रामलीला मैदान ने लिख दी सत्ता के खिलाफ भारत के आक्रोश और विपक्षी एकजुटता की नई इबारत
दिल्ली के रामलीला मैदान ने नई सियासत इबारत लिख दी है। रविवार को यह मैदान बीजेपी के राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती देने को प्रतिबद्ध विपक्षी एकता और एकजुटता का मंच बन गया। बदले चेहरों, नारों के साथ बदले राजनीतिक समीकरणों का साक्षी बन गया है यह ऐतिहासिक मैदान।

समय अक्षत, अनंत, अचूक होता है। कालचक्र घूमता रहता है और अपना पूरा चक्कर लगाने के बाद परिदृश्य कुछ और ही सामने रखता है। रामलीला मैदान में भी समय का चक्र पूरा घूम चुका है, पात्र बदल गए हैं, रणक्षेत्र वही है। वह मैदान जो कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का मुख्य केंद्र था, जिसके कारण 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को सत्ता गंवानी पड़ी थी, वही मैदान रविवार को एक नई सियासी इबारत लिख रहा था। यह गवाह बना उस विशाल जनसमुदाय और राजनीतिक एकजुटता का जिसकी अनुगूंज लुटियंस ज़ोन में सत्ता के गलियारों में आने वाले दिनों में चेतावनी के रूप में सुनाई देगी।
रामलीला मैदान अन्ना हजारे की अगुवाई में कभी कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंदी का गवाह बना था, और तब बीजेपी ने पर्दे के पीछे रहकर उसे समर्थन दिया था, लेकिन रविवार (1 नवंबर, 2026) को उसी बीजेपी सरकार के खिलाफ कांग्रेस की अगुवाई में देश लामबंद हो रहा था। और कोई इस महारैली को चुपके से या पर्दे के पीछे से नहीं, बल्कि मंच पर खड़े होकर, देश दिल्ली की सड़कों से होते हुए कसी मुट्ठियों के साथ इसी मैदान से बीजेपी की तानाशाही को चुनौती दे रहा था।

इस ऐतिहासिक मैदान पर 21 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों और अन्य संगठनों के इंडिया ब्लॉक ने जो एकजुटता दिखाई, वह इस बात का प्रमाण है कि बीते 2 साल में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि इस एकजुटता में लगभग वे सभी सिविल सोसायटी प्रतिनिधि और एक्टिविस्ट शामिल थे जो 2010 के बाद से यूपीए सरकार के खिलाफ आंदोलन में अग्रणी भूमिका में रहे थे। अब इनमें से अधिकांश उसी दल के साथ विपक्षी एकता का मंच साझा कर रहे थे।
सीपीएम, सीपीए (एमएल) और छात्र कार्यकर्ताओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। सीपीएम और सीपीआई (एमएल) दोनों ही दलों ने अन्ना आंदोलन का समर्थन किया था। लेकिन इस बार मंच पर सीपीएम महासचिव एम ए बेबी और सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य न सिर्फ मंच पर मौजूद थे, बल्कि उन्होंने रामलीला मैदान में मौजूद विशाल जनसमूह के सामने अपने विचार भी रखे।
सीपीएम महासचिव एम ए बेबी ने कहा, “मोदी झूठ के सम्राट हैं। वे महिलाओं, किसानों और देश की जनता यानी हर किसी से—सबसे ज़्यादा झूठ बोलते हैं। उनका फासीवाद इस देश में नहीं चल पाएगा। ‘वोट की चोरी’ को रोकने और लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा करने के लिए, हमें एकजुट होकर एक साथ लड़ना होगा।”
ध्यान रहे कि 2014 से 2026 के बीच, भारतीय राजनीति में जमीन-आसमान का बदलाव आया है। सांप्रदायिक राजनीति अब एक आम बात हो गई है, जो मीडिया कभी काफी हद तक स्वतंत्र था, वह अब पूरी तरह से सत्ता की गोद में बैठकर उसका पिछलग्गू बन गया है, और 'क्रोनी कैपिटलिज्म' (मित्रों की पूंजीवाद व्यवस्था) भारतीय अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता बनकर उभरी है।
इस दौरान कांग्रेस में भी बड़ा बदलाव आया है। कभी सत्ता में रहते हुए भ्रष्टाचार-विरोधी बड़े आंदोलन का सामना करने वाली यह पार्टी, अब बीजेपी के खिलाफ विपक्ष की लड़ाई का नेतृत्व करने वाली मुख्य ताकत बनकर उभरी है।

