महिलाओं पर बयान देने वाले मुफ्ती को शबनम हाशमी की खरी-खरी, कहा- हम किसी की संपत्ति नहीं, आजादी से समझौता नहीं

‘हमें आपकी हिफाजत की नहीं बल्कि स्वतंत्रता की जरूरत है। जो भी महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिश करेगा उसे चुनौती दी जाएगा।’ यह कहना है शबनम हाशमी का। उन्होंने केरल के मुफ्ती को बयान को बेहद अपमानजनक करार दिया है।

केरल के मुफ्ती अबुबकर और सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी
i

सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने केरल के उस मौलाना को खरी-खोटी सुनाई है जिसने कहा था कि ‘महिलाओं को घर के अंदर ही रहना चाहिए और सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाना चाहिए।‘कोच्चि में 'हब्बल रसूल' कॉन्फ़्रेंस में बोलते हुए, कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार के नाम से जाने जाने वाले इस धर्मगुरु ने महिलाओं की तुलना सोने के गहनों से की, जिन्हें डिब्बे में सुरक्षित रखा जाता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर लाने से भारी तबाही हो सकती है।

शबनम हाशमी ने इस सिलसिले में एक सार्वजनिक बयान जारी किया है। उन्होंने कहा है कि महिलाएं किसी की संपत्ति नहीं हैं और उनकी स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने अबुबकर के इस प्रतिगामी और बेहद निराशाजनक बयान पर कहा है कि मौलाना को खुद को इस्लामिक विद्धान के तौर पर प्रतिष्ठापित करने से पहले भारतीय संविधान और कुरआन के साथ ही इस्लामी इतिहास के बारे में अपनी समझ को बदलने और अपग्रेड करने की जरूरत है। शबनम ने कहा कि महिलाओं कि मौलाना की टिप्पणी सुरक्षा के बारे में नहीं है। बल्कि यह पितृसत्तात्मक नियंत्रण, सामंतवादी सोच का नतीजा है जिसमें महिलाओं की आजादी नियंत्रित करने की कोशिश है। उन्होंने कहा है कि जब महिलाओं को किसी वस्तु की तरह मानकर कहा जाता है कि उनकी सार्वजनिक नुमाइश न हो या उनसे खतरा हो सकता है, तो यह सिर्फ आपत्तिजनक बात नहीं है बल्कि इंसान होने का हक छीनने की बात है।

शबनम हाशमी ने कहा कि ‘महिलाएं कोई संपत्ति या चीज़ नहीं हैं। उन्हें आज़ादी से घूमने-फिरने, पढ़ाई करने, काम करने, यात्रा करने, अपनी बात कहने, संगठन बनाने या सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के लिए धार्मिक अधिकारियों की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं है।‘ उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए कहा है कि ‘भारतीय संविधान हर नागरिक को लिंग, जाति या धर्म से परे समानता, सम्मान और कहीं भी आने-जाने की आज़ादी की गारंटी देता है। किसी भी धर्मगुरु, धार्मिक संस्था या नैतिकता के स्वयंभू रक्षक को इन संवैधानिक गारंटियों से ऊपर खुद को रखने का कोई अधिकार नहीं है।’

उन्होंने मुफ्ती कांतापुरम को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा है कि अगर मुफ़्ती कांतापुरम अपनी बात को सही ठहराने के लिए इस्लाम का सहारा लेना चाहते हैं, तो उन्हें खुद इस्लामी इतिहास को फिर से देखना चाहिए। इतिहास में मुस्लिम महिलाएं विद्वान, शिक्षिकाएं, व्यापारी, लेखिकाएं, राजनीतिक हस्तियां, ज्ञान की संरक्षक और सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली भागीदार रही हैं। उन्होंने केरल का ही जिक्र करते हुए कहा कि, ‘केरल में ऐसी कई प्रभावशाली मुस्लिम महिला लेखिकाएं हुई हैं जिन्होंने महिलाओं के जीवन के बारे में पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दी है। मशहूर मलयालम लेखिका खदीजा मुमताज़ ने मुस्लिम महिलाओं पर लगाई गई पाबंदियों के बारे में बहुत साफ़-साफ़ लिखा है।’


