भवती महिलाओं को उनके पहले बच्चे के लिए तीन किस्तों में पांच हजार रुपये की राशि देने का प्रावधान किया गया। इसे प्राप्त करने के लिए महिलाओं को अपनी गर्भावस्था का प्रारंभिक पंजीकरण, कम-से-कम एक प्रसव पूर्व जांच, बच्चे का टीकाकरण- जैसी कुछ शर्तें पूरी करने को कहा गया। इन शर्तों को पूरा करने के बाद उन्हें अपने गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में जाकर एक आवेदन पत्र भरना था ताकि यह राशि उन्हें दिलाई जा सके।


इस योजना का सर्वे कर रही टीम ने राज्य के पांच जिलों के छह चुनिंदा प्रखंडों की कुल 202 पात्र आवेदकों से बातचीत की। टीम ने पाया कि इनमें से 25 फीसदी से भी कम महिलाओं को कम-से- कम एक किस्त मिली है। वहीं, सभी तीन किस्तों के लिए आवेदन कर चुकीं सिर्फ आठ फीसदी महिलाएं ही पांच हजार रुपये की पूरी राशि प्राप्त कर सकीं। लातेहार, पश्चिमी सिंहभूम, दुमका, गुमला और बोकारो जिलों में किए गए सर्वे में पता चला कि154 महिलाओं को कोई किस्त नहीं मिली और सिर्फ 48 महिलाओं को कम-से-कम एक किस्त मिली। कुल 202 पात्र महिलाओं में से सिर्फ आठ महिलाओं को ही सभी तीन किस्तें अर्थात 5000 रुपये की राशि मिल सकी।

यह सर्वे बसिया वरायडीह (गुमला), मनिका (लातेहार), पेटरवार (बोकारो), शिकारीपाड़ा (दुमका) और सोनुवा (पश्चिमी सिंहभूम) प्रखंडों में कराया गया था। सर्वे में छात्रों की भी सहभागिता थी। इन लोगों ने 42 ग्राम पंचायतों की 116 आंगनबाड़ी सेविकाओं से बातचीत कर गर्भवती महिलाओं की जानकारी जुटाई थी।

क्या होना चाहिए

मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने नवजीवन को बताया कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सरकार अगर गर्भवती महिलाओं को उनके सभी बच्चों के प्रसव के लिए भी अनुशंसा के मुताबिक 6000 रुपये दे, तो 400 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यह राज्य के कुल बजट का सिर्फ 0.5 फीसदी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून का उल्लंघन करने के कारण 60 फीसदी गर्भवती महिलाएं मातृत्व लाभ से वंचित रह गई हैं। इसे केवल पहले जीवित बच्चे तक सीमित रखना और लाभ की राशि घटाकर 5000 रुपये कर देना भी अपराध है।

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