विवादित कृषि कानून: सुप्रीम कोर्ट के पास मौका था, जो उसने गंवा दिया!

अगर किसी कानून की संवैधानिकता को लेकर संदेह हो तो सुप्रीम कोर्ट उसे स्थगित कर सकता है लेकिन इस नजरिये से न तो अदालत ने कोई दलील सुनी और न ही कानून को असंवैधानिक कहा। ऐसे कानूनों को स्थगित कर देना जिनकी संवैधानिकता पर कोई संदेह न हो, ऐसा तो कभी नहीं हुआ।

फोटो : नवजीवन
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संयुक्ता बासु

जिस सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और अंतर-धार्मिक विवाहों के खिलाफ बने कानूनों को निलंबित करने से इनकार कर दिया था, उसी ने तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों के ‘क्रियान्वयन’ पर रोक लगा दी है। रोक लगाने का फैसला सुनाते हुए जजों ने दावा किया कि वे ऐसा लोगों की जान की चिंता के कारण कर रहे हैं। इसके साथ ही एक समिति बना दी गई जो सरकार और किसानों के बीच पुल का काम करेगी। इस समिति को लेकर अलग तरह कीआशंकाएं हैं क्योंकि इसके सदस्यों ने उन नए कानूनों का सार्वजनिक तौर पर समर्थन किया है जिनसे जुड़े विवाद को उसे सुलझाने का काम मिला है। इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि चाहे वजह जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को विश्वसनीय तरीके से निपटाने का मौका शायद गंवा दिया।

जजों ने फैसला सुनाते समय दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों की पीड़ा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते कि उनके हाथ किसानों के खून से रंग जाएं। वैसे, एक मामले में ‘चिंता जताना’ और वैसे ही अन्य मामलों को छोड़ देने पर तमाम कानूनी जानकारों को हैरानी जरूर होती है। इन जानकारों का मानना है कि संशोधित नागरिकता कानून और लव-जिहाद विरोधी कानूनों के कारण भी तो तमाम लोगों की जानें गईं।

गौर करने वाली बात है कि किसी ने भी कृषि कानूनों को स्थगित करने की मांग नहीं की थी। अगर किसी कानून की संवैधानिकता को लेकर कोई संदेह हो तो सुप्रीम कोर्ट उसे स्थगित कर सकता है लेकिन इस नजरिये से न तो अदालत ने कोई दलील सुनी और न ही कहा कि ये कानून असंवैधानिक हैं। ऐसे कानूनों को स्थगित कर देना जिनकी संवैधानिकता पर कोई संदेह न हो, ऐसा तो कभी नहीं हुआ।

नए कृषि कानूनों पर विचार करने और किसानों से बात करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिस विशेषज्ञ समिति का गठन किया, वह शुरू से ही एक असफल प्रयास साबित हुई है। इसके चार सदस्यों में से एक- भूपिंदर सिंह मान ने यह कहते हुए अपने आपको समिति से अलग कर लिया है कि जनभावनाओं और किसानों के मन में घर कर गई आशंकाओं को देखते हुए उन्हें इस समिति में नहीं रहना चाहिए। वह पंजाब और किसानों के हितों के साथ समझौता नहीं कर सकते। वैसे देखें तो मान के अलग होने से पहले ही समिति विफल हो चुकी थी। उस पर सवाल तो उठने ही लगे थे। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने कहा कि इस समिति में कोई भी वकील नहीं है, इसलिए इस समिति के पास तीनों कानूनों की सक्षमता पर विचार करने की काबलियत ही नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के सभी सदस्यों द्वारा पहले ही इन विवादास्पद कृषि कानूनों का समर्थन किए जाने का मुद्दा उठाते हुए दवे ने सवाल किया, ‘समिति आखिर क्या देखेगी? कानूनों का व्यावसायिक प्रभाव?’ उन्होंने कहा, ऐसे में यह सोचना भी अजीब है कि समिति सुप्रीम कोर्ट को इस आशय की रिपोर्ट देगी कि यह कानून ही गलत है। दवे ने यहां तक कहा कि अदालत जानते- बूझते या अनजाने में सरकार के हाथों खेल रही है। सरकार चाहती है कि बिना यह दिखाए कि वह झुक गई है, इस मामले से पिंड छुड़ाना चाह रही है।