उन्होंने कर्नाटक का भी हवाला देते हुए कहा कि, ‘और पड़ोसी राज्य कर्नाटक से आती हैं मशहूर कन्नड़ लेखिका, एक्टिविस्ट और वकील बानू मुश्ताक, जिनकी किताब 'हार्ट लैंप' ने इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ जीता। उनकी लेखनी मुस्लिम समुदायों की महिलाओं और लड़कियों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और उनके संघर्षों को आवाज़ देती है।‘ उन्होंने कहा कि इन महिलाओं ने महिलाओं पर अधिकार जताने से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण काम किया है: उन्होंने महिलाओं की बात सुनी है, उनकी ज़िंदगी के बारे में लिखा है और सत्ता पर सवाल उठाए हैं। महिलाओं के बारे में बात करने और महिलाओं के साथ खड़े होने में यही फ़र्क है।

शबनम हाशमी ने केरल के साहित्यिक इतिहास, सामाजिक सुधार और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी की बात की है। उन्होंने कहा कि साक्षरता, सामाजिक सुधार और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी के मामले में केरल का इतिहास शानदार रहा है। इसलिए, यह राज्य महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रखने वाली सामंती सोच की ओर लौटने के बजाय, कहीं बेहतर स्थिति का हकदार है। केरल ने जस्टिस फातिमा बीवी जैसी शख्सियतें दी हैं, जो भारत के सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज बनीं।

सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने आगे कहा कि, ‘और ऐसे समय में जब देश ज्योतिराव फुले की 200वीं जयंती मनाने की तैयारी कर रहा है, हमें ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की क्रांतिकारी सोच का जश्न मनाना चाहिए; इन तीनों ने मिलकर 1848 में पुणे में भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था।‘

शबनम हाशमी ने कहा कि, ‘उन्होंने लगभग दो सदी पहले ही यह समझ लिया था कि एक न्यायपूर्ण समाज बनाने के लिए लड़कियों को शिक्षित करना और महिलाओं को उन पर थोपी गई बंदिशों से बाहर निकालना ज़रूरी है। यह शर्म की बात है कि लगभग दो सदियों बाद भी, हमें उन आवाज़ों के ख़िलाफ़ लड़ना पड़ रहा है जो महिलाओं से कहती हैं कि उन्हें घर के अंदर ही रहना चाहिए।’

उन्होंने आगे कहा कि इतिहास आगे बढ़ा है। महिलाएं आगे बढ़ी हैं। भारत आगे बढ़ा है। ये दकियानूसी आवाज़ें ही हमें पीछे खींचने की कोशिश कर रही हैं। हमें तय करना होगा कि हम कैसा भारत चाहते हैं: सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ वाला भारत, जिन्होंने लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोले, या ऐसा भारत जहां धर्मगुरु उन दरवाज़ों को फिर से बंद करने का अधिकार जताते हैं।

अब पीछे नहीं लौटा जा सकता।

शबनम ने अपने बयान में ‘ध्यान भटकाने की राजनीति’ शीर्षक देते हुए कहा है कि, ‘खास तौर पर चिंता की बात ऐसे बयानों के आने का राजनीतिक समय है। जब भी बीजेपी दबाव में होती है, तो महिलाओं के पहनावे, उनकी आवाजाही, नैतिकता, धर्म और "परंपरा" जैसे मुद्दों पर बनावटी विवाद खड़े करके जनता का ध्यान भटकाना राजनीतिक रूप से बहुत फायदेमंद होता है। ऐसे बयान उन ताकतों के लिए काम के हथियार बन सकते हैं जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से फलती-फूलती हैं।‘


उन्होंने गुजरात का भी जिक्र करते हुए कहा कि ‘हमने यह राजनीति बार-बार देखी है, जिसमें गुजरात भी शामिल है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि धार्मिक नेता भड़काऊ बयान देकर इस राजनीति का हिस्सा बनते हैं, जिनका इस्तेमाल हिंदू-मुसलमानों के बीच एक और टकराव पैदा करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा सकता है।‘

