राफेल सौदे पर राहुल का कटाक्ष: पीएम का फैसला, अब शुरु हुई है इसे सही साबित करने की जुगत बिठाने की प्रक्रिया

राफेल सौदे को लेकर पीएम मोदी पर सीधे-सीधे भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देने और देश के साथ ही संसद को गुमराह करने के आरोप लग रहे हैं। अभी तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री का जवाब वही रहा है जो हर गंभीर मुद्दे पर देते रहे हैं, और वह है खामोशी।

नवजीवन डेस्क

केंद्र सरकार ने राफेल सौदे में पीएम मोदी के फैसले को सही साबित करने की जुगत बिठाने की तैयारी शुरु कर दी है। यह सवाल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह कटाक्ष किया है। उन्होंने एक ट्वीट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है जिसमें आदेश दिया गया है कि केंद्र सरकार राफेल सौदी की जानकारी मुहैया कराए। राहुल गांधी ने ट्वीट में लिखा है कि, “सुप्रीम कोर्ट ने राफेल में फैसला लेने की प्रक्रिया की जानकारी मांगी है। यह एकदम आसान है। प्रधानमंत्री ने फैसला ले लिया। अब उनके फैसले को सही ठहराने की प्रक्रिया अभी खोजी जा रही है। लेकिन काम शुरु हो चुका है।” उन्होंने अपने ट्वीट में पोस्ट स्क्रिप्ट के तौर पर रक्षा मंत्री की फ्रांस यात्रा का हवाला दिया है।

नए राफेल सौदे की तैयारी

उधर केंद्र की अगुवाई वाली मोदी सरकार पर 36 राफेल विमानों की खरीद में जिस कथित भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, वह अभी ठंडे भी नहीं पड़े हैं, कि सरकार ने नए सिरे से 126 राफेल खरीदने की मंशा जता दी है। इसके लिए सरकार ने वैश्विक स्तर पर सूचना का प्रत्यावेदन यानी आरएफआई जारी किया है और कम से कम 9 कंपनियों ने इसमें रूचि दिखाई है। इस नए सौदे में ऑफसेट पार्टनर के रूप में किस निजी या सरकारी कंपनी को शामिल किया जाएगा, अभी तय नहीं है, लेकिन वह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड तो नहीं ही होगी, क्योंकि रक्षा मंत्री की राय में एचएएल तो सुखोई बनाने में भी बहुत समय लेती रही है।

यह सारी जानकारी खुद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी फ्रांस यात्रा से पहले दिए साक्षात्कारों में दी है। उन्होंने राफेल के मुद्दे पर बताया कि, “मूल सौदे में तय विमानों की संख्या कम कहां की गयी है, बल्कि 18 के बजाए 36 राफेल उड़ंतु स्थिति (फ्लाईअवे कंडीशन) में लिए जा रहे हैं, और बाकी ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बनाए जाएंगे।“ बाकी विमानों के निर्माण में भारतीय कंपनी कौन सी होगी, इसके जवाब में उनका कहना था कि यह तो कंपनियां तय करेंगी। लेकिन एचएएल को लेकर उनका पूर्वाग्रह साफ दिखा जब उन्होंने कहा कि, “एचएएल तो सुखोई बनाने में भी बहुत समय लेती है।“

रक्षा मंत्री के पास नहीं है फ्रांस यात्रा का पूरा ब्योरा

राफेल पर रक्षा मंत्री के इस नए खुलासे से अर्थ यही निकलता है कि इस मुद्दे पर सरकार के पास कोई ठोस जवाब है ही नहीं। अब रक्षा मंत्री के इस बयान की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी फ्रांस यात्रा का पूरा ब्योरा तक रवाना होने की पूर्व संध्या तक नहीं पता था। इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया था कि वे फ्रांस यात्रा के दौरान क्या दसॉल्ट के अधिकारियों से मिलेंगी, तो उनका जवाब था कि, “अभी तय नहीं है, और मुझे मेरे दौरे का पहला ब्योरा ही अभी मिला है।“

राफेल सौदे पर केंद्र की मोदी सरकार जितना छिपाना चाहती है, उससे कहीं ज्यादा सामने आ जाता है। और कथित भ्रष्टाचार में घिरी सरकार अपना बचाव ही नहीं कर पाती।

दरअसल , राफेल...केंद्र में नरेंद्र मोदी के नियंत्रण वाली सत्ता के गलियारों में इस शब्द की गूंज से पैदा हुई घबराहट अब मंत्रियों के चेहरों पर नजर आने लगी है। चौकीदार का पर्याय चोर, मित्रों का पर्याय क्रोनी कैपिटलिज़्म बनने में सिर्फ 52 महीने का वक्त लगा। जिस पार्टी की अगुवाई में केंद्र सरकार है उसकी चाल और चरित्र तो बहुत पहले से परिभाषित हैं, लेकिन अब चेहरे भी सामने आ चुके हैं।

इस सौदे की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय पर भी जोरों से शुरु हो गई है। अभी दो दिन पहले ही अमेरिका के अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने राफेल सौदे पर लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट का सार बताता है कि कभी कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले पीएम मोदी पर आज खुद ही आरोप लग रहे हैं। अखबार कहता है, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई साढ़े चार साल पहले भ्रष्टाचार को कुचलने का ऐलान करते हुए करते हुए सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे थे। शासन संभालने के बाद देश की करीब 90 फीसदी नकदी को बदल देने जैसे उनके कदमों को भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके आव्हान के तौर पर प्रचारित भी किया गया था। वे हर मंच से पूर्व सरकार और खासतौर से कांग्रेस पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे। लेकिन, बीते कुछ सप्ताह में भूमिकाएं बदल गई हैं, अब आरोप कांग्रेस लगा रही है, और आरोपित खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।“

