इलेक्शन हाईवे: सबरीमला तो चुनावी मुद्दा है ही नहीं केरल में, फिर भी भगवा दल इसे भुनाने की कोशिश में

केरल की सभी 20 सीटों पर कल यानी 23 अप्रैल को मतदान होगा। क्या केरल में सबरीमला मुद्दा तय कर रहा है मतदाताओं का मिज़ाज? यही पड़ताल की हमने, और सामने आया कि केरल को लोगों के लिए रोजगार और शासन ही अहम हैं, वे धर्म और राजनीति को अलग-अलग ही रखते हैं।

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के लिए बनी महिला श्रंखला की फाइल फोटो
सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के लिए बनी महिला श्रंखला की फाइल फोटो
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ऐशलिन मैथ्यू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ अपने ही बारे में बातें की, जबकि एनडीए के दूसरे नेता सबरीमला, धर्म और मंदिर प्रशासन की बातें करते रहे हैं। हाल ही में पथनमिट्ठा पहुंचे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी कहा कि यह धर्म का मामला है, लेकिन अल्पसंख्यक बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में उनकी बातों से प्रभावित होते नजर नहीं आए लोग।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब केरल की सीपीएम की अगुवाई वाली एलडीएफ सरकार ने सबरीमला में महिलाओं की अनुमति दी, तो कई गुटों ने इसका हिंसक विरोध किया था।

लेफ्ट सरकार के इस कदम से भगवा पार्टी को अपना आधार बनाने का अवसर नजर आया। लेकिन, कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने इस मुद्दे पर अपने रुख से उसकी कोशिशों पर पानी फेर दिया। साथ ही इस मुद्दे पर कट्टरपंथी लोगों के साथ खड़े होने से कई लोग नाराज भी हुए।

तिरुवनंतपुरम में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार वी गोपाकुमार कहते हैं कि, “इससे हुआ यह कि केरल का भगवाकरण होते-होते रह गया। बीजेपी और एनडीए की पार्टियों ने राज्य में एलडीएफ और यूडीएफ दोनों गठबंधनों के लिए खतरा खड़ा कर दिया था। यूडीएफ के इस रुख से कि धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं होना चाहिए, उन्हें फायदा हो रहा था। लेकिन इसी बीच बीजेपी ने दोहरा रुख अपना लिया जिससे लोगों के बीच उनकी पोल खुल गई। बीजेपी ने वोटों की उम्मीद में हिंसा का सहारा लिया, लेकिन लोग इससे बेहद नाराज हो गए। नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का समर्थन करने वाले भी यूडीएफ की तरफ चले गए।”

मन्नार के करीब थिवेली की रहने वाली एक हिंदू महिला 43 वर्षीय मिनी कहती हैं कि, “सबरीमला आस्था का मामला है। मैं इसके आधार पर वोट नहीं दूंगी। बहुत हिंसा हुई इस मामले में। हमें तो ऐसे लोग चाहिए जो हमारी मदद करें और हमारे लिए काम करें। बाढ़ के वक्त कोई हमारी मदद को नहीं आया था। हमारे पड़ोस में मुस्लिम परिवार रहता था, सिर्फ उन्हीं लोगों ने हमारी मदद की। ऐसे में हम उन लोगों को वोट कैसे दे दें जो मुसलमानों का विरोध करते हैं।”

वहीं पलक्कड के अलाथुर में रहने वाले श्रीकुमार का मानना है कि, “बीजेपी हिंसा को वोटों में नहीं बदल सकती। सबरीमला भावनाओं का मामला है, लेकिन केरल के लोग इस आधार पर वोट नहीं देते। हालांकि लेफ्ट सरकार ने थोड़ा सकुचाते हुए इस मामले में कार्यवाही की, लेकिन वे तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन ही कर रही थी।” श्रीकुमार नायर हैं और थिरुवला बस स्टैंड के पास एक बेकरी में काम करते हैं।

