सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के खिलाफ याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा
साल 2018 में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए दिशानिर्देश तय किए थे। कोर्ट में दायर याचिकाओं में इस आदेश पर सही तरह से अमल न होने और भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगने के लिए कोर्ट के दखल की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ कदम उठाने की मांग वाली कई याचिकाओं पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने इस मामले में सभी पक्षकारों से दो हफ्ते में अपनी दलील, स्पष्टीकरण या सुझाव लिखित में जमा करने को कहा है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या सांप्रदायिक आधार पर होने वाली भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगाने के लिए कोई दिशानिर्देश तय किया जाए या कोई व्यवस्था बनाई जाए। 2018 में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए दिशानिर्देश तय किए थे। कोर्ट में दायर याचिकाओं में इस आदेश पर सही तरह से अमल न होने और भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगने के लिए कोर्ट के दखल की मांग की है।
सुनवाई के दौरान वकील निजाम पाशा ने कहा कि शिकायतों के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं होतीं। अगर एफआईआर दर्ज होती है, तो सही धाराएं नहीं लगाई जातीं। शरारत जैसी हल्की धाराएं लगाई जाती हैं। फिर वही लोग राज्यों में ऐसे ही भाषण देते दिखते हैं। जब व्यक्तियों की पहचान हो जाती है तो राज्य कार्रवाई करने में क्यों नाकाम हो रहा है? हेट स्पीच से हेट क्राइम होते हैं।
एडवोकेट एमआर शमशाद ने कहा कि सामान्य हेट स्पीच के अलावा, एक ट्रेंड है कि वे सिर्फ धार्मिक हस्तियों को निशाना बनाते हैं। जब हम शिकायत दर्ज कराते हैं तो एफआईआर सिर्फ इसलिए दर्ज नहीं होती क्योंकि मंजूरी की जरूरत होती है। हिंदू सेना के वकील बरुण सिन्हा ने कहा कि ओवैसी और स्टालिन ने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ सांप्रदायिक बयान दिए हैं। मैंने शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
एडवोकेट संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि एक न्यूज चैनल ने कहा था कि एक समुदाय का अपनी कम्युनिटी के लिए यूपीएससी की कोचिंग का इंतजाम करना 'यूपीएससी जिहाद' है। सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम दो फैसले दिए हैं। दिक्कत यह है कि अक्सर एक आदमी या एक संगठन जिसे अपनी बोलने की आजादी समझता है, वह दूसरे के लिए हेट स्पीच बन जाती है। यह किसी ऐसे व्यक्ति पर हमला करने का सवाल है जिसका सामाजिक स्तर कम है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वकीलों को स्पष्टीकरण, सुझाव और तर्क आदि वाली अपनी बातें फाइल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने आदेश में कहा कि पक्षकार दो हफ्ते के अंदर अपने संक्षिप्त नोट्स फाइल कर सकते हैं। सभी पक्षकारों के अपनी दलील लिखित में पेश करने के बाद मामले पर दोबारा सुनवाई होगी।
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