तमिलनाडु: विजय ने खोल दिए नई राजनीति के दरवाजे
तमिलनाडु ने दो दलीय उस व्यवस्था को हाशिये पर डाल दिया जिसमें सत्ता बारी-बारी से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के हाथ आती रही।

तमिलनाडु ने ऐसा जनादेश दिया है जिसकी व्याख्या आसान नहीं। इस उथल-पुथल के केन्द्र में हैं जोसेफ विजय चंद्रशेखर जिन्होंने यहां की राजनीति का व्याकरण ही बदल दिया। राज्य में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के दशकों के दोहरे वर्चस्व को चुनौती देकर और संसाधन संपन्न बीजेपी के जोरदार अभियान का सफलतापूर्वक मुकाबला करके, विजय ने खुद को उस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने वाले शख्स के तौर पर स्थापित किया है, जो दशकों से अभेद्य लग रही थी।
पिछले करीब पांच दशकों से तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर द्विदलीय व्यवस्था से तय होती रही। द्रमुक और अन्नाद्रमुक सिर्फ सत्ता के लिए होड़ करने वाली पार्टियां नहीं, बल्कि दो खिलाड़ियों वाला ऐसा राजनीतिक तंत्र थीं, जिसने कल्याणकारी योजनाओं के वितरण, शासन-प्रशासन के तौर-तरीकों और राज्य की विशिष्ट राजनीतिक पहचान को आकार दिया।
1990 और 2000 के दशक के विधानसभा चुनावों में, इन दोनों का कुल वोट शेयर अक्सर 70 फीसद से ज्यादा रहा। यहां तक कि कड़े मुकाबलों में भी यह शायद ही कभी 60 फीसद से नीचे गया हो। सरकार की बागडोर बारी-बारी से इन दोनों के पास आती रही। अब यह व्यवस्था हिल गई है और इसे बनाए रखने वाला समीकरण भी। शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में द्रमुक और अन्नाद्रमुक का कुल वोट शेयर पिछले चुनाव चक्र की तुलना में 8-12 फीसदी घट गया। चेन्नई में, जहां पहले दो-तरफा मुकीबलों में जीत का अंतर 15 फीसदी से ज्यादा होता था, अब कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का अंतर पांच फीसद से भी कम रहा है।
उत्तरी तमिलनाडु, जिसमें वेल्लोर, तिरुवल्लुर और कांचीपुरम शामिल हैं, पारंपरिक वोट बैंक बंट गया। यहां विजय की टीवीके (तमिलगा वेट्री कजगम) ने पहली बार वोट देने वालों और शहरी इलाकों के निम्न-मध्यम वर्ग से उम्मीद से ज्यादा वोट हासिल किए। मिली जानकारी के मुताबिक, श्रीपेरुम्बुदूर और होसुर के औद्योगिक इलाके में, युवा मजदूरों और सर्विस सेक्टर के कर्मचारियों ने टीवीके का दामन थामा। अन्नाद्रमुक के गढ़ पश्चिमी तमिलनाडु में बदलाव ज्यादा सूक्ष्म रहा। पार्टी की पकड़ मध्यम जातियों और खेती-बाड़ी से जुड़े समुदायों के बीच अब भी मजबूत है, लेकिन बढ़त का अंतर कम हो गया है। विजय की पार्टी ने अन्नाद्रमुक को हटाया नहीं, लेकिन उसके वोट शेयर में इतनी सेंध जरूर लगा दी कि चुनावी नतीजों पर इसका असर पड़ सके।
कोयंबटूर, इरोड और सेलम जैसे जिलों में दो-ध्रुवीय की जगह त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। कावेरी डेल्टा, जिसे लंबे समय से द्रमुक का गढ़ माना जाता रहा, अब भी इसी पार्टी के पक्ष में है, लेकिन यहां भी जीत का अंतर घट गया।
दक्षिणी तमिलनाडु- जिसमें मदुरै, तिरुनेलवेली और रामनाथपुरम शामिल हैं- एक जटिल तस्वीर पेश करता है। यहां व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल के साथ-साथ जातिगत समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और छोटे-छोटे मुद्दों ने भी चुनाव परिणामों को प्रभावित किया।