गौर करने वाली बात है कि आंदोलनकारी किसानों ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया, वहीं किसानों को दिल्ली की सीमाओं से हटाने और कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका भी दायर की गई। लेकिन जैसा कि तमाम वकीलों ने बताया, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों की वैधता पर कोई दलील नहीं सुनी। दवे ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि अदालत पहले से ही कानूनों को स्थगित करने और समिति गठित करने का मन बना चुकी थी। इस बारे में किसी भी सुनवाई से पहले 11 जनवरी को ही अदालत ने ऐसा संकेत दे दिया था।’

सुप्रीम कोर्ट ने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, बीकेयू अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, साउथ एशिया इंटरनेशनल फूड पॉलिसी के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और शेतकारी संगठन के अनिल घवंत को समिति का सदस्य मनोनीत किया। समिति से बाहर हो गए भूपिंदर सिंह मान खुद एक प्रभावशाली किसान हैं और उन्होंने पिछले महीने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को फोन करके तीनों कृषि कानूनों को लागू करने की मांग की थी। उन्होंने तब कृषि सुधारों की जरूरत का समर्थन करते हुए कहा था, ‘कृषि को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सुधारों की जरूरत है। लेकिन किसानों के हितों को भी सुरक्षित किया जाना और विसंगतियों को दुरुस्त करना भी जरूरी है।’

ऐसे ही अशोक गुलाटी के बारे में माना जाता है कि इन कृषि कानूनों के पीछे उनकी अहम भूमिका रही है। अशोक गुलाटी ने सितंबर, 2019 में दि इंडियन एक्सप्रेस के एक कॉलम में इन तीनों कृषि कानूनों की तुलना 1991 में उद्योगों को लाइसेंस राज से मुक्त करने की पहल से की। उन्होंने किसानों के विरोध प्रदर्शन के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराते हुए कहा कि एमएसपी को उपज खरीद का न्यूनतम स्तर बनाने का कानून बनाने से ‘बाजार में तबाही मच जाएगी और निजी क्षेत्र खरीद से दूर हो जाएगा।’


उनकी ट्विटर टाइमलाइन (@ agulati115) पर एक नजर डालने से ही साफ हो जाता है कि वह नरेंद्र मोदी की ‘दृष्टि’ से प्रभावित हैं और यूपीए सरकार के आलोचक रहे हैं। सितंबर, 2014 में उन्होंने ट्वीट किया था, ‘सौ दिन की मोदी सरकार में अंततः फल और सब्जियां दिल्ली एपीएमसी बाजार से हट गईं। शाबास! यूपीए के 10 सालों में जो न हो सका, कल हो गया।’ 27 मई, 2019 को उन्होंने ट्वीट किया, ‘शानदार जीत के लिए पीएम मोदी को बधाई। लेकिन उन्हें जमीन पर चीजों को ठीक करना होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था का हाल बुरा है। उन्हें जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर कृषि-विपणन में सुधार के लिए एग्री-मार्केटिंग रिफॉर्म काउंसिल (एएमआरसी) बनाना चाहिए।’

पीके जोशी भी एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को वैध बनाने के खिलाफ हैं। 15 दिसंबर, 2020 को दि फाइनेंशियल एक्सप्रेस में अरबिंद के. पाढ़ी के साथ संयुक्त रूप से लिखे लेख में उन्होंने कहा, ‘कीमतें हमेशा कमोडिटी की प्रकृति, मांग, आपूर्ति और वैश्विक कीमतों से निर्धारित होती हैं और इसलिए कानूनी रूप से कीमत की गारंटी देना असंभव है।’ लेकिन उन्होंने अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की अनदेखी की जो कि ज्यादातर उपभोक्ता सामान बनाने वाले तय करते हैं और जिस पर वे बिक्री करते हैं।

उन्होंने यह भी लिखा कि किसानों की मांग ‘ऐसे समर्थन के अयोग्य है।’ उन्होंने दलील दी कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक तत्वों ने किसानों के आंदोलन को ‘हाइजैक’ कर लिया है और आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतः पंजाब के बड़े किसान और व्यापारी कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि ‘इन कृषि कानूनों को वापस लेना कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए विनाशकारी ही होगा।’

महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन के एक अदने से गुट के प्रमुख अनिल घवंत ने भी कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा था, ‘केंद्र को कृषि सुधार कानून वापस नहीं लेना चाहिए, इसके बजाय किसानों द्वारा की गई मांगों को ध्यान में रखते हुए संशोधन करना चाहिए।’ यद्यपि वह किसानों के इस तर्क से सहमत थे कि ये कानून बिना उनसे विचार- विमर्श बना दिए गए।

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