तेलंगाना: रेवंत रेड्डी, जिनका सपना आखिरकार सच हो गया, जानें उनके राजनीतिक सफर के बारे में....

मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के लिए तैयार 55 वर्षीय रेवंत रेड्डी स्व-निर्मित राजनेता हैं, जिन्होंने अपनी क्षमता साबित करने के लिए सभी बाधाओं के साथ संघर्ष किया।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

कांग्रेस नेता अनुमुला रेवंत रेड्डी आज तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। एक सुदूर गांव के स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने वाले अनुमुला रेवंत रेड्डी की राजनीतिक यात्रा रोमांचक रही है।

मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के लिए तैयार 55 वर्षीय रेवंत रेड्डी स्व-निर्मित राजनेता हैं, जिन्होंने अपनी क्षमता साबित करने के लिए सभी बाधाओं के साथ संघर्ष किया।

स्थानीय निकाय चुनावों में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में विजयी हाेने के साथ राजनीतिक जीवन की शुरुआत करते हुए महत्वाकांक्षी नेता रेवंत केवल 17 वर्षों में शीर्ष पद तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत कर राजनीति में आए हैं।

राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि यह एक ऐसे नेता के लिए असाधारण उपलब्धि है, जिसके पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है और वह कभी सत्तारूढ़ दल में नहीं रहा।

8 नवंबर, 1968 को नागरकर्नूल जिले के कोंगारेड्डीपल्ली में एक किसान परिवार में जन्मे रेवंत ने वानापर्थी स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज में पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने हैदराबाद के एवी कॉलेज से कला स्नातक की डिग्री हासिल की। नरसिम्हा रेड्डी और रामचंद्रम्मा के बेटे रेवंत रेड्डी सात भाई-बहनों में चौथे नंबर पर हैं।


परिवार की पहली पीढ़ी के राजनेता रेवंत ने अपने छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया। वह 2002 में तेलंगाना राष्ट्र समिति (अब बीआरएस) में शामिल हुए, लेकिन कुछ साल बाद पार्टी छोड़ दी, क्योंकि उन्हें पार्टी में मान्यता नहीं मिली।

2006 में उन्होंने कलवाकुर्थी निर्वाचन क्षेत्र के मिडजिल मंडल में जिला परिषद प्रादेशिक समिति (जेडटीपीसी) के सदस्य पद के लिए निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा, हालांकि उनका पैतृक गांव अचमपेट निर्वाचन क्षेत्र के वागूर मंडल में था। चुनावी राजनीति में अपने पहले ही प्रयास में वे सफल रहे, लेकिन उनका लक्ष्य बड़ा था।

रेवंत रेड्डी ने अगले ही वर्ष तत्कालीन संयुक्त आंध्र प्रदेश की विधान परिषद के लिए महबूबनगर जिले में स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा और सत्तारूढ़ कांग्रेस के उम्मीदवार को मात्र 100 वोटों से हराया। इस जीत ने उन्हें राज्य स्तर की राजनीति में पहुंचा दिया और 2008 में वह तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) में शामिल हो गए, जो विपक्ष में थी। साल 2009 में वह विधानसभा चुनाव में उतरे और वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुरुनाध रेड्डी को 6,989 वोटों से हराकर कोडंगल से चुने गए।

युवा, गतिशील और उत्साही नेता विधानसभा की बहसों में अपनी सक्रिय भागीदारी से लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे।

राजनीतिक विश्‍लेषक पलवई राघवेंद्र रेड्डी ने कहा, "वह सभी आंकड़ों के साथ विधानसभा में तैयार होकर आते थे और प्रभावी तरीके से अपनी दलीलें पेश करते थे।" तेदेपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के करीबी माने जाने वाले रेवंत रेड्डी अपने जोशीले भाषणों से लोगों, खासकर युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गए। जब तेलंगाना आंदोलन अपने चरम पर था, उस समय वह तेदेपा के साथ थे।

वह 2014 में कोडंगल से पहली तेलंगाना विधानसभा के लिए चुने गए। उन्होंने टीआरएस उम्मीदवार के खिलाफ 14,614 वोटों के बड़े अंतर के साथ जीतकर सीट बरकरार रखी।

तेदेपा की तेलंगाना इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष और विधानसभा में तेदेपा के सदन नेता के रूप में उन्होंने विधानसभा और बाहर, दोनों जगह सत्तारूढ़ टीआरएस का मुकाबला किया। वह के.चंद्रशेखर राव और उनके परिवार के कटु आलोचक रहे हैं।

उन्होंने कांग्रेस के भीतर एक मजबूत नेटवर्क बनाया और जल्द ही शीर्ष नेतृत्व के करीब आ गए। उन्हें टीपीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष के पद से पुरस्कृत किया गया। 2018 के चुनाव में उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया, मगर उस बार न केवल कांग्रेस सत्ता हासिल करने में विफल रही, बल्कि रेवंत रेड्डी को भी कोडंगल से हार का सामना करना पड़ा।

पार्टी ने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मैदान में उतारा और उन्होंने मल्काजगिरि सीट जीतकर वापसी की। 2021 में कांग्रेस नेतृत्व ने तेलंगाना में पार्टी का नेतृत्व करने के लिए रेवंत रेड्डी को चुना।

आक्रामक दृष्टिकोण और जन अपील के लिए जाने जाने वाले रेवंत को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा गया, जो अपने पूर्व गढ़ में सबसे पुरानी पार्टी की किस्मत पलट सकता है। उप-चुनावों और ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) चुनावों में पार्टी की अपमानजनक हार के बावजूद रेवंत रेड्डी ने हार मानने से इनकार कर दिया।

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से पार्टी की तेलंगाना इकाई में नई ऊर्जा का संचार हुआ। छह महीने के भीतर पार्टी बीआरएस के लिए मुख्य चुनौती बन गई, जिसने बीजेपी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। पार्टी का आगे बढ़कर नेतृत्व करते हुए, उन्होंने न केवल अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र कोडंगल और कामारेड्डी में प्रचार किया, जहां उन्होंने केसीआर को चुनौती दी थी, बल्कि राज्य भर में 55 चुनावी रैलियों को संबोधित किया।

उन्होंने बीआरएस और भाजपा के असंतुष्ट नेताओं तक पहुंच कर उन्हें कांग्रेस में शामिल होने के लिए आमंत्रित करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

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