कोरोना और लॉकडाउन से पशु-पक्षियों पर बड़ी आफत, राजस्थान ने बेजुबानोंं की सुध लेकर सबको याद दिलाया कर्तव्य

कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने जिस तरह लोगों को घर में रहने को मजबूर कर दिया गया है, उससे पशु-पक्षियों पर आफत आ गई है। इनके लिए दाना-पानी का संकट खड़ा हो गया है। शहरों-गांवों में पक्षियों को जहां दाना डाला जाता था, उस स्थान पर लोगों ने जाना छोड़ दिया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रकाश भंडारी

कोरोना वायरस की महामारी जानलेवा साबित हो रही है। इन कुछ वर्षों में चीन और हांगकांग के अलावा थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम में बर्ड फ्लू ने सैंकड़ों लोगों की जान ले ली है। बर्ड फ्लू के फैलने के पीछे चिकन एक बड़ा कारण रहा और इसका नतीजा यह हुआ कि बीमारी रोकने के लिए लाखों चूजों को मार डाला गया।

साल 2004 में एच5एन1 ने छोटे तौर पर ही सही लेकिन पूरी दुनिया को दहशत में डाल दिया था और डर के मारे लोगों ने कई महीनों तक चिकन नहीं खाया था। इसी प्रकार साल 2009 में सूअर के कारण स्वाइन फ्लू फैला। यह फ्लू यूरोप की देन है। एच1एन1 वायरस का प्रकोप भारत में आज तक देखने को मिलता है और यहां हर साल इससे बड़ी संख्या में लोग मर जाते हैं।

भारत में पशु-पक्षियों को आश्रय देने की संस्कृति रही है। पशु-पक्षी देवी-देवताओं के वाहन रहे हैं। शिवजी के गले में हमेशा सर्प लटका रहता है तो मां दुर्गा का वाहन सिंह और इसी तरह गरुड़, मयूर और सांड आदि भी देवी-देवताओं के वाहन रहे हैं। तत्कालीन जयपुर रियासत में साल 1900 में प्लेग की महामारी फैली थी और इसके कारण एक वर्ष के भीतर 13 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। तब प्लेग के कारणों का पता नहीं चला था।

लेकिन जब चूहों के कारण प्लेग के फैलने की बात की पुष्टि हुई तो अंग्रेज डॉक्टरों ने कहा कि जयपुर महाराज को रियासत के सभी चूहों को मारने का आदेश जारी करना चाहिए। लेकिन तब पंडित-पुरोहितों ने महाराजा को सलाह दी कि चूहे तो गणेशजी के वाहन हैं और अगर चूहों को मार दिया गया तो इससे कहीं गणेशजी ने क्रूद्ध होकर श्राप दे दिया तो अनर्थ हो जाएगा। अंततः महाराज ने चूहों को नहीं मारने का आदेश दिया।

दरअसल, पशु-पक्षियों के प्रति दया भाव रखना तो भारतीय परंपरा रही है। लेकिन कोरोना वायरस और लॉकडाउन के कारण जिस तरह लोगों को घर में रहने को मजबूर कर दिया गया है, उससे पशु-पक्षियों के लिए भी आफत आ गई है। इनके लिए दाना-पानी का संकट खड़ा हो गया है। लोगों ने अपने पशुओं को बाहर छोड़ दिया है और शहरों-गांवों में पक्षियों को जहां दाना डाला जाता था, उस स्थान पर लोगों ने जाना छोड़ दिया है।

पशुओं और पक्षियों की ऐसी दुर्दशा देखते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सबसे पहले पशुपालन विभाग के अफसरों की बैठक ली और पशु-पक्षियों के दाने-चारे के साथ-साथ पानी की उपलब्धता की स्थिति की समीक्षा की। फिर मुख्यमंत्री ने आम लोगों और परोपकारी संस्थाओं से आगे आकर पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करने की अपील की। मुख्यमंत्री की अपील का बड़ा असर हुआ और विभिन्न संस्थाओं ने चारे-दाने और पानी का प्रबधं अपने हाथ में ले लिया। गोशालाओं में तो चारा पहुंचने ही लगा, सड़कों पर कुत्तों और आवारा पशुओं को भी भोजन मिलने लगा। बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक में स्वयंसेवी संस्थाएं पशु-पक्षियों को बचाने के काम में जुट गईं।

इस बीच, भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड ने भी सभी राज्यों को एक निर्देश जारी किया। बोर्ड के चेयरमैन डॉ. ओ.पी. चौधरी के निर्शदेानुसार सभी राज्यों को सलाह दी गई कि वे इस बात का ध्यान रखें कि कोरोना वायरस के कारण पशुधन नष्ट न हो और पशु-पक्षियों के साथ निर्दयता न बरती जाए। घरेल पशु-पक्षियों को सड़कों पर न छोड़ा जाए और उनके भोजन-पानी का प्रबधं किया जाए।

डॉ. चौधरी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से यह जानकारी भी दी कि कुत्ते बिल्लियों और पक्षियों के कारण कोरोना वायरस नहीं फैलता। पशु कल्याण बोर्ड ने नियमों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की ओर भी राज्य सरकारों का ध्यान दिलाया है जिसमें पशु-पक्षियों के साथ निर्दयतापूर्ण व्यवहार करने वालों के विरुद्ध दंडनीय अपराध का प्रावधान है। राजस्थान सरकार की पहल और पशु कल्याण बोर्ड के आदेशों के कारण महामारी में भी पशधुन को बचाया जा रहा है।

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