तमिलनाडु के 20 फीसद मतदाता 18-29 आयु वर्ग के हैं। यह जनसांख्यिकीय समूह वैचारिक विरासत से कम जुड़ा है और नेतृत्व के नैरेटिव, शासन की अपेक्षाओं तथा डिजिटल संचार के प्रति अधिक संवेदनशील है। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के पूर्व फैकल्टी सी. लक्ष्मणन कहते हैं, ‘मतदान व्यवहार में यह मामूली बदलाव नहीं। पारंपरिक निष्ठाएं कमजोर पड़ रही हैं, खासकर युवा मतदाताओं में।’
सिनेमा और राजनीति का मेल
तमिलनाडु सिनेमा की राजनीतिक ताकत से परिचित रहा है। एम.जी. रामचंद्रन ने अपने फिल्मी व्यक्तित्व को जन-कल्याणकारी राजनीतिक ताकत में बदला, जिसने राज्य के चुनावी परिदृश्य को नया रूप दिया। जयललिता ने एक सशक्त नेतृत्व मॉडल और व्यापक जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से उस विरासत को और सुदृढ़ किया। दूसरी ओर, एम. करुणानिधि ने द्रमुक को वैचारिक गहराई और सांगठनिक निरंतरता के आधार पर स्थापित किया।
हर दौर में सत्ता का एक स्थिर केन्द्र बना। लेकिन, मौजूदा दौर अलग है, क्योंकि यह दोहरी व्यवस्था को खत्म कर रहा है। विजय का उभार लंबी प्रक्रिया का नतीजा है। ‘विजय मक्कल इयक्कम’, जो शुरू में सिर्फ फैन्स का नेटवर्क था, दो दशकों में एक जन-कल्याणकारी संगठन में बदल गया। रक्तदान शिविरों, आपदा राहत कार्यों और शिक्षा सहायता कार्यक्रमों से इसने जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बनाई। जब टीवीके लॉन्च हुई, इस नेटवर्क के पास बूथ-स्तर की संरचनाएं मौजूद थीं। निकाय चुनावों में मिली जीत ने चुनावी सफलता की संभावना का शुरुआती संकेत दे दिया था। राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप दामोदरन कहते हैं, ‘यह सिर्फ स्टार-पावर नहीं है। यह सालों की संगठनात्मक मेहनत का नतीजा है। विजय ने अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी को राजनीतिक पूंजी में बदल दिया।’
सिनेमा ने उनके समर्थक वर्ग के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव बनाया। उनकी फिल्में महज मनोरंजन नहीं थीं, उनमें एक राजनीतिक संदेश भी था। ‘मरसल’ने टैक्स व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की असमानताओं पर सवाल उठाए। ‘सरकार’ ने नागरिकों के अधिकारों की बात की और चुनावी धांधलियों का मुद्दा उठाया। ‘मास्टर’ और ‘लियो’ ने एक ऐसे व्यक्ति की छवि को मजबूत किया जो स्थापित सत्ता को चुनौती देता है। इन कहानियों ने विजय के राजनीति में उतरने से पहले ही उनकी राजनीतिक पहचान बना दी। लक्ष्मणन कहते हैं, ‘सिनेमा ने दर्शकों को उन्हें एक राजनीतिक हस्ती के तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार किया।’
गठबंधन का नया दौर
