चुनाव आयोग की 'डैमेज कंट्रोल' की कोशिश ने खड़े कर दिए कई और सवाल

चुनाव आयोग में मतभेद उजागर होने के बाद आयोग ने शनिवार को बैठक बुलाकर एक प्रेस नोट के जरिए कई बातों को सामने रखा और निष्पक्ष छवि पर लगे दाग को छिपाने की कोशिश की। लेकिन आयोग के प्रेस नोट ने खुद ही कई और सवाल खड़े कर दिए हैं।

तीनों चुनाव आयुक्त
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आखिरकार चुनाव आयोग की पूरी बेंच जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और बाकी दो आयुक्त विवेक जोशी और एस एस संधू की बैठक शनिवार को हुई। जाहिर है इस बैठक का मकसद आयोग की एकजुटता का प्रदर्शन करना था। शाम 5 बजे के बाद जारी प्रेस नोट के साथ तीनों आयुक्तों की फोटो भी शेयर की गई। अलबत्ता इस प्रेस नोट में आयोग ने उस भी गलतियों को स्वीकार किया जिनका खुलासा इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में प्रकाशित किया था।

लेकिन यह फैसला होना है कि क्या इस बैठक और उसके बाद जारी प्रेस नोट से चुनाव आयोग उस शर्मिंदगी और शक के दायरे से बाहर आ पाया है जिसमें वह पिछले साल जून से फंसा हुआ है। या फिर इस प्रेस नोट के जरिए उसने खुद ही शक को और गहरा कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर केबाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, वोटर लिस्ट के विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (एसआईआर) को रद्द करने और आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन इस सबके शनिवार दोपहर को तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक से यह भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि सब कुछ ठीक है। 

लेकिन, सब कुछ ठीक तो नहीं है। शनिवार को जब चुनाव आयोग की बैठक हुई, तो केरल के पूर्व मुख्य सचिव जिजी थॉमसन ने एक गंभीर दावा किया। उन्होंने 'मनोरमा ऑनलाइन' से कहा कि 2016 में ज्ञानेश कुमार ने उनसे बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए कहा था। ज्ञानेश कुमार को मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त और फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, ऐसे में यह गंभीर दावा सत्ताधारी पार्टी के साथ उनके करीबी रिश्तों को उजागर करता है। इस दावे के बाद उनकी स्थिति और भी मुश्किल हो जाएगी और उनके लिए अपने पद पर बने रहना कठिन हो जाएगा।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर इसी बात की तरफ इशारा किया।


चुनाव आयोग की तरफ से जारी किया गया साधारण सा प्रेस नोट—जोकि बहुत देर से आया हुआ बताया जा रहा है—वह आयोग की छवि और विश्वसनीयता को हुए नुकसान की भरपाई करने की नाकाम कोशिश और हताशा, दोनों को दर्शाता है।

1.       26 सितंबर 2026 को जारी प्रेस नोट में 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट और पिछले 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 अलग-अलग मौकों पर उठाए गए किसी भी मुद्दे से इनकार नहीं किया गया है (जैसा कि 'एक्सप्रेस' और अन्य ने बताया है)।

2.       असल में, प्रेस नोट यह मानता है कि आयोग की बैठकों से पहले कोई एजेंडा नहीं बांटा जाता था और बाद में कोई मिनट्स (बैठक का ब्योरा) भी जारी नहीं किए जाते थे। इसमें कहा गया है कि आयोग ने आज आदेश दिया है कि अब से एजेंडा और मिनट्स बांटे जाएं।

3.       प्रेस नोट के अनुसार, आयोग ने यह बात रिकॉर्ड पर रखी कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने आदेश में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के तहत प्रक्रियाओं को मंज़ूरी दी थी। इसमें नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म 6' में ऑनलाइन बदलाव भी शामिल थे। हालांकि, 'फॉर्म 6' में यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के आदेश के डेढ़ महीने बाद, यानी जुलाई 2026 में किया गया था।

4.       चुनाव आयोग के पास 'फॉर्म 6' में कोई भी बदलाव करने का अधिकार नहीं है; मुख्य चुनाव आयुक्त को छोड़कर बाकी दो आयुक्तों ने भी इस मुद्दे को उठाया था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंज़ूरी कैसे दी होगी?

5.       इसके अलावा, प्रेस नोट में इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में सिर्फ़ बिहार में पिछले साल हुए एसआईआर को मंज़ूरी दी थी। पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में एसआईआर को चुनौती देने वाली कई अन्य याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।

6.       प्रेस नोट इस बात से इनकार नहीं करता है कि कमीशन की बैठक न हो पाने के कारण सालाना परफॉर्मेंस अप्रेज़ल रिपोर्ट  रुकी हुई थीं। प्रेस नोट में बस यह बताया गया है कि कमीशन ने 31 दिसंबर, 2026 तक सभी लंबित अप्रेजल रिपोर्ट्स को निपटाने का फ़ैसला किया है।

7.       प्रेस नोट इस बात से इनकार नहीं करता कि आयोग के कर्मचारियों को चुनाव आयोग की मंज़ूरी या अनुमति के बिना विदेश यात्रा करने की इजाज़त दी गई थी। अपनी ही गलती मानते हुए, प्रेस नोट में यह कहा गया है कि अब से कोई भी कर्मचारी मंज़ूरी और उचित अनुमति के बिना विदेश यात्रा नहीं करेगा।


8.       कमीशन इस बात से इनकार नहीं करता कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ईआरओ), खासकर गोवा में, ईसीआईनेट (ECINET) का इस्तेमाल करने और कम से कम 91 मामलों में गलत तरीके से हटाए गए नामों को ठीक करने में नाकाम रहे। आयोग को इस बाबत आठ रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला और आईटी की डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि उन्हें हर बार इसकी जानकारी दी गई थी। प्रेस नोट में अब बस यह कहा गया है कि गोवा में 91 में से 83 वोटरों ने फॉर्म 6 भरा था और उन्हें वोटर लिस्ट में वापस शामिल किया जा रहा है।

9.       आयोग का प्रेस-नोट अपने टेक्नोलॉजी प्लेटफ़ॉर्म ईसीआईनेट (ECINET) के बारे में किसी भी तरह की शंकाओं का समाधान नहीं करता है। इस प्लेटफ़ॉर्म में बिना किसी टेस्ट के और बिना यह सर्टिफ़ाई किए कि इसमें कोई समस्या नहीं है, बीएलओ ऐप, ईआरओनेट (ERONET) और 41 अन्य ऐप्स को इंटीग्रेट किया गया था।

10.     हालांकि, अब आयोग ने ईसीआईनेट (ECINET) की जांच के लिए एक एक्सपर्ट पैनल बनाने और IIT से एक एक्सपर्ट को बुलाने का फ़ैसला किया।

11.     आयोग ने आज साफ़ किया कि फ़ॉर्म 6 के साथ लगा डिक्लेरेशन सिर्फ़ एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ही भरना होगा, जबकि नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए पहले वाला फ़ॉर्मेट ही लागू रहेगा; जिन वोटर्स को एसआईआर प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उन्हें "मैप" नहीं किया गया था या उनमें "लॉजिकल गड़बड़ी" पाई गई थी, उन्हें सुनवाई के लिए नोटिस नहीं भेजा जाएगा। इसके बजाय, बूथ लेवल ऑफ़िसर्स (बीएलओ) घर-घर जाकर ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करेंगे; आयोग ने महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समय-सीमा भी क्रमशः 12 अक्टूबर और 30 अक्टूबर तक बढ़ा दी है।