केंद्र सरकार का स्वच्छ भारत अभियान कागज़ी: संसदीय समिति की टिप्पणी, सीएजी ने भी उठाए सवाल

मीण विकास से संबंधित लोकसभा की समिति ने जुलाई 2018 की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि स्वच्छता से सम्बंधित आंकड़े सिर्फ ‘कागजी’ हैं और इनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। सिर्फ शौचालय बनाने से न देश स्वच्छ होगा और नहीं खुले में शौच मुक्त।

फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

केंद्र सरकार का स्वच्छ भारत अभियान कागज़ी है और इसका वास्तविकता से कुछ लेना देना नहीं है। यह टिप्पणी सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की लोकसभा समिति की है, जो उसने इसी साल (2018 में) जुलाई में अपनी रिपोर्ट में की थी। इसके अलावा सीएजी ने भी स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी पर सवाल खड़े किए हैं। यहां तक कि विश्व बैंक समेत सभी गैर सरकारी संस्थाओं ने भी स्वच्छ भारत अभियान की सफलता पर संदेह जताया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने शनिवार को एक बयान जारी कर केंद्र के स्वच्छता अभियान को छलावा करार दिया। उन्होंने कहा कि, “झूठे वायदे और दावे, स्वयं के प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग, अखबारों की सुर्ख़ियों में छाने और मूल समस्या से ध्यान बांटने के लिए भव्य कार्यक्रम करना, मोदी सरकार की कार्यशैली का पर्याय बन चुका है।“

उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लालकिले से ऐलान किया था कि महात्मा गाँधी जी की 150 वीं वर्षगांठ यानी 2 अक्टूबर 2019 तक देश में गंदगी का एक तिनका भी नहीं रहने देंगे, लेकिन चार साल बीत जाने के बावजूद घोषणा के पूरे होने के लक्षण दूर दूर तक दिखाई भी नहीं दे रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बाकी योजनाओं की तरह ही मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के ‘निर्मल भारत अभियान’ में फेर बदल कर इस अभियान को शुरु किया था। जयराम रमेश ने सिलसिलेवार इस अभियान की नाकामी का ब्योरा दिया:

बिना पानी के शौचालय, बने पर इस्तेमाल नहीं

उन्होंने कहा कि शौचालय तो बने,लेकिन पानी की कमी या अन्य कारणों से इस्तेमाल नहीं हो पा रहे,यानी स्वच्छता की दिशा में कोई प्रगति ही नहीं हुई है। जयराम रमेश ने बताया कि इन दावों की पोल खुद सरकारी आंकड़ों ने खोली है, जिन पर सीएजी और संसद ने भी मोहर लगाई है। उन्होंने बताया कि सरकारी पैसे का दुरूपयोग करते हुए, बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण किया गया, लेकिन पानी की कमी के कारण, शौचालयों का इस्तेमाल ही नहीं हो सका है, और इस बात का उल्लेख तो सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में किया है।

उनके मुताबिक इस बारे में ग्रामीण विकास से संबंधित लोकसभा की समिति ने जुलाई 2018 की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि स्वच्छता से सम्बंधित आंकड़े सिर्फ ‘कागजी’ हैं और इनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। सिर्फ शौचालय बनाने से न देश स्वच्छ होगा और नहीं खुले में शौच मुक्त, इसके लिए अनेक तरह के प्रयास किये जाने चाहिए जिनसे ये सरकार और इनका स्वच्छ भारत मिसन कोसो दूर है।

स्वच्छ पेयजल के लिए कोई व्यवस्था नहीं

जयराम रमेश ने बताया कि शौचालयों के निर्माण की अंधी दौड़ ने स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाने के कार्यक्रम को पूरी तरह नज़र अंदाज कर दिया गया और पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए आवंटित धन को घटा दिया है। उन्होंने बताया कि सरकार के स्वच्छ भारत सर्वेक्षण में भोपाल को लगातार दो वर्ष तक देश का दूसरा सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया है, जबकि एक स्वंत्रत संस्था द्वारा किये गए सर्वेक्षण में पाया गया कि भोपाल शहर के पेयजल में मानव मूत्र से अधिक वैक्ट्रिया (जीवाणु) मौजूद हैं।

