मशहूर आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार का निधन, 83 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

प्रयागराज में हिंदी के मशहूर आलोचक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजेंद्र कुमार का 83 साल की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से दुखद खबर सामने आई है, जहां हिंदी साहित्य के विद्वान और मशहूर आलोचक प्रोफेसर राजेंद्र कुमार का गुरुवार रात निधन हो गया। 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन से साहित्य प्रेमियों और शिक्षण जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

हिंदी साहित्य के सम्मानित आलोचक

प्रो. राजेंद्र कुमार का नाम हिंदी साहित्य के आलोचना खंड में विशेष रूप से लिया जाता है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का अध्यक्ष पद संभाला और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक-साहित्यिक पदों पर भी काम किया।


बीमारी और अंतिम समय

पिछले करीब एक साल से प्रो. कुमार गले के कैंसर से पीड़ित थे। उनका इलाज प्रयागराज के कमला नेहरू अस्पताल में चल रहा था, जहां गुरुवार रात में उन्होंने अंतिम सांस ली।

साहित्यिक समुदाय में शोक

उनके निधन की खबर मिलते ही इलानगंज स्थित उनके आवास पर शिक्षकों, शोधार्थियों, साहित्यकारों और शुभचिंतकों की भीड़ जमा हो गई। लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने और अंतिम दर्शन करने के लिए पहुंच रहे हैं। प्रो. कुमार हमेशा अपनी सरलता, गहन विचारशीलता और हिंदी साहित्य के लिए गहरे समर्पण के लिए जाने जाते थे।


देहदान की अंतिम इच्छा

प्रो. कुमार ने अपने जीवन में देहदान की इच्छा व्यक्त की थी। उनके बेटे प्रियम अंकित ने बताया कि उनकी इस अंतिम इच्छा का सम्मान किया जाएगा। दोपहर को एसआरएन अस्पताल में उनका देहदान किया जाएगा, जैसा कि उन्होंने चाहा था।

प्रो. राजेंद्र कुमार का साहित्यिक योगदान

प्रो. राजेंद्र कुमार का योगदान सिर्फ पढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहा। वे आलोचक के रूप में हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान रखते थे और अनेक साहित्यिक चर्चाओं, संगोष्ठियों और आलोचनात्मक चर्चाओं का हिस्सा रहे। उनकी आलोचनात्मक शैली ने हिंदी साहित्य में कई महत्वपूर्ण मापदंड स्थापित किए।

उनकी विद्वता सिर्फ आलोचना तक सीमित नहीं थी। प्रो. कुमार ने कई शोधार्थियों को मार्गदर्शन भी दिया और साहित्यिक चिंतन को नए दृष्टिकोण दिए। इसी वजह से उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की भावना को व्यापक समर्थन मिला है।

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