कांग्रेस, जो कभी ताकतवर भ्रष्टाचार विरोधी लामबंदी के खिलाफ बचाव की मुद्रा में थी, अब बीजेपी के खिलाफ व्यापक विपक्षी अभियान का नेतृत्व कर रही है। फिर भी, राजनीतिक परिवर्तन की मांग और जवाबदेही का प्रश्न हमेशा की तरह प्रासंगिक बना हुआ है। और अगर इस मांग की कोई तात्कालिकता है तो रविवार की रैली में स्पष्ट दिख रही थी।
इस राजनीतिक उलटफेर को राहुल गांधी से बेहतर शायद ही कोई समझ सकता है, जिन्होंने पिछले 12 वर्षों का एक बड़ा हिस्सा लगातार राजनीतिक हमलों, सोशल मीडिया पर मज़ाक और अक्सर उनके प्रति शत्रुतापूर्ण रहे मीडिया द्वारा बनाए गए माहौल का सामना करते हुए गुजारा है। रैली के अपने भाषण में उन्होंने साफ कहा, "हिंदुस्तान के हर नागरिक की आवाज़ उठनी चाहिए — मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।"
राहुल गांधी ने इस सभा को केवल राजनीतिक दलों के शक्ति-प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि जनता की चिंताओं की सामूहिक अभिव्यक्ति के तौर पर पेश करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि युवाओं, किसानों और मज़दूरों की आवाज़ें लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की मांग कर रही हैं।
राजनीतिक भाषणों से इतर, राहुल का संदेश वहां मौजूद लोगों के एक बड़े हिस्से पर खास असर डालता दिखा। हरियाणा से आए कई किसानों का कहना था कि उनका मानना है कि राहुल कई सालों से देश को सरकार की नीतियों के नतीजों के बारे में आगाह कर रहे थे, लेकिन लोगों ने उनकी चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया।
वहीं प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कहा, "राहुल गांधी हमें कई सालों से बता रहे थे, लेकिन हमने उनकी बात अनसुनी कर दी। अब हम इसके नतीजे भुगत रहे हैं।" उन्होंने पिछले कई दशकों से झेल रहे गंभीर बिजली संकट का भी जिक्र किया।
छत्तीसगढ़ से आईं आदिवासी महिलाओं के ए का कहना था कि कि वे राहुल गांधी की राजनीति को सबको साथ लेकर चलने और लोगों को एकजुट करने वाली राजनीति के रूप में देखती हैं। उन्होंने कहा, "राहुल गांधी सबको साथ लेकर चलते हैं। बीजेपी ने लोगों के बीच बंटवारा पैदा किया है। हम बंट नहीं सकते।"
रविवार की महारैली में रामलीला मैदान के प्रतीकात्मक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 12 साल पहले, यही मैदान एक ऐसे राजनीतिक आंदोलन का शुरुआती केंद्र बना था, जिसने कांग्रेस को सत्ता से हटाने में मदद की थी। रविवार को, यही मैदान बीजेपी के राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए प्रतिबद्ध विपक्ष की एकता और एकजुटता का मंच बन गया। चेहरे, नारे और राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं, रामलीला मैदान एक बार फिर प्रतिरोध का स्थल बन गया है। इस बार राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक भारतीय जनता के असंतोष को एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल रहे हैं।
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