तेलंगाना: सभी जिलों के पुनर्गठन का आह्वान, प्रशासनिक व्यवस्था की चूल-कीलें ठीक करने की कवायद

तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी पुराने ढांचे को तोड़कर नए प्रयोग कर रहे हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था तो दुरुस्त होगी ही, लोगों को जरूरी सेवाओं के लिए भटकना भी नहीं पड़ेगा। इस सप्ताह की तेलंगाना डायरी

फोटो सौजन्य : @revanth_anumula
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सुरेश धरूर

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन ने एक बार कहा था, ‘राजनीति में एक सप्ताह लंबा समय होता है।’ उस पैमाने पर, तेलंगाना के मुख्यमंत्री मंत्री ए. रेवंत रेड्डी जिन्होंने हाल ही में कार्यालय में एक महीना पूरा किया है, इस अवधि के दौरान पुराने ढांचे को तोड़कर कई जनहित के फैसले लिए, अवश्य ही सकून महसूस कर सकते हैं। 

आम जनता से उनकी शिकायतों के निवारण के लिए सीधे आवेदन प्राप्त करने के लिए अपने कैंप कार्यालय में ‘प्रजा दरबार’ आयोजित करना, महिलाओं और किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शुरू करना, नौकरशाही में फेरबदल करते समय अधिकारियों की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को ध्यान में रखना, अपने काफिले के लिए सामान्य यातायात को नहीं रोकना- नए मुख्यमंत्री ने ऐसे कुछ फैसले लिए जिनका तेलंगाना के लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

पिछले महीने राज्य की बागडोर संभालने के तुरंत बाद उन्होंने दो फाइलों पर हस्ताक्षर किए थे जिनमें से एक कांग्रेस की ‘छह चुनावी गारंटी’ के कार्यान्वयन से संबंधित थी- जिसमें महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, विधवाओं के लिए पेंशन, अकेली महिला के लिए वजीफा, किसानों के लिए मुफ्त बिजली, वित्तीय सहायता और ऋण माफी शामिल था। इसके अलावा उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि शारीरिक रूप से अक्षम विकलांग महिला को नौकरी देंगे और उन्होंने इससे जुड़ी औपचारिकताएं भी पूरी कीं। 

पिछले एक महीने के अपने प्रदर्शन पर रेवंत रेड्डी ने कहा कि उनकी सरकार ने ‘लोगों को बांधने वाली बेड़ियों को तोड़ दिया है और उन्हें आजादी देकर’ उनकी आकांक्षाओं को पूरा कर रही है। साथ ही उन्होंने घोषणा की कि उनकी सरकार जल्द ही प्रशासनिक सुविधा के लिए तेलंगाना के जिलों का पुनर्गठन करेगी। ज्यादातर लोगों का मानना है कि फिलहाल तेलंगाना के 33 जिलों में एक बोझिल व्यवस्था है।

नाम में क्या रखा है!

नाम में क्या रखा है? गुलाब को किसी भी नाम से पुकारें, उसकी सुगंध वैसी ही होगी। यही बात उन नेताओं को समझ में तो आए जो चुनावी हार से घबरा गए हैं। कुछ के लिए गड़बड़ी उनकी पार्टी के नाम की वजह से हुई।

भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी के नाम की वजह से उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। उनका तर्क है कि पार्टी का नया नाम मतदाताओं में अपनी पहचान नहीं बना सका। उनकी मांग है कि पार्टी को अपना नाम वापस तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) कर देना चाहिए।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री कादियाम श्रीहरि ने कहा, ‘तेलंगाना हमारी मूल पहचान है। लोग हमें राज्य के आंदोलन से जोड़कर देखते हैं और अलग राज्य के सपने को साकार करने का श्रेय हमें देते हैं। हमें मूल नाम, यानी टीआरएस पर वापस जाने की जरूरत है।’ पार्टी ने अपने सुप्रीमो के. चंद्रशेखर राव की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए अक्तूबर, 2022 में अपना नाम बदलकर बीआरएस कर लिया था। दो महीने बाद चुनाव आयोग ने नाम बदलने को मंजूरी दे दी जिससे केसीआर के लिए तेलंगाना से परे पार्टी के पदचिह्न का विस्तार करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।


हालांकि तेलंगाना विधानसभा चुनाव में हालिया हार ने उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर दिया है। अब कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि जिस पार्टी की पहचान मुख्य रूप से तेलंगाना मुद्दे के साथ जुड़ी थी, उसके खुद को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में पेश करने के बाद राज्य के लोगों से उसका रिश्ता कमजोर हो गया। एक अन्य वरिष्ठ नेता श्रीनिवास यादव ने कहा, ‘हमारे चुनाव हारने का यह एक बड़ा कारण था।’

पिछले कुछ हफ्तों में पार्टी को उसके मूल अवतार में वापस लाने की मांग जोर पकड़ रही है। यह मामला बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष और केसीआर के बेटे के.टी. रामा राव और पूर्व मंत्री टी. हरीश राव की बैठकों में भी उठता रहा है। ये दोनों विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर आत्मनिरीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और कैडर को आगामी लोकसभा चुनावों के लिए प्रेरित करने का प्रयास करते हैं। हरीश राव ने कहा, ‘पार्टी नेतृत्व को नेताओं की भावनाओं से अवगत करा दिया गया है।’

टीआरएस की स्थापना 2001 में अलग राज्य के लिए लड़ने के लिए की गई थी और पार्टी ने आंदोलन का नेतृत्व किया जिसकी परिणति 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनने के रूप में हुई।