विजय का राजनीति में आगमन, दो-दलीय व्यवस्था का अंत और ‘त्रिशंकु विधानसभा’ ने राज्य को गठबंधन की राजनीति का सामना करने पर मजबूर किया है; यह राज्य के उस इतिहास से एक बड़ा बदलाव है जहां अब तक किसी एक पार्टी को ही स्पष्ट जनादेश मिलता रहा। यह आलेख लिखते समय, कांग्रेस ने टीवीके को सशर्त समर्थन की पेशकश की थी; वामपंथी पार्टियां टालमटोल कर रही थीं; और स्टालिन ने घोषणा की थी कि द्रमुक, टीवीके सरकार (यदि बनती है) के काम में छह माह तक ‘कोई बाधा नहीं डालेगी’ और बिना दखल दिए उसके कामकाज पर नजर रखेगी। टीवीके के पास 108 सीटें हैं, बहुमत से 10 सीटें दूर। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, अन्नाद्रमुक ने बाहर से समर्थन देने की इच्छा जताई थी, जबकि कुछ अन्य लोगों का अनुमान था कि पार्टी का कोई अलग हुआ गुट सरकार बनाने में मदद कर सकता है।
इस उथल-पुथल के बीच भी, तमिलनाडु ने राष्ट्रीय ताकत का डटकर मुकाबला किया। जोरदार अभियान के बावजूद- जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सभ्यतागत निरंतरता’ का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की- भाजपा यहां पैठ नहीं बना पाई; उसे सिर्फ एक सीट और 2.97 फीसद वोट मिल पाए। राज्य की राजनीतिक संस्कृति, राष्ट्रीय एकरूपता के आगे झुकने से इनकार करती रही है।
द्रमुक की राजनीति के केन्द्र में रहे ‘पहचान’ से जुड़े मुद्दों पर विजय का अस्पष्ट रवैया, और भाजपा से सीधे टकराव से बचना- उन्हें भारी नहीं पड़ा। अपनी जीत के अगले ही दिन, मोदी के बधाई संदेश का जवाब देते हुए, विजय ने एक ऐसी शासन-व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया जो राजनीतिक सीमाओं से परे हो। सार्वजनिक मंच पर उनका यह अस्पष्ट रवैया शायद एक रणनीति का हिस्सा हो, लेकिन यह पर्यवेक्षकों को उनकी वैचारिक जड़ों के बारे में सोचने पर भी मजबूर करता है।
ऊपरी तौर पर, विजय खुद को द्रविड़ राजनीति के प्रतीकात्मक दायरे में रखते हैं। पेरियार को उनका माला पहनाना और आम्बेडकर एवं कामराज का जिक्र करना दिखाता है कि वह धर्मनिरपेक्ष, द्रविड़ परंपराओं से प्रेरणा लेते हैं। नोटबंदी, नागरिकता संशोधन अधिनियम और स्टरलाइट जैसे मुद्दों पर उनके दखल से उनके राजनीतिक विचारों की झलक मिली है। फिर भी, इनसे कोई ठोस वैचारिक ढांचा नहीं बनता।
कुछ जानकारों ने तमिलनाडु के चुनाव को द्रविड़ राजनीति के ढलान के तौर पर देखा है। लेकिन क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय एवं भलाई के सिद्धांत मतदाताओं की उम्मीदों में गहरे तक बसे हैं। जिसे चुनौती मिली है, वह है इन विचारों पर किसी एक का कब्जा। चेन्नई के राजनीतिक जानकार पी. सुंदर राजन कहते हैं, ‘मतदाताओं और पार्टियों का भावनात्मक रिश्ता बदल गया है। कल्याणकारी योजनाएं अहम हैं, लेकिन काफी नहीं। मतदाता अब रोजगार, शासन-प्रशासन और जवाबदेही पर सवाल कर रहे हैं।’
शहरीकरण की भी इसमें भूमिका है। तमिलनाडु लगभग आधा शहरी है और अलग-अलग राजनीतिक विचारों के संपर्क में आने और डिजिटल मीडिया के विस्तार ने पारंपरिक नेटवर्क को कमजोर किया है। दामोदरन कहते हैं, ‘ढांचा फिर से परिभाषित हो रहा है।’
विजय के लिए अगली चुनौती शासन की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना और अपने आंदोलन को एक ऐसे संगठन में बदलना है जो शासन चलाने में सक्षम हो। सुंदर राजन कहते हैं, ‘एक आंदोलन खड़ा करने और सरकार चलाने में फर्क होता है। असली परीक्षा अभी बाकी है।’
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