तन गईं असंतुष्ट श्रमिकों की मुट्ठियां: महंगाई बढ़ रही और उनकी सुनने वाला कोई नहीं

महंगाई बढ़ रही और उनकी सुनने वाला कोई नहीं, संगठित क्षेत्र के ठेका मजदूरों की व्यथा-कथा एकसमान है।

फोटो: विपिन
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नंदलाल शर्मा

कोई चेहरा नहीं, कोई नेता नहीं, कोई यूनियन नहीं। फिर भी, देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों श्रमिक अपनी सैलरी बढ़ाने के लिए आंदोलित हैं। वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं, मगर उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) सहित कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक भी हुआ है। आगजनी हुई है। ठेका मजदूरों (कॉन्ट्रैक्ट लेबर) के इस श्रृंखलाबद्ध विरोध प्रदर्शन की शुरुआत बिहार के बरौनी स्थित इंडियन ऑयल की रिफाइनरी से हुई। उनलोगों ने वेतन बढ़ाने, काम की रोजाना अवधि आठ घंटे करने और उन्हें भविष्य निधि (पीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) जैसी सुविधाएं देने की मांग की।

23 फरवरी 2026 को हरियाणा के पानीपत में इंडियन ऑयल की रिफाइनरी में 30 हजार से ज्यादा ठेका मजदूरों ने हड़ताल कर दी जो लगभग छह दिन चली। 27 फरवरी को गुजरात में सूरत के हजीरा में ऑर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील के प्रोजेक्ट पर कार्यरत लॉर्सन एंड ट्रुबो के 5,000 ठेका मजदूरों ने हड़ताल की। ऊर्जा क्षेत्र में एनटीपीसी पतरातू (झारखंड), एनटीपीसी नबीनगर औरंगाबाद (बिहार), अडानी थर्मल पावर प्लांट कोरबा (छत्तीसगढ़), वेदांता पावर प्लांट सिंघीतराई (छत्तीसगढ़), हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड चित्तौड़गढ़ (राजस्थान), इंडियन ऑयल वड़ोदरा (गुजरात), ओबरा थर्मल पावर प्लांट सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) में आंदोलन की खबरें हैं। जनवरी से मार्च 2026 तक बड़े पावर प्लांटों एवं ऊर्जा के प्रमुख केन्द्रों में दो दर्जन से ज्यादा मजदूर हड़तालें रिपोर्ट हुई हैं। ध्यान रहे कि सबसे पहले 1 जनवरी 2026 को गिग वर्कर्स ने काम के बेहतर हालात और अधिकारों की मांग को लेकर हड़ताल की थी।

मार्च-अप्रैल में हरियाणा, खास तौर से मानेसर की कई कंपनियों में आंदोलन हुए। इनमें होन्डा, मुंजाल शोवा, सत्यम ऑटो कंपोनेन्ट, रूप पॉलिमर लिमिटेड, ऋचा ग्लोबल, मॉडेलमा एक्सपोर्ट जैसी कंपनियां शामिल हैं। कंपनी प्रबंधन को श्रमिकों की मांग के आगे झुकना पड़ा और जिन मजदूरों की तनख्वाह पहले लगभग 11,200 रुपये थी, उसे बढ़ाकर 16,000 रुपये किए गए। यह पांच हजार रुपये की बढ़ोतरी भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन इसने कारखानों और कंपनियों में काम करने वाले दूसरे मजदूरों को यह भरोसा दिया कि लड़कर कुछ हासिल किया जा सकता है।


झारखंड एटक से जुड़े ट्रेड यूनियन लीडर आनंद कुमार कहते हैं कि आंदोलन करने वाले श्रमिक संगठित क्षेत्र (जैसे पेट्रोलियम, ऊर्जा, ऑटोमोबिल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीमेंट, होजरी) के ठेका मजदूर हैं। चाहे वह एनटीपीसी का हो, होंडा का हो या किसी होजरी कंपनी का- मुख्यतः यह आंदोलन उन्हीं का है। यह दायरा बढ़ रहा है। अर्बन कंपनी मुख्यतः दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं को घरों में बर्तन सफाई, झाड़ू-पोछा आदि के लिए भेजने के खयाल से सर्विस प्रोवाइडर या फैसिलेटेटर के काम करती है। ये महिलाएं भी कम भुगतान की वजह से आंदोलित हैं।

