सुप्रीम कोर्ट ने लगा तो दी EWS कोटे पर मुहर, लेकिन अब भी बचे हैं बहुत से सवाल

वोट बैंक की राजनीति के तहत ईडब्ल्यूएस के लिए कोटे की व्यवस्था की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी वैधानिकता को सही माना है । लेकिन अब भी कई सवाल हैं।

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अजीत रानाडे

जनवरी, 2019 में संसद ने सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिले में एक नया कोटा बनाने के लिए 103वां संविधान संशोधन पारित किया था। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए नया 10 फीसदी कोटा था। इस संशोधन की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गईं। इसकी वजह थी। सत्तारूढ़ बीजेपी को लोकसभा में हासिल जबरदस्त बहुमत की वजह से इस संशोधन को संसद में बिना पर्याप्त विचार-विमर्श या बहस के पारित कर दिया गया था।

संशोधन के खिलाफ तीखी आपत्तियों में से एक तमिलनाडु से द्रमुक सांसद कनिमोझी की भी रही लेकिन कोई सार्थक चर्चा नहीं हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस कोटे को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए इसकी संवैधानिकता को बरकरार रखा। पांच सदस्यीय पीठ में इस बात पर आम सहमति थी कि आर्थिक मानदंड को आरक्षण के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने इसे ही चुनौती दी थी।

पीठ अपने इस निष्कर्ष में भी एकमत थी कि इस नई श्रेणी के कारण संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, और अब ईडब्ल्यूएस) का कुल योग 50 फीसदी से ज्यादा हो जाएगा, लेकिन यह संविधान के खिलाफ नहीं। याचिकाकर्ताओं ने ईडब्ल्यूएस कोटे को जिन तर्कों के आधार पर चुनौती दी थी, उनमें एक यह भी था। केवल एक विषय पर खंडपीठ की राय विभाजित (3:2) थी और वह थी कि क्या एससी, एसटी और ओबीसी समूहों को ईडब्ल्यूएस के नए कोटे से बाहर रखा जा सकता है? यहां भी बहुमत का मानना था कि इन्हें नए कोटे से बाहर रखा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट से इस संशोधन और उस पर वैधता की मुहर के कई बड़े निहितार्थ और आयाम हैं। क्या इस फैसले ने संविधान के बुनियादी ढांचे की रक्षा करने के सिद्धांत को नुकसान पहुंचाया है? 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संविधान के मूल ढांचे की व्याख्या के लिहाज से ऐतिहासिक माना जाता है। इस प्रसिद्ध निर्णय ने स्पष्ट रूप से ‘मूल ढांचे’ को परिभाषित नहीं किया लेकिन यह माना गया कि संसद द्वारा पारित संशोधन ऐसे नहीं हो सकते कि वे संविधान के मूल सिद्धांतों को विकृत कर दें।


संसद सर्वोच्च है लेकिन संविधान की भावना सर्वोपरि है। फिर भी कुछ सवाल हैं: हमने आर्थिक मानदंडों के आधार पर एक नई श्रेणी बनाई जिसे विशेष सुविधा (आरक्षण) दी जानी थी। क्या ऐसा करके हमने समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन किया है? या हमने इस नई श्रेणी से एससी, एसटी और ओबीसी समूहों को बाहर करके गैर-भेदभाव (अनुच्छेद 14 और 15) के सिद्धांत का उल्लंघन किया है?

इन सवालों पर रोशनी न्यायशास्त्र के विद्वान डाल सकते हैं। इस विषय पर काफी कुछ लिखा गया है और अयान गुप्ता के ब्लॉग पोस्ट (indconlawphil.wordpress.com) को पढ़ना भी दिलचस्प है। संभव है कि आने वाले दिनों में एक बड़ी खंडपीठ इस फैसले की समीक्षा करे।

