तमिलनाडुः AIADMK हुई दो फाड़! 30 बागी विधायक विजय को देंगे समर्थन, पलानीस्वामी पर लगाए गंभीर आरोप
एआईएडीएमके नेता षणमुगम ने कहा कि वे आज मुख्यमंत्री विजय से मिलकर उनकी सरकार को समर्थन का सौंपेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पलानीस्वामी डीएमके के समर्थन से सरकार बनाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि एआईएडीएमके का गठन ही डीएमके के विरोध और ‘सफाये’ के लिए हुआ है।

तमिलनाडु में एक बड़े घटनाक्रम में विपक्षी दल एआईएडीएमके विभाजन की कगार पर पहुंच गई है। पार्टी प्रमुख पलानीस्वामी पर प्रतिद्वंद्वी डीएमके के साथ पर्दे के पीछे से गठबंधन की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए विधायकों के एक बड़े समूह ने बगावत कर दी है। इसके साथ ही इस गुट ने अभिनेता से नेता बने विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) सरकार को अपना खुला समर्थन देने की घोषणा कर दी है। टीवीके सरकार बुधवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी।
एआईए़ीएमके के वरिष्ठ नेता एस.पी. वेलुमणि और सी.वे. षणमुगम के नेतृत्व में लगभग 30 विधायकों के बागी गुट में शामिल होने का दावा किया जा रहा है। इस गुट ने 23 अप्रैल को हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद पलानीस्वामी के नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। इन चुनावों में अन्नाद्रमुक ने जिन 164 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से वह केवल 47 सीटें ही जीतने में सफल रही थी।
षणमुगम ने पत्रकारों से कहा कि वे आज मुख्यमंत्री विजय से मिलकर उनकी सरकार को समर्थन देने के लिए पत्र सौंपेंगे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि पार्टी के महासचिव पलानीस्वामी डीएमके के समर्थन से सरकार बनाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि एआईएडीएमके का गठन ही डीएमके के विरोध और ‘सफाये’ के लिए हुआ है।
उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी सदस्यों ने एम के स्टालिन की अगुवाई वाली पार्टी के समर्थन से सरकार बनाने के पलानीस्वामी के प्रस्ताव का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव एआईएडीएमके के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत है क्योंकि इसका गठन ही डीएमके का विरोध करने और उसे ‘जड़ से उखाड़ने’ के लिए किया गया था।
इस बीच एआईएडीएमके नेतृत्व ने इन आरोपों को 'अफवाह' बताकर खारिज कर दिया है। एआईएडीएमके ने 'एक्स' पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि वेलुमणि, षणमुगम और सी विजयभास्कर खुद टीवीके सरकार में मंत्री पद पाने की कोशिश कर रहे हैं। इसने दावा किया कि पार्टी कार्यकर्ता पलानीस्वामी के साथ मजबूती से खड़े हैं और गठबंधन के फैसले मुट्ठी भर विधायकों द्वारा नहीं लिए जा सकते।
एमजीआर द्वारा स्थापित एआईएडीएमके की इस अंदरूनी कलह ने पार्टी के उन आंतरिक सत्ता संघर्षों की यादें ताजा कर दी हैं, जो 1987 में संस्थापक एम. जी. रामचंद्रन और फिर 2016 में मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद देखे गए थे।
इधर डीएमके ने दोनों दलों के बीच चुनाव के बाद गठबंधन की बातचीत के षणमुगम के दावों को खारिज कर दिया और उन पर अपनी ही पार्टी के भीतर फूट डालने की कोशिश करने का आरोप लगाया। षणमुगम की टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए डीएमके के संगठन सचिव आर. एस. भारती ने दावा किया कि एआईएडीएमके नेता ने टीवीके सरकार का समर्थन करने का फैसला किया है और इसीलिए उन्होंने यह आधारहीन आरोप लगाये हैं। भारती ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष एम. के. स्टालिन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि डीएमके एक विपक्षी दल के रूप में अपनी भूमिका निभाएगी।
वहीं, वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने मंगलवार को दावा किया कि डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने के लिए संपर्क किया था। उन्होंने कहा कि दोनों द्रविड़ प्रतिद्वंद्वी टीवीके को सत्ता से दूर रखने के लिए एक संभावित गठबंधन का नेतृत्व उन्हें सौंपने पर विचार कर रहे थे। थिरुमावलवन ने कहा, "मुझे जानकारी मिली कि उन्होंने (डीएमके-एआईएडीएमके) मुझे मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। हालांकि, अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद हमने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।"
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