खुले में शौच से मुक्ति के दावे झूठे

कांग्रेस नेता का कहना है कि 2017 में गुजरात को खुले में शौचमुक्त राज्य घोषित कर दिया गया है। लेकिन इस दावे की सच्चाई अब सामने आने लगी है। उन्होंने बताया कि सीएजी ने अपनी जांच में पाया कि 2014-17 के बीच के समय के लिए 8 जिला पंचायत के 120 ग्राम पंचायतो ने जो सूचना उपलब्ध करवाई थी, उसके अनुसार 29 प्रतिशत परिवारों के पास किसी भी प्रकार के शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने कहा कि वाटर ऐड और ‘प्रैक्सिस इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंट स्टडीज’ के संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि तीन राज्यों (राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश) के खुले में शौचमुक्त घोषित 8 गांवों में से सिर्फ एक गांव पूरी तरह खुले में शौच मुक्त है। बाकी 7 गांवों को लेकर किया गया दावा पूरी तरह झूठे आंकड़ों और आधारहीन तथ्यों पर खड़ा है।

लक्ष्य प्राप्ति के लिए बस्तियां उजाड़ दी

जयराम रमेश के मुताबिक गैर सरकारी संस्था युथ फॉर यूनिटी एंड वोलन्टरी एक्शन (युवा) की 2016 की रिपोर्ट में सामने आया है कि इंदौर शहर में होने वाले स्वच्छता सर्वेक्षण से पहले 727 परिवारों को उजाड़ दिया गया। इन परिवारों का सिर्फ इतना ही दोष था कि इन्होंने शौचालय बनवाने के लिए नगर पालिका को पैसे जमा कर दिए थे और नगर पालिका ने शौचालय निर्माण नहीं किया। सर्वेक्षण में अव्वल आने की होड़ में सरकार ने इन 727 गरीब परिवारों को उजाड़ दिया। खुले में शौचमुक्त घोषित करवाने का अधिकारियों पर इतना अधिक दबाव था कि उन्होंने गरीब परिवारों के सामान्य मानव अधिकारों की भी चिंता नहीं की और गरीबों की बस्ती उजाड़ दी।

स्वच्छ भारत अभियान में स्वच्छकारों की दुर्गति

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 2015 में, बीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारणी में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को तीन वर्ष के अंदर समाप्त किये जाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अन्य घोषणाओं की तरह यह भी जुमला ही साबित हुआ। आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2017 तक हर पांचवें दिन एक स्वच्छकार की दुर्घटनावश मृत्यु हो रही है, जो कि एक अमानवीय और आपराधिक कृत्य है।

जयराम रमेश ने आंकड़े देते हुए बताया कि 2017 में 13000 लोग सिर पर मैला उठाने का अमानवीय कार्य करने में लगे हुए थे। लेकिन 2018 के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा संयुक्त रूप से गठित टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार 53236 लोग सिर पर मैला उठाने के कार्य में लगे हुए हैं।

एक तो पैसा कम, ऊपर से खर्च में कंजूसी

जयराम रमेश ने कहा कि ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति ने 'पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय' से संबंधित अपनी 2017-2018 की रिपोर्ट में स्वच्छ भारत मिशन के लिए आबंटित धनराशि को बहुत कम पाया। वर्ष 2016 -17 में स्वच्छता मिशन के लिए मंत्रालय ने 14000 करोड़ रुपये की मांग की थी, जबकि आवंटित सिर्फ 9000 करोड़ रुपये ही हुए, इस पर जब मंत्रालय ने आपत्ति जताई तो राशि को बढाकर 10500 करोड़ कर दिया गया था। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि मई 2018 तक राज्यों द्वारा 9890 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च ही नहीं हुई।

235 साल पुरानी रामलीला पर भी गंदगी का असर

वाराणसी के रामनगर में 45 दिन तक चलने वाली रामलीला का मंचन पिछले 235 वर्ष से लगातार हो रहा है। इस रामलीला को यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया हुआ है। पिछले 235 वर्ष के इतिहास में पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में आयोजित होने वाली इस रामलीला को स्थगित किया गया हो, और स्थगित करने का कारण भी बड़ा अटपटा सा है। और, कारण यह है कि भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन का पात्र करने वाले कलाकारों को गंदे पानी और गन्दगी के कारण हैज़ा और दस्त हो गए थे।

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