राफेल सौदे को लेकर पीएम मोदी पर सीधे-सीधे भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देने और देश के साथ ही संसद को गुमराह करने के आरोप लग रहे हैं। अभी तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री का जवाब वही रहा है जो हर गंभीर मुद्दे पर देते रहे हैं, और वह है खामोशी।

राफेल सौदे को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं उनमें से कुछ सीधे-सीधे सरकार के गले की फांस बन गए हैं:

  • सिर्फ 36 विमानों का सौदा क्यों हुआ, जबकि मूल सौदा तो 126 का था?
  • अनुभवहीन निजी कंपनी को इस सौदे का हिस्सा क्यों बनाया गया?
  • फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद ने आखिर क्यों कहा कि उनके पास विकल्प नहीं था?
  • एचएएल को इस सौदे से किस आधार पर बाहर किया गया?
  • राफेल विमान की कीमत तीन गुना तक पहुंच गई?
  • अचानक रक्षा मंत्री मूल सौदे के बाकी विमानों की खरीद का बात क्यों करने लगी हैं?
  • आखिर इस सौदे को लेकर इतनी पर्दादारी क्यों है?

सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद से ही बीजेपी ने विपक्षी दलों और विरोधी नेताओं पर तीखे हमले किए हैं। लेकिन, अब खुद बीजेपी चौतरफा हमले का शिकार हुई है, और उसके पास बचाव के लिए शब्द नहीं हैं। हैं भी तो नाकाफी है और उलझे हुए हैं।

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले राफेल सौदा राजनीतिक विमर्श का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय बन गया है, जिसका दबाव बीजेपी, मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साफ परिलक्षित हो रहा है।

हाल के दिनों में अखबारों, टीवी और सोशल मीडिया की सुर्खियों में कांग्रेस ही छाई नजर आती है। सवाल वहीं हैं है कि आखिर राफेल विमानों की कीमत कैसे बढ़ गई, और 8.7 अरब डॉलर के इस सौदे में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बाहर कर एक निजी औद्योगिक घराने को साझीदार क्यों बनाया गया? क्या इसके बदले बीजेपी और सरकार को कुछ मिलने वाला है?

दरअसल राफेल सौदे की कहानी 2015 में शुरु हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस यात्रा पर गए थे। उन्होंने पेरिस में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ तीन दर्जन राफेल विमान खरीदने का ऐलान किया। ये विमान फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट से खरीदे जाने थे। इस ऐलान से किसी को अचरज नहीं हुआ।

राफेल सौदे पर राहुल का कटाक्ष: पीएम का फैसला, अब शुरु हुई है इसे सही साबित करने की जुगत बिठाने की प्रक्रिया

इस सौदे में भ्रष्टाचार की पर्तें तब खुलना शुरु हुईं जब करीब एक साल बाद राफेल विमान खरीद के समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर हुए। सवाल उठने लगे कि आखिर इस सौदे में दसॉल्ट के ऑफसेट पार्टनर (देसी साझीदार) के तौर पर अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को क्यों शामिल किया गया? पूर्व की सरकार जो सौदा कर रही थी उसमें तो ऑफसेट पार्टनर के तौर पर सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड – एचएएल को शामिल होना था। सवाल जायज़ इसलिए भी हैं क्योंकि रिलायंस डिफेंस को विमान बनाने का तजुर्बा होना तो दूर, कंपनी की बुनियाद ही प्रधानमंत्री द्वारा सौदे की घोषणा के महज 12 दिन पहले हुई थी।

सरकार अभी सवालों की इन मिसाइलों का जवाब तलाश भी नहीं पाई थी, कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद ने बम विस्फोट कर दिया। उन्होंने फ्रांस के वेब पोर्टल मीडियापार्ट को इंटरव्यू में बताया कि “रिलांयस डिफेंस को राफेल सौदे में साझीदार बनाने का फैसला भारत सरकार का था, और हमारे पास इस मामले में कोई विकल्प ही नहीं था।”

राफेल सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर विपक्ष ने न सिर्फ अपने हमलों को धारदार बनाया है बल्कि हमलों की रफ्तार भी तेज कर दी है। इस युद्ध की अगुवाई कांग्रेस कर रही है और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो इस मुद्दे पर ‘चोरों के सरदार’ तक की संज्ञा दे डाली है।

यूपीए सरकार ने जब इस सौदे की शुरुआत की थी तो उसने 126 विमान खरीदने का फैसला किया था और कीमत करीब 526 करोड़ प्रति विमान तय हुई थी। इस सौदे में खास बात यह थी कि 18 विमान उड़ंतु स्थिति (फ्लाईअवे) में आने थे और बाकी का निर्माण यहीं भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड – एचएएल को करना था। सौदे की शर्तों में राफेल बनाने की तकनीक एचएएल को देना भी शामिल था। लेकिन मोदी सरकार ने सिर्फ 36 विमानों का सौदा किया, कीमत तीन गुना कर दी गई, एचएएल को सौदे से बाहर कर दिया गया और हज़ारों करोड़ का ठेका बिना अनुभव वाली और कर्ज में डूबी रिलायंस डिफेंस को दे दिया गया।

सच्चाई समय के साथ सामने आएगी, लेकिन आज की स्थिति यह है कि सरकार की छवि पर धब्बा लग चुका है। और जैसा कि रक्षा मंत्री ने खुद माना भी है, “छवि पर लगे इस दाग को धोने में वक्त लगेगा।”

Published: 10 Oct 2018, 3:29 PM
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