इस आंदोलन में मजदूरों का सबसे बड़ा हथियार बना मोबाइल, जिसके जरिये उन्होंने वीडियो और रील बनाकर साझा किया, और दूसरे मजदूरों को प्रेरित किया है। मजदूरों के बीच आई इस चेतना का कारण खुद उनका जोखिम भरा जीवन है। मजदूर अधिकार कार्यकर्ता सुनंद कहते हैं कि 'प्रदर्शन करने वाले मजदूर सोशल मीडिया के जरिये भी अपनी आवाज उठा रहे थे। इस तरह एक कारखाने के मजदूर ने दूसरे कारखाने के मजदूर को अपने हक के लिए आवाज उठाने को प्रेरित किया। उन्हें भरोसा मिला कि उनकी जैसी स्थिति में काम करने वाला मजदूर लड़ सकता है तो हम भी लड़ सकते हैं। ईरान युद्ध के बाद पैदा हुए ईंधन संकट ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया क्योंकि कुछ जगह कंपनियों ने मजदूरों से काम लेना बंद किया, तो उन्हें अपने गांव-घर लौटने पर भी विवश होना पड़ा।'

नोएडा फेज 2 में शाही एक्सपोर्ट्स में चेकर का काम करने वाली भारती कुमारी बताती हैं कि ‘काम करते हैं 12 घंटे और हमारी सैलरी है लगभग 12 हजार। कमरे का किराया है 6,000 रुपये। पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर होने को है। गैस 400 रुपये किलो तक मिलने लगी है। बिजली का रेट 10-12 रुपया प्रति यूनिट देना पड़ता है। ऊपर से बच्चों की पढ़ाई का बोझ अलग है। स्कूल वाले दोनों सेमेस्टर की फीस एक साथ जमा करने को कहते हैं। हम खाएंगे क्या? हमारी सैलरी 20 हजार महीना होनी चाहिए।’

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों ने श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन को दबाने की कोशिश नहीं की। हरियाणा सरकार ने 7 अप्रैल को पूरे मानेसर-गुड़गांव क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी और मजदूरों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा दी। इसके बावजूद मजदूर नहीं डरे। 8 अप्रैल को और बड़ी संख्या में मजदूर हड़ताल पर उतरे। जब संघर्ष बढ़ता गया, तब सरकार ने दमन चक्र चलाना शुरू किया। 8 अप्रैल को मानेसर में मजदूरों पर लाठीचार्ज किया गया। 9 अप्रैल को हरियाणा पुलिस ने 20 से ज्यादा महिलाओं समेत 50 से अधिक मजदूरों को गिरफ्तार किया।


11 अप्रैल को यूपी पुलिस ने 4 मजदूर कार्यकर्ताओं को नोएडा में बॉटैनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया। 12 अप्रैल को उनकी जमानत कराने गए वकीलों- प्रतीक कुमार और मोहम्मद तनवीर अली तथा 2 अन्य कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में ले लिया। अलग-अलग जगहों पर पुलिसिया लाठीचार्ज में दर्जनों मजदूर घायल हो गए।

हरियाणा में श्रमिकों का वेतन 2015 में रिवाइज हुआ था। कायदे से, इसे पांच साल बाद 2020 में रिवाइज हो जाना था, लेकिन राज्य सरकार 6 साल तक टालती रही। नतीजा यह हुआ कि न्यूनतम वेतन नहीं बढ़ा और जब दबाव बना तो मई 2025 में राज्य सरकार ने एक कमिटी बनाई। इसकी 9 मीटिंग हुईं। लेकिन कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ। फिर अप्रैल 2026 में श्रमिकों का स्वतःस्फूर्त आंदोलन खड़ा हो गया। इसके दबाव में ही हरियाणा सरकार को 9 अप्रैल को वेतन वृद्धि की अधिसूचना जारी करनी पड़ी, जिसमें न्यूनतम मासिक वेतन रुपये 15,220 (अकुशल) और रुपये 19,425 (कुशल) किया गया है, हालांकि मजदूरों की मांग 25-30 हजार रुपये प्रति महीने की रही है।

नोएडा में विरोध प्रदर्शन तब उग्र हुआ, जब हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन में संशोधन किया। हालांकि चार दिनों के प्रदर्शन के बाद मजदूरों का धैर्य जवाब दे गया। 13 अप्रैल की सुबह प्रदर्शन भड़क उठा और इसके अगले दिन यूपी सरकार ने मजदूरों की सैलरी में मामूली इजाफे का ऐलान किया। अंतरिम तौर पर की गई इस घोषणा के बाद यूपी में अकुशल श्रमिकों को 13,313 रुपये से बढ़कर 13,690 रुपये मिलेंगे। अर्धकुशल श्रमिकों की 15,059 रुपये और कुशल श्रमिकों की 16,868 रुपये प्रति महीना नई सैलरी होगी। इसके बाद गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने बयान जारी कर कहा कि आउटसोर्सिंग एजेंसी एवं एजेंसी के श्रमिकों द्वारा उपद्रवी व्यवहार करने पर एजेंसी को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। उनका लाइसेंस निरस्त होगा। मतलब, एक किस्म से आउटसोर्स करने वाली एजेंसी को 'चेतावनी' दी गई कि वे जिन्हें काम