शिक्षा का बोझ

राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे मशहूर लेखक आर.के. नारायण ने संसद में केवल एक बार 1986 में कुछ कहा। उन्होंने जो मुद्दा चुना, वह था भारी स्कूल बैग और बच्चों के स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव। लेखक ने राष्ट्रीय नीति के रूप में ‘स्कूल बैग के उन्मूलन’ की जोरदार अपील की थी। उस बात के साढ़े तीन दशक से अधिक समय बाद भी देश में स्कूली बच्चे भारी बोझ झेल रहे हैं। यह डॉक्टरों और शिक्षाविदों द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं के बावजूद है।

परिणामस्वरूप, भारी बैकपैक पीठ दर्द और रीढ़ की हड्डी में विकृति सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहे हैं। इस गंभीर मुद्दे को हल करने के लिए तेलंगाना में नई कांग्रेस सरकार ने आखिरकार स्कूल बैग के बोझ को कम करने की दिशा में पहला कदम उठाया है। अगले शैक्षणिक वर्ष से स्कूल बैग कम-से-कम 25 फीसदी हल्के हो जाएंगे। राज्य स्कूल शिक्षा विभाग ने बोझ को हल्का करने के लिए पाठ्यपुस्तकों में कागज की मोटाई कम करने का प्रस्ताव रखा है।

अब पाठ्यपुस्तकों को 90 जीएसएम (ग्राम प्रति वर्ग मीटर) की जगह 70 जीएसएम के कागज पर छापा जाएगा जिससे स्कूल बैग 25-30 फीसद हल्का हो जाएगा। प्रारंभिक अनुमानों से पता चलता है कि दसवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तकें जिनका वजन अभी लगभग 4.5 किलोग्राम है, 1 किलोग्राम घट जाएगा। बच्चों पर बोझ कम करने के अलावा विभाग को कागज की खरीद पर भी बड़ी बचत होगी क्योंकि कागज की खरीद मौजूदा 11,000 टन से घटकर 8,000 टन रह जाएगी और इससे 30 से 40 करोड़ रुपये बचेंगे। राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा यह कदम पर्यावरण-अनुकूल भी है।


खूबी बनी खामी

"नीलू, निधुलु, नियमाकालु" (पानी, पैसा, नौकरी) केसीआर के नेतृत्व में तेलंगाना राज्य आंदोलन का लोकप्रिय नारा था। चंद्रशेखर राव जो भारत के सबसे युवा राज्य के वास्तुकार थे और बाद में 2014 में वह इसके पहले मुख्यमंत्री बने। इसमें हैरानी नहीं कि उनके दो कार्यकाल के दौरान सिंचाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। सिंचाई के मोर्चे पर उनकी पहलों में सबसे चर्चित पहल 80,000 करोड़ रुपये की कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना थी जिसका उद्घाटन 2019 में हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी लिफ्ट सिंचाई योजना के रूप में पेश किया गया।

कहा जाता है कि यह परियोजना केसीआर के दिमाग की उपज थी और इस बहुउद्देश्यीय परियोजना को तमाम समस्याओं के लिए रामबाण के रूप में देखा जा रहा था। इसकी परिकल्पना राज्य के 33 में से 20 जिलों की 45 लाख एकड़ कृषि भूमि को सिंचित करने के लिए की गई थी। इसके अलावा इससे बिजली पैदा होती, उद्योगों को पानी की सप्लाई होती और युवाओं को नौकरी भी मिलती। 

हालांकि विडंबना यह रही कि यह परियोजना केसीआर की भारत राष्ट्र समिति के लिए गले की हड्डी बनकर रह गई। नई कांग्रेस सरकार ने इस परियोजना समेत अन्य सिंचाई परियोजनाओं में गड़बड़ियों को सामने लाने का फैसला किया है और इसमें कई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी निशाने पर हैं।  

मेगा परियोजना के हिस्से के रूप में निर्मित तीन बैराज में संरचनात्मक गड़बड़ी सामने आ चुकी है। परियोजना की लागत 40,000 करोड़ रुपये बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपये हो गई है। विशेषज्ञों ने लंबे समय में परियोजना की व्यवहार्यता पर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ पत्रकार आर. अवधानी ने कहा, ‘इस मेगा परियोजना के कार्यान्वयन के मामले में सब कुछ गलत था। राजकोषीय फिजूलखर्ची के अलावा, तकनीकी अनुपालन, पारिस्थितिक और भौगोलिक सिद्धांतों का पालन करने, सबमें गड़बड़ी हुई।’ 

सिंचाई मंत्री मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि उनकी सरकार जल्द ही कालेश्वरम परियोजना की न्यायिक जांच का आदेश देगी और दोषी पाए जाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की जांच ने पहले ही बिना किसी संदेह के यह स्थापित कर दिया है कि बढ़ी हुई परियोजना लागत का बड़ा हिस्सा ठेकेदारों ने अपनी जेब में डाल लिया जिससे ठेकेदारों और बीआरएस नेताओं के बीच साठगांठ के कांग्रेस और भाजपा के आरोपों को बल मिला है।

कैग रिपोर्ट में कहा गया, ‘ऑडिट विश्लेषण से पता चला है कि पुन: तैयार की गई कालेश्वरम परियोजना आर्थिक रूप से अव्यवहार्य और प्रारंभिक तौर पर अलाभकारी थी।’ 

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