नहीं रहे राजकिशोर: वे लेखकों के बीच पत्रकार और पत्रकारों के बीच लेखक थे 

बीजेपी को आधुनिक भारत का विपक्ष कहने वाले पत्रकार राजकिशोर ही हो सकते थे। आज के राजनीतिक विपक्ष को शायद ही राजकिशोर नाम के किसी शख्स के बारे में पता होगा, लेकिन बिना बड़ी लकीर खींचे बीजेपी की विचारधारा को हराने का सपना देखना रेत में लकीर खींचने जैसा ही होगा।

फोटो: सोशल मीडिया 
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विश्वदीपक

राजकिशोर पत्रकारों के बीच लेखक थे और लेखकों के बीच पत्रकार। ऐसी पदवी कम ही लोगों को मिलती है। सच बात तो ये है कि ऐसे लोग होते भी कम है। याद नहीं आ रहा कहां, लेकिन शायद तद्भव में पढ़ा था कि लोग हिंदी के मशहूर लेखक मनोहर श्याम जोशी के बारे में भी यही बात कहते थे। वे पत्रकारों के बीच लेखक के तौर पर सम्मानित थे और लेखकों के बीच पत्रकार के तौर पर धाक जमाते थे। दोनों विधाओं में उनकी आवाजाही एक समान थी। यही बात राजकिशोर के बारे में कही जा सकती है।

हालांकि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन 71 साल की उम्र तक जीते हुए राजकिशोर ने जो बौद्धिक विरासत छोड़ी है, वह उनकी याद दिलाने के लिए काफी है। उनकी याद इस रूप में भी आएगी कि अश्लीलता, आधुनिकता, दलित विमर्श, नैतिकता, स्त्री और यौनिकता से जुड़े हुए सवालों पर उनकी दिलचस्प टिप्पणियां अब पढ़ने को नहीं मिलेंगी जो आसान शब्दों और चुटीले अंदाज में कही जाती थीं। उनकी बातों पर एक साथ हंसना और रोना आता था।

उदाहरण के लिए, इस वाक्य पर गौर कीजिए - यदि औसत स्त्रियों का बौद्धिक स्तर औसत पुरुषों के बराबर नहीं हो पाया तो स्त्रियां अपने लिए और पूरी मानवता के लिए समस्या बनी रहेंगी। ये बात राजकिशोर ही कह सकते थे। दिखावटी नारीवाद के दौर में इस तरह की बात कहना खतरे से खाली नहीं था, पर राजकिशोर अपनी वैचारिकी के लिए खतरे उठाने पर यकीन करते थे। इस यकीन को बार-बार उन्होंने साबित किया था।

कई बार उनकी बातों में बेतुकापन भी झलकता था, खासतौर से स्त्री विमर्श से जुड़ी हुई उनकी टिप्पणियां कई बार हद से बाहर की लगती थीं, लेकिन उनमें दम होता था। इस बात से इनकार उनके विरोधी भी नहीं कर सकते। मजाक में हम लोग उन्हें हिंदी पत्रकारिता का राजेन्द्र यादव कहते थे। और यह काफी हद तक सही भी है। हिंदी साहित्य में स्त्री और दलितों के सवालों को लेकर जो मुहिम ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने चलाई, करीब-करीब उसी शैली में, वही काम राजकिशोर ने हिंदी पत्रकारिता में किया।

राजेन्द्र यादव की तरह ही वे सांप्रदायिकता के मुद्दे पर बीजेपी और संघ की बखिया उधेड़ कर उस पर नमक मिर्च लगाने से भी नहीं कतराते थे। ये शायद इकलौता ऐसा विषय था जिस पर वे अपनी लाइन से एक इंच भी इधर-उधर डिगने के लिए तैयार नहीं थे। निजी जिंदगी में वे बेहद लोकतांत्रिक थे। आलोचना का छाछ बनाकर वे उसे आराम से पीते रहते थे।