शबनम ने अपने बयान में हाल के जेन-ज़ी और जेन-अल्फा के आंदोलनों का भी हवाला दिया है। उन्होंने कहा है कि ‘और इस समय ऐसा बयान आना काफी हम हो जाता है। पूरे देश में जेन-ज़ी और जेन-अल्फा अपनी आवाज़ उठा रहे हैं। युवा लोग सत्ता पर सवाल उठा रहे हैं, जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और डर, नियंत्रण और चुप कराने की राजनीति को मानने से इनकार कर रहे हैं। ठीक ऐसे ही समय में, सार्वजनिक चर्चा को वापस महिलाओं की आवाजाही, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी को नियंत्रित करने की ओर मोड़ने की कोशिशों को उसी रूप में देखा जाना चाहिए, जो वे असल में हैं: यह न केवल पितृसत्तात्मक सत्ता को बनाए रखने की एक हताश कोशिश है, बल्कि फासीवादी ताकतों को मज़बूत करने में मदद करना भी है।‘

उन्होंने अंत में कहा है कि, ‘हमें आपकी हिफाजत की नहीं बल्कि स्वतंत्रता की जरूरत है। जो भी महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिश करेगा उसे चुनौती दी जाएगा।’ उन्होंने कहा कि एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक विमर्श में ऐसे भड़काऊ बयान देने से आखिर फायदा किसे होता है? उन्होंने कहा कि जब देश में बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा, शिक्षा, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक आजादी और जवाबदेही की मांग सत्ता से की जा रही है, ऐसे वक्त में हमें फिर से ऐसी बहसों में धकेला जा रहा है कि महिलाओं सार्वजनिक जगहों पर जाने की इजाजत दी जाए या नहीं।

उन्होंने कहा कि हम ऐसे भटकाव वाले बयानों को खारिज करते हैं। महिलाएं मोहरे नहीं हैं। कोई धार्मिक मौलवी बोले, नेता बोले या कोई और, महिलाओं की आजादी का मोलभाव नहीं हो सकता। मुस्लिम महिलाएं  प्यादे नहीं हैं। हिंदू महिलाएं मोहरे नहीं हैं। कोई भी महिला किसी की संपत्ति नहीं है। हम पितृसत्तात्मक नियंत्रण और उसका हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाली मतलबी राजनीति, दोनों को खारिज करते हैं।

धार्मिक अधिकार का मतलब यह नहीं है कि आप संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन कर सकें। और जब मशहूर हस्तियां बार-बार अपने अधिकार का इस्तेमाल ऐसे विचारों को बढ़ावा देने के लिए करती हैं जो महिलाओं की बराबरी और आज़ादी को नकारते हैं, तो उन्हें चुनौती दी जानी चाहिए—सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वे धार्मिक अधिकार रखते हैं, उनकी बात मान नहीं लेनी चाहिए।

अब समय आ गया है कि ऐसे नेता युवा पीढ़ी के लिए रास्ता बनाएं, जो यह समझती हो कि आस्था और आज़ादी एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं; कि महिलाएं बराबर की नागरिक हैं; और यह कि सम्मान और खुद फ़ैसला लेने का अधिकार पुरुषों द्वारा दी जाने वाली कोई सुविधा नहीं है। उन्होंने कहा कि, ‘महिलाएं हमें वापस घर में धकेलने की कोशिशों को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगी। हम इसे आसानी से बर्दाश्त नहीं करेंगे।

हमारी आज़ादी पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

हमारी बराबरी पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

हमारे संवैधानिक अधिकारों पर कोई समझौता नहीं हो सकता।

महिलाएं खुद तय करेंगी कि हम कहां जाएं, क्या पढ़ें, कैसे जिएं और कैसा भविष्य चाहते हैं।

कोई धर्मगुरु, कोई राजनेता या कोई पुरुषवादी सोच वाला व्यक्ति हमारे लिए यह तय नहीं करेगा।

अब पीछे मुड़कर नहीं देखा जा सकता।’

शबनम हाशमी का बयान नीचे दिए लिंक में भी पढ़ सकते हैं: