श्रीदेवी का जाना : कुछ ‘लम्हों’ की ‘चांदनी’ से ‘जुदाई’ का ‘सदमा’

फ़िल्म ‘मॉम’ में बेटी के गैंगरेप का बदला लेने निकली माँ के रूप में वो जब पूछती हैं कि अगर ग़लत और बहुत ग़लत में से चुनना हो तो आप किसे चुनेंगे? यह श्रीदेवी के व्यक्तित्व को भी सामने रखती थीं।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

‘सदमा’ की वह 20 साल की मासूम सी लड़की जो अपनी पिछली जिंदगी भूल चुकी थी। इस लड़की को जब लोगों ने कमल हासन के साथ देखा था तभी अहसास हो गया था कि शरारती-बोलती आंखों वाली यह लड़की फिल्म इंडस्ट्री पर राज करेगी।

एक बार किसी इंटरव्यू में फिल्मकार शेखर कपूर ने कहा था कि श्रीदेवी के चेहरे के भाव, उनकी आंखें इतनी मोहक थीं, कि उनका बस चलता तो वह उनके साथ की गई हर फिल्म को उनके चेहरे के क्लोजअप में ही शूट करते।

श्रीदेवी ऐसी अभिनेत्री थीं, जो हर उस चरित्र में ऐसे घुलमिल जाती थीं, मानो वह बनी ही उस रोल के लिए हो।

हाथों में नौ-नौ चूड़ियां पहन गुदगुदाते अंदाज़ में उनका नृत्य हो और फिर इसी फिल्म में 'चांदनी' नाम की उस लड़की का रोल हो जो अपने मंगेतर के ठुकराए जाने से दुखी तो है, पर किसी और के साथ दोबारा ज़िंदगी शुरू करने से हिचकिचाती नहीं भले ही वो कोशिश नाकाम रही। श्रीदेवी ने अपने समय से आगे की फिल्में उस दौर कीं, जब वह सफलता के शीर्ष पर थीं। फिर अपनी उम्र से दोगुने व्यक्ति से प्रेम करने का साहस करने वाली 'लम्हे' की पूजा का रोल हो या फ़िल्म 'मॉम' में अपनी बेटी के गैंगरेप का बदला लेने निकली माँ का वो रूप जिसमें वो पूछती हैं कि अगर ग़लत और बहुत ग़लत में से चुनना हो तो आप किसे चुनेंगे? यह श्रीदेवी की फिल्मी भूमिकाएं तो थी, लेकिन व्यक्तित्व को भी सामने रखती थीं।

अभी पिछले साल ही श्रीदेवी ने फ़िल्मों में 50 साल पूरे किए। और महज 54 साल की उम्र में चली गईं। 51 साल पहले चार साल की एक छोटी-सी बच्ची पहली बार तमिल सिनेमा में बड़े पर्दे पर नज़र आई थी। इस फिल्म में उन्होंने एक छोटे लड़के का रोल किया था। तमिल-तेलुगू में बाल कलाकार के तौर पर काम करते हुए श्रीदेवी हिंदी सिनेमा तक पहुँची थीं और उन्होंने 1975 में आई 'जूली' फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर देखा था। 1978 में जब भारतीराजा की हिंदी फ़िल्म 'सोलहवां सावन' में श्रीदेवी दिखीं थी तो शायद ही किसी की नज़र फ़िल्म पर पड़ी थी। उस समय श्रीदेवी 75 किलो वजन की एक टिपिकल दक्षिण भारतीय अभिनेत्री लगती थीं। फिर 1983 में 'हिम्मतवाला' रिलीज़ हुई। और इस फिल्म के बाद तो बड़ी-बड़ी आँखों वाली श्रीदेवी ने धीमे-धीमे अपने काम और अभिनय से सबका मुँह बंद करा दिया। आलम यह था कि उस ज़माने में लोग उन्हें 'लेडी अमिताभ' भी कहते थे।

उनके परिवार की बात करें तो पिता के. अयप्पन एक वकील थे और घर में मां, बहन श्रीलता और भाई सतीश थे। उनके पिता राजनीतिज्ञ भी थे और चुनाव भी लड़ा था, श्रीदेवी ने अपने पिता के लिए चुनाव अभियान में हिस्सा भी लिया था। श्रीदेवी की माँ ने शुरुआती दौर में उनके करियर में अहम रोल निभाया।

निजी ज़िंदगी की बात करें तो 90 के दशक में उनके जीवन में उथल पुथल मची, जब बोनी कपूर के साथ उनकी शादी हुई जो पहले से शादीशुदा थे। बतौर निर्देशक बोनी कपूर के साथ वे कई फ़िल्में कर चुकी थीं और 1997 में फ़िल्म 'जुदाई' के बाद उन्होंने लंबा ब्रेक लिया। लेकिन 2012 में जब वो 'इंग्लिश विंग्लिश' में हिंदी फ़िल्मों में लौटीं तो ऐसा लगा ही नहीं कि वो कभी पर्दे से गई थीं।

"मर्द खाना बनाए तो कला है, औरत बनाए तो उसका फ़र्ज़ है"- फ़िल्म में जब वो ये डायलॉग बोलती हैं तो शशि के रोल में एक घरेलू महिला की दबी इच्छाओं, उसकी अनदेखी को बयां कर जाती हैं। पिछले साल 2017 में आई 'मॉम' उनकी आख़िरी फ़िल्म रही। अपनी दोनों बेटियों के साथ श्रीदेवी का बड़ा लगाव था-किसी भी माँ की तरह।

सोशल मीडिया पर अकसर वो अपनी बेटियों के साथ अपनी तस्वीरें डाला करती थीं। उनकी बेटी जाह्नवी की पहली फ़िल्म 'धड़क' पाँच महीने बाद 20 जुलाई 2018 को रिलीज़ होने वाली है। वो अक्सर कहा करती थीं कि 'मदर इंडिया' उनका ड्रीम रोल था। 'मॉम' उनके करियर की आख़िरी और 300वीं फ़िल्म थी।

लेकिन 'चांदनी' की सी रोशनी बिखेरनी वाली, बड़ी बड़ी आँखों वाली श्रीदेवी एकदम जुदा थीं जिनकी फ़िल्में चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट छोड़ जाती हैं।

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