गहराई तक सांप्रदायिक हो चुकी पत्रकारिता के इस दौर में जब सुधीर चौधरी और अर्नब गोस्वामी जैसे लोग रोल मॉडल बन चुके हैं, राजकिशोर का न होना जरूर खलेगा। कम से कम हिंदी पत्रकारिता को उन जैसे लोगों की जरूरत है जो उम्र और विचार में बुजुर्ग हैं, लेकिन दिल से जवान। उनकी जिजीविषा उनकी लेखनी की तरह ही सामान्य से ऊंचे दर्जे की थी। अंग्रेजी पत्रकारिता का हाल भी कुछ अच्छा नहीं, लेकिन उसकी चिंता करने वाले बहुत हैं।

ये बात सच है कि इकलौते बेटे की मौत के बाद वे सदमें में चले गए थे, लेकिन इसे उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया। वे फेसबुक पर लगातार वैचारिक टिप्पणियां करते रहे। आईसीयू में जाने से पहले फेसबुक पर उनकी आखिरी कुछ टिप्पणियों में से एक बीजेपी को हराने को लेकर थी। इस जिजीविषा को क्या नाम दिया जाए? उन्होंने लिखा, “भाजपा को कैसे हटाएं…भाजपा की कमान में कई तीर हैं, क्योंकि वह पूरे आधुनिक भारत का विपक्ष है। उसका मुकाबला करने के लिए सिर्फ उसके मुद्दों का विरोध करना काफी नहीं है। विपक्ष को अपने मुद्दे उभारने होंगे।”

बीजेपी को आधुनिक भारत का विपक्ष कहने वाले पत्रकार राजकिशोर ही हो सकते थे। आज के राजनीतिक विपक्ष को शायद ही राजकिशोर नाम के किसी शख्स के बारे में पता होगा, लेकिन बिना बड़ी लकीर खींचे बीजेपी की विचारधारा को हराने का सपना देखना रेत में लकीर खींचने जैसा ही होगा। एक पार्टी के रूप में बीजेपी भले ही चुनाव हार जाए, लेकिन एक विचार के रूप में वह लगातार मजबूत हुई है। जरूरत इस विचार को हराने की है। राजकिशोर की टिप्पणी का सार यही था। बहरहाल, इससे फर्क किसको पड़ता है?

उनके भाषाई खिलंदड़पन और गंभीरता का एक नमूना और देखिए। बीजेपी के पितृ संगठन आरएसएस पर उनकी लिखी ये टिप्पणी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही मारक भी। उन्होंने लिखा, “आरएसएस एक बुद्धिविरोधी संगठन है, इसलिए उसमें बुद्धिजीवी कैसे पैदा हो सकते हैं?” ये एक लाइन आरएसएस को समझने के लिए काफी है।

तमाम विशिष्टताओं के बाद भी राजकिशोर का व्यक्तित्व सामान्य, लेकिन गंभीर था। ऐसा लगता था जैसे कि उन्हें अपनी साधारणता को बचाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा था। उनमें मनोहर श्याम जोशी वाली चमक, अज्ञेय वाली भव्यता और ओम थानवी जैसा दबदबा नहीं था, लेकिन फिर भी वे खास थे।

राजकिशोर के परिश्रम, लगन, अध्ययन और लेखन से नए लेखकों को ईष्या होनी ही चाहिए। वे ‘आज के प्रश्न’ नाम की विचारोत्तेजक श्रृंखला के लिए याद किए जाएंगे। हिंदी में दलित प्रश्न, कश्मीर समस्या, अयोध्या विवाद, सांप्रदायिकता, स्त्री विमर्श जैसे ज्वलंत सवालों पर ऐसा काम कम ही हुआ है। और जो कुछ भी हुआ है, उनमें से एक के सूत्रधार राजकिशोर थे।

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Published: 04 Jun 2018, 4:59 PM
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