जज लोया मामला: सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई पुनर्विचार याचिका, चूक से भरे फैसले को वापस लेने की मांग

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष गलत और अनापेक्षित था और उसे वापस लिया जाना चाहिए और उस पर फिर से विचार करना चाहिए।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी पुनर्विचार याचिका में बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने कोर्ट से 19 अप्रैल के अपने उस आदेश को वापस लेने की मांग की है, जिसमें दिसंबर 2014 में नागपुर में सीबीआई के विशेष जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस खानविल्कर और जस्टिस चंद्रचूड़ की तीन सदस्यों वाली बेंच ने याचिकाकर्ताओं को न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खुला हमला करने के लिए फटकार लगाई थी। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जजों के उन बयानों पर संदेह करने के लिए भी याचिकाकर्ताओं की आलोचना की थी जिनमें जज लोया की मौत का कारण दिल का दौरा बताया गया था।

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष गलत और अनापेक्षित था और उसे वापस लिया जाना चाहिए और उस पर फिर से विचार करना चाहिए। एसोसिएशन ने निम्नलिखित बातें कही हैं:

1. एसोसिएशन खुद से सुप्रीम कोर्ट नहीं गई थी, बल्कि उसने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपनी याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि याचिका को उच्चतम अदालत में ट्रांसफर किया जाए।

2. याचिका में जज लोया की मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी, जिसे न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल नहीं कहा जा सकता।

3. महाराष्ट्र सरकार के पास ऐसी किसी जांच को नहीं कराने या उसका विरोध का कोई कारण नहीं है।

4. महाराष्ट्र सरकार ने 23 नवंबर 2017 को विभागीय जांच के आदेश दिए थे। ऐसा उसने कैरावन पत्रिका द्वारा जज लोया की मौत पर संदेह जताने वाली रिपोर्ट प्रकाशित करने के 4 दिन बाद किया था।

5. इंटेलीजेंस के महाराष्ट्र कमिश्नर ने 28 नवंबर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। उन्होंने इस मामले से जुड़े किसी भी व्यक्ति से मुलाकात किए बिना ऐसा किया।

6. कैरावन पत्रिका ने सिर्फ जज बार्डे का नाम लिया था, जबकि इंटेलीजेंस के कमिश्नर ने बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को जो पत्र लिखा उसमें पांच जजों के बयान लेने का आग्रह था।

7. कमिश्नर द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के एक दिन पहले 27 नवंबर को पांच जजों ने मीडिया के एक हिस्से को संबोधित किया और जजों ने जो कुछ भी कहा था उसे रिपोर्ट में लिख दिया गया।

8. महाराष्ट्र सरकार ने याचिकाओं को लेकर कोई हलफनामा या जवाबी-हलफनामा दायर न कर गलती की और सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अफसर की गैर-विधिपूर्ण रिपोर्ट पर भरोसा कर और याचिकाकर्ताओं को उन जजों से जिरह करने का मौका न देकर गलती की।

9. याचिका ने ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ जैसी स्थिति की तरफ इशारा किया जिसमें अगर एसोसिएशन कमिश्नर की रिपोर्ट को स्वीकार कर लेता, तो जांच की मांग वाली उसकी याचिका खारिज हो जाती। लेकिन रिपोर्ट पर सवाल उठाकर और उसकी आलोचना कर एसोसिएशन को न्यायिक संस्थानों की विश्वसनीयता को कथित रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के गुस्से का सामना करना पड़ा।

10.सुप्रीम कोर्ट ने कैरावन पत्रिका को नोटिस न भेजकर, दिवंगत जज लोया के बेटे, बहनों और पिता को न बुलाकर और कैरावन पत्रिका द्वारा उनके पूरे वीडियो इंटरव्यू को न देखकर भी गलती की।

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि स्वतंत्र जांच की याचिका को खारिज करना गलत था क्योंकि यह उस धारणा पर आधारित था कि ‘पांच जजों द्वारा पुलिस को दिए गए बयानों को स्वीकार किया जाना चाहिए और उस पर किसी को सवाल नहीं उठाना चाहिए।’

उच्चतम न्यायालय ने इस तथ्य को भी नजरअंदाज किया कि महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे कई वकील जज लोया की मृत्यु के समय उनके द्वारा सुने जा रहे मुकदमे में एक आरोपी के भी वकील थे।

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