तिरुपति लड्डू मिलावट मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, आंध्र प्रदेश से बाहर ट्रायल कराने की मांग ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने तिरुपति लड्डू मिलावट मामले का ट्रायल आंध्र प्रदेश से बाहर कराने की मांग खारिज कर दी है।

फोटो: सोशल मीडिया
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  • सुप्रीम कोर्ट ने तिरुपति मंदिर के लड्डुओं में कथित मिलावट के मामले की सुनवाई आंध्र प्रदेश से बाहर कराने की मांग खारिज कर दी है।

  • याचिकाकर्ताओं ने सीएम चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के राजनीतिक बयानों का हवाला देकर निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल उठाए थे।

  • अदालत ने कहा कि फिलहाल मुकदमे को दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने का कोई आधार नहीं है, लेकिन भविष्य में समस्या होने पर दोबारा संपर्क किया जा सकता है।

  • CBI के नेतृत्व वाली SIT ने जनवरी 2026 में अंतिम आरोपपत्र दाखिल किया था, जबकि ईडी भी मामले से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही है।

तिरुपति मंदिर के लड्डुओं में कथित मिलावट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे को आंध्र प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने की मांग ठुकरा दी है। अदालत ने गुरुवार को कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके चलते सुनवाई दूसरे राज्य में कराई जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण के लगातार राजनीतिक बयान मामले में अभियोजन की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने माचिंद्र शांताराम लांके और मेसर्स मालगंगा मिल्क एंड एग्रो प्रोडक्ट्स की आपराधिक स्थानांतरण याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि मामले को किसी पड़ोसी राज्य में स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जहां इसे लेकर वैसी भावनात्मक स्थिति न हो। हालांकि, पीठ ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण के बयानों का दिया गया हवाला

सुनवाई के दौरान सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण लगातार इस मामले पर राजनीतिक बयान दे रहे हैं। इससे अभियोजन की निष्पक्षता को लेकर चिंता पैदा होती है। उन्होंने कहा कि मुकदमे की सुनवाई ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां राजनीतिक और भावनात्मक दबाव की आशंका कम हो।

इस पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश से पहले ही सभी को चुप करा चुका है। अदालत ने फिलहाल स्थानांतरण की जरूरत से इनकार किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि यदि भविष्य में ऐसी कोई समस्या सामने आती है तो वे फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।


सितंबर 2024 में शुरू हुआ था तिरुपति लड्डू विवाद

यह विवाद सितंबर 2024 में उस समय सामने आया था, जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि पिछली वाईएसआरसीपी सरकार के कार्यकाल में श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के लड्डू बनाने में इस्तेमाल घी में पशु चर्बी मिलाई गई थी। इस मामले में 30 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने जांच जारी रहने के दौरान सार्वजनिक बयान देने को लेकर मुख्यमंत्री को फटकार लगाई थी। अदालत ने कहा था कि उसे उम्मीद है कि भगवान को राजनीति से दूर रखा जाएगा।

इसके बाद 4 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में गठित स्वतंत्र विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंप दी थी। सीबीआई के नेतृत्व वाली एसआईटी ने जांच पूरी करने के बाद 23 जनवरी 2026 को नेल्लोर की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) अदालत में अंतिम आरोपपत्र दाखिल किया।

जांच में क्या सामने आया, घी के नमूनों में नहीं मिली पशु चर्बी

आरोपपत्र में करनाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान की प्रयोगशाला रिपोर्ट का भी उल्लेख है। संस्थान ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) की ओर से जुलाई 2024 में टैंकरों से लिए गए घी के चार सीलबंद नमूनों की जांच की थी। रिपोर्ट में नमूनों में लार्ड यानी सूअर की चर्बी या अन्य पशु वसा की मौजूदगी नहीं पाई गई थी।

हालांकि, जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि घी में वनस्पति तेलों और प्रयोगशाला में तैयार किए गए एस्टर का मिश्रण मिलाया गया था। दावा है कि इस मिश्रण को इस तरह तैयार किया गया था कि वह डेयरी उत्पादों के रासायनिक मानकों जैसा दिखाई दे। इस बीच, प्रवर्तन निदेशालय ने भी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत ईसीआईआर दर्ज की है।

मार्च 2026 में चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर पिछली सरकार पर मंदिर की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि पिछली सरकार ने मंदिर की छवि धूमिल करने की कोशिश की और सीबीआई के नेतृत्व वाली एसआईटी की रिपोर्ट को लेकर झूठा प्रचार किया।

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