नफरती सियासत पर सवार उत्तराखंड की धामी सरकार
नई रिपोर्ट ने उन आशंकाओं पर मुहर लगा दी है कि एक शांत प्रदेश को किस तरह कट्टरपंथ का अखाड़ा बना दिया गया है।

बुल्ले शाह को ‘पंजाबी प्रबोधन का जनक’ कहा जाता है। वह ऐसे सूफी संत थे जिनकी अद्भुत रचनाएं प्यार, एकता और आध्यात्मिक आजादी की बात करती हैं। हिन्दू, सिख और मुस्लिम सभी उनका सम्मान करते हैं। 24 जनवरी 2026 की रात को हिन्दू रक्षा दल के कुछ कट्टरपंथियों ने मसूरी के विनबर्ग-एलन स्कूल में घुसकर उनकी मजार को तोड़ दिया। उनका दावा था कि 100 साल पुरानी यह इमारत उनकी ‘देवभूमि’ पर अवैध कब्जा थी। सोचिए, उन्हें इस बात का कितना यकीन था कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी कि उन्होंने हथौड़े और रॉड से मजार तोड़ने का वीडियो भी अपलोड कर दिया। उत्तराखंड पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं किया।
नवंबर 2025 में दून स्कूल के अंदर स्थित एक अन्य सौ साल पुरानी मजार को नफरत फैलाने वाले राधा धोनी के नेतृत्व वाले एक अन्य हिन्दुत्ववादी समूह के कहने पर गिरा दिया गया। धोनी सनातन संस्कृति नाम के एक दक्षिणपंथी संगठन का प्रमुख है, जिसका मकसद मुस्लिम दुकानदारों, सड़क किनारे चाय बेचने वालों और रेहड़ी वालों को निशाना बनाना लगता है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, जिनका बेटा दून स्कूल में पढ़ता है, जनता को यह बताने में गर्व महसूस करते हैं कि उनके कार्यकाल में 400 से ज्यादा ‘अवैध’ मजारों को गिराया गया। अपने ही अधिकारियों द्वारा किए सर्वे के आधार पर धामी दावा करते हैं कि उनकी सरकार ने ‘जमीन जिहादियों’ से 5,000 एकड़ जमीन वापस ले ली।
दो एक्टिविस्ट ने इस मुस्लिम विरोधी प्रोपेगेंडा की सच्चाई जानने का फैसला किया। उन्होंने उत्तराखंड के कोने-कोने में घूमकर यह डॉक्यूमेंट किया कि कैसे 2021-25 के बीच मुसलमानों को सोचे-समझे तरीके से हिंसा का शिकार बनाया गया, जिसमें सैकड़ों लोगों को अपना घर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनने पर मजबूर होना पड़ा। ‘एक्सक्लूडेड, टार्गेटेड एंड डिस्प्लेस्ड: कम्युनल नैरेटिव्स एंड वायलेंस इन उत्तराखंड’ नाम की यह रिपोर्ट एसोसिएशन ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने 22 जनवरी को प्रकाशित की। यह रिपोर्ट पुष्टि करती है कि कैसे एक शांतिपूर्ण राज्य कट्टरपंथ का अड्डा बन गया है।
यह नफरती अभियान दिसंबर 2021 में हरिद्वार धर्म संसद में शुरू हुआ, जहां यति नरसिंहानंद, प्रबोधानंद गिरि, यतींद्रानंद गिरि, साध्वी अन्नपूर्णा, स्वामी आनंद स्वरूप और कालीचरण महाराज ने खुलेआम हिन्दुत्व राष्ट्र और मुसलमानों को मारने की बात कही। उनके भाषणों से हिंसा, आर्थिक बहिष्कार और नफरत भरे अपराधों में तेजी आई, जो 2023 की पुरोला घटना में चरम पर पहुंच गई, जब अपहरण के एक झूठे मामले की वजह से मुस्लिम परिवारों को संपत्तियां बेचकर भागना पड़ा।