लेकिन थिरुवनंतपुरम में ऑटोरिक्शा चलाने वाले राजेश का मानना है कि कोई भी सरकार आए कोई फर्क नहीं पड़ता। उसकी नजर में लेफ्ट और बीजेपी दोनों ही हिंसा का सहारा लेते हैं। उसका मानना है कि, “फर्क इतना है कि बीजेपी खुलकर हिंसा करती है। हर कोई सबरीमला का फायदा उठाना चाहता है, लेकिन यह तो आस्था का मामला है, सरकार चलाने का नहीं। हम तो सरकार चुनते हैं।” उसने बताया कि उसके रिक्शा में बैठने वाले बहुत से लोगों से उसने बात की और ज्यादातर का मानना है कि आस्था और सरकार को अलग-अलग ही रहना चाहिए।

लेकिन सबरीमला मुद्दे ने सभी राजनीतिक दलों की असलियत खोलकर रख दी। जहां बीजेपी और संघ इस मुद्दे को वोटों में भुनाने की कोशिश में लगी थी, वहीं कांग्रेस ने भी इसमें कूदकर खेल खेला। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बी आर पी भास्कर कहते हैं कि, “हालांकि राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने साथ ही केरल कांग्रेस को इस मुद्दे पर कोई भी फैसला लेने का अधिकार दे दिया था, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे केरल में बीजेपी को हिंदू सवर्णों का समर्थन मिल सकता है।”

भास्कर ने इस मुद्दे को समझाते हुए बताया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में था तभी यूडीएफ ने साफ कर दिया था कि वह रजस्वला महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के खिलाफ है, लेकिन एलडीएफ सरकार इस पाबंदी को हटाना चाहती थी। शुरु में तो एलडीएफ ने अपने नियंत्रण वाले देवासम बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा करने को कहा था, लेकिन जब उसने देखा कि बीजेपी इस मुद्दे का फायदा उठाना चाहती है तो उसने अपना रुख साफ करते हुए मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दे दी।

भास्कर का मानना है कि केरल में कट्टरपंथ धीरे-धीरे जड़े जमा रहा है। ऐसे में बीजेपी को अपने लिए मौके दिख रहे हैं। लेकिन उसने इस मामले में आरएसएस के गुंडा तत्वों को आगे कर हाथ आए मौके को खो दिया।

तो क्या सबरीमला मुद्दा ही रहेगा वोटिंग का आधार? नहीं, ऐसा मानना है पथनमिट्ठा लोकसभा सीट के वोटर 25 वर्षीय अजित पी का। उसका मानना है कि राजनीति और धर्म दोनों अलग-अलग हैं। वहीं थिरुवनंतपुरम के मार्टिन जोसेफ कहते हैं कि रोजगार और नौकरियां ही सबसे बड़े मुद्दे हैं। बीजेपी ने कोशिश तो की थी, लेकिन लेफ्ट सरकार ने उसकी कोशिशों के सामने महिलाओं की दीवार खड़ी कर दी। जोसेफ मानते हैं कि खून की बुनियाद पर बनी सरकार कोई नहीं चाहता। ऐसी सरकार ज्यादा दिन नहीं ठहरती है, क्योंकि उन्हें आम लोगों की परेशानियों से कोई वास्ता नहीं होता।

भास्कर इससे सहमत दिखते हैं। उनका कहना है कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरा चुनाव किसी एक मुद्दे के आसपास आ गया हो। उनके मुताबिक केरल के ज्यादातर वोटर या तो एलडीएफ के साथ है या यूडीएफ के, बस कुछ मामूली से लोग ही भगवा दलों के समर्थन में नजर आते हैं। उनका मानना है कि, “बहुत छोटा तबका एलडीएफ और यूडीएफ के बीच इधर-उधर होता रहता है और इसी से चुनाव का नतीजा तय होता है।”

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