फिलहाल संशोधन और फैसले के अन्य पहलुओं की बात करें। सबसे पहले, यह स्पष्ट है कि संशोधन स्वयं राजनीति से प्रेरित था। भारतीय राजनीति में ‘कोटा’ शब्द की गूंज बहुत दूर तक जाती है। ऐसी धारणा है कि यह संशोधन ऊंची जाति के वोट बैंक के फायदे के लिए किया गया। लेकिन अब मुसलमान और ईसाई भी ईडब्ल्यूएस कोटे के पात्र हो गए हैं। दूसरी बात, हमारे संविधान में कोटा व्यवस्था जातीय आधार पर ऐतिहासिक तौर पर की गई ज्यादतियों के प्रतिकार के लिए है। यह व्यवस्था उन लोगों की मदद के लिए है जो पीढ़ियों से सामाजिक पिछड़ेपन से पीड़ित हैं।

ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक पिछड़ेपन से उपजे पिछड़ेपन की श्रेणी में आर्थिक पिछड़ेपन को कैसे रखा जा सकता है? एक व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अस्थायी होती है और प्रयास या भाग्य या दोनों के साथ बदल सकती है। यहां तक कि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के मुताबिक अपना धर्म भी बदल सकता है। लेकिन जाति स्थायी होती है। इसलिए जाति-आधारित भेदभाव से निजात पाना और आर्थिक अभाव से निजात पाने में फर्क है।


तीसरी बात, ईडब्ल्यूएस कोटे के लिए पात्रता कटऑफ 8 लाख रुपये की वार्षिक आय है जो एक बहुत ही उदार सीमा जान पड़ती है। यह गरीबी रेखा से भी काफी ऊपर है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के 95 फीसदी से ज्यादा परिवार इसके दायरे में आ जाएंगे। तो क्या यह वास्तव में ‘आर्थिक रूप से कमजोर' लोगों के लिए है?

चौथी, यदि वास्तव में ईडब्ल्यूएस कोटा गरीबों की मदद के लिए है तो गरीबी रेखा से नीचे के लोगों पर भी नजर डालनी चाहिए। सिन्हो आयोग (2010) के अनुसार, गरीबी रेखा से नीचे के लगभग 82 फीसद लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग से हैं। गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन का गहरा संबंध है। लेकिन उन्हीं श्रेणियों को ईडब्ल्यूएस कोटे से वंचित रखा गया है। इसी बिंदु पर पीठ के दो न्यायाधीशों ने असहमति जताई है।

यदि आप गरीबी के बारे में तथ्यात्मक नजरिया रखें तो भी क्या नया कोटा संदिग्ध नहीं लगता क्योंकि इसे बनाया तो गरीबों के लिए है? यह तो ऐसा ही हुआ कि गरीबी विरोधी कोई कार्यक्रम शुरू किया जाए और उससे ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लोगों को इस आधार पर बाहर कर दिया जाए कि उन्हें तो दूसरे रास्ते से सब्सिडी मिल ही रही है।

आर्थिक पिछड़ेपन की स्थिति हमेशा अस्थायी होती है। इसे सकारात्मक कार्रवाई से दूर किया जाना चाहिए, न कि कोटे से। उदाहरण के लिए, गरीब परिवारों के छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करना गरीबों के लिए कोटा व्यवस्था से बेहतर है।

ईडब्ल्यूएस नीति से आय प्रमाणपत्रों बनवाने की लाइन लग जाने वाली है। ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां 92 फीसद लोग असंगठित, गैरपंजीकृत या अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, सही आय का आंकड़ा पाना बेहद मुश्किल है। केवल पांच फीसद आबादी ही आयकर देती है। ऐसे में हमें प्रामाणिक आय डेटा कहां से मिलेगा जिसके आधार पर यह ईडब्ल्यूएस नीति लागू की जानी है? ऐसा नहीं लगता कि हम इससे अधिक भ्रष्टाचार और वाद-विवाद की व्यवस्था के लिए दरवाजे खोल रहे हैं?


सीधी-सी बात है कि ईडब्ल्यूएस कोटा इसलिए राजनीति का विषय है क्योंकि अच्छी कमाई वाली स्थिर नौकरी का जबर्दस्त अभाव है। वैसे भी, ज्यादातर नौकरियां तो निजी क्षेत्र में ही सृजित होंगी जहां ये कोटा लागू ही नहीं होगा। सामाजिक या आर्थिक अन्याय के प्रतिकार का सबसे सुरक्षित तरीका नौकरियों और आजीविका की संभावनाओं वाली उच्च और समावेशी विकास वाली अर्थव्यवस्था है।

(अजीत रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। साभार: दि बिलियन प्रेस)

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