यह मॉडल उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली और गैरसैंण जैसे जिलों में पसर गया। धामी ने ‘जमीन जिहाद’, ‘मजार जिहाद, ‘थूक जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ की बात करके सांप्रदायिकता को खुल्लमखुल्ला बढ़ाया। ‘इंडिया हेट लैब’ की सालाना रिपोर्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को 2025 का ‘सबसे ज्यादा नफरत फैलाने वाला भाषण देने वाला’ बताया गया, जिसके कुछ दिनों बाद धामी ने कहा कि वह ‘इस टैग को स्वीकार करते हैं।’ उनका ताजा फतवा केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों में गैर-हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक का है।
एपीसीआर रिपोर्ट की खासियत है कि इसमें उत्तराखंड में सुनियोजित हिंसा के शिकार लोगों की बातें रिकॉर्ड की गईं। सबसे बुरा पुलिस का मूक दर्शक बन जाना है, जो ज्यादातर मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने से पीछे हट जाती है। कुछ उदाहरण काबिलेगौर हैंः
23 अक्तूबर 2024 को देवभूमि रक्षा अभियान के प्रमुख स्वामी दर्शन भारती के नेतृत्व में दक्षिणपंथी समूहों ने उत्तरकाशी के बाराहाट में एक मस्जिद को गिराने की मांग करते हुए रैली निकाली। मुसलमानों की दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। चार लोगों के परिवार में अकेली कमाने वाली सदस्य रेशमा हुसैन (37) ने कहा, ‘उन्होंने मेरी दुकान का ताला तोड़ दिया और अंदर घुस गए। लगभग 1 लाख रुपये का नुकसान हुआ।’
पास के श्रीनगर शहर में एक स्थानीय बीजेपी नेता लखपत सिंह भंडारी ने 15 मुस्लिम परिवारों के पलायन को उकसाया। लोगों को मजबूरन नजीबाबाद जाना पड़ा। श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल में टीचर शोएब अख्तर ने कहा, ‘लखपत भंडारी को मुख्त अतिथि के तौर पर बुलाया गया था, जहां प्रिंसिपल (जिस स्कूल में शोएब पढ़ाते हैं) ने लव जिहाद और जमीन जिहाद की बात की। कोई प्रिंसिपल पब्लिक में ऐसी बातें करता है, तो बच्चों पर क्या असर पड़ेगा?’
उसी स्कूल में एक इंग्लिश टीचर ने 12वीं क्लास के छात्र अहमद से पूछा कि उसके जैसे लोग अवैध मस्जिदें बनाने के लिए जमीन पर कब्जा क्यों कर रहे हैं। अहमद कहता है, ‘मैंने कौन सी जमीन कब्जा की? ऐसा महसूस होता है कि मुझे ही निशाना बनाया जा रहा है।’
श्रीनगर में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश सेमवाल का मानना है कि यह सांप्रदायिक अशांति जानबूझकर फैलाई गई ताकि बीजेपी केदारनाथ विधानसभा चुनाव जीत सके। अयोध्या और बद्रीनाथ की सीटें हारने के बाद केदारनाथ का चुनाव अहम हो गया था। अगस्त 2024 में चौरस में सांप्रदायिक तनाव तब और बढ़ गया जब दक्षिणपंथी समूहों ने पांच मुस्लिम दुकानदारों और उनके परिवारों को शहर छोड़ने के लिए मजबूर किया। उकसावे की वजह? एक हिन्दू महिला और नजीबाबाद से आया एक मुस्लिम कथित तौर पर रिलेशनशिप में थे। ‘लव जिहाद’ के आरोपी युवक के पिता वसीम ने कहा, ‘वे दोस्त थे। क्या दोस्ती अपराध है? क्या हमारे बच्चे किसी से दोस्ती करने से पहले धर्म देखेंगे? उन्होंने अफवाहों के आधार पर हमें भगा दिया। लड़की के परिवार ने भी बेटे के खिलाफ कभी शिकायत नहीं की।’
पचास साल के तसीम अहमद पिछले 45 सालों से चमोली जिले के गौचर कस्बे में रह रहे हैं। 15 अक्तूबर 2024 को उनके भाई का अपनी स्कूटी पार्क करने को लेकर एक हिन्दू से झगड़ा हो गया। इसपर हिन्दुत्व ब्रिगेड ने दस मुस्लिम दुकानदारों को कस्बा छोड़ने को मजबूर कर दिया। अहमद ने कहा, ‘पार्किंग के छोटे से झगड़े ने हमारी जिंदगी तबाह कर दी। हम 45 साल से रह रहे थे। किसी ने साथ नहीं दिया। हमें आधी रात में गौचर छोड़ना पड़ा।’
चमोली के नंदप्रयाग में एक मुस्लिम नाई पर छेड़छाड़ के आरोपों के बाद अगस्त-सितंबर 2024 में मुस्लिम विरोधी अभियान ने हिंसक रूप ले लिया। 22 अगस्त को नाई को अपनी दुकान खाली करने को कहा गया। वह नजीबाबाद वापस चला गया। 20 साल से ड्राईक्लीनिंग की दुकान चलाने वाले और 1975 से नंदा घाट में रहने वाले उसमान हसन ने बताया कि 3 सितंबर की रात को 15 परिवारों को भागना पड़ा। ‘31 अगस्त को स्थानीय लोगों ने नाई के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई... 1 सितंबर को व्यापार मंडल ने नंदा घाट पुलिस स्टेशन के सामने प्रदर्शन का आह्वान किया। हम मुसलमान भी उसमें गए। सोचा कि हमें कारोबारी समुदाय का साथ देना चाहिए। बैठक में ‘मुल्लों के दलालों को जूते मारो सालों को’ जैसे मुस्लिम विरोधी नारे लगाए गए।
हसन की दुकान में हिन्दुत्ववादी भीड़ ने तोड़फोड़ की और उसके गल्ले से 4 लाख रुपये चुरा लिए। उन्होंने सब कुछ लूट लिया और नदी में फेंक दिया। उसने इसका आरोप हिन्दुत्व नेता दर्शन भारती पर लगाया, जिसने मस्जिद के खिलाफ उत्तरकाशी रैली का नेतृत्व किया था। हसन कहते हैं, ‘उसे याद करके आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं…’।
हसन ने सुरक्षा के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने एसएसपी को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि किसी भी समुदाय के खिलाफ कोई अप्रिय घटना न हो, इसके बावजूद किसी भी मुसलमान ने इतना सुरक्षित महसूस नहीं किया कि वापस लौट सके। हसन ने अपनी दुकान फिर से खोली, लेकिन पाया कि कोई भी उसका साथ देने या उससे बात करने को तैयार नहीं था, जैसे वह कोई अपराधी हो। फिलहाल, नंदा घाट में हसन अकेले मुस्लिम हैं। यह हमारे समय की एक दुखद सच्चाई है।
अगर आपको धामी के सांप्रदायिक एजेंडे का कोई और सबूत चाहिए, तो उत्तराखंड यूनिफॉर्म सिविल कोड एक्ट, 2024, धर्म की आजादी और गैर-कानूनी धर्मांतरण पर रोक (संशोधन) बिल, और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान बिल, 2025 पर गौर करें, जो मुस्लिम-नियंत्रित मदरसा शिक्षा बोर्ड (जहां मुसलमानों के पास 13 में से 9 सीटें थीं) को खत्म करता है और उसकी जगह एक सरकारी संस्था बनाता है जहां मुसलमानों के पास 12 में से सिर्फ एक सीट है।
शासन के मोर्चे पर नाकाम रहने के बाद, धामी को भरोसा है कि उनके नफरती बोल 2027 के विधानसभा चुनावों में चुनावी फायदा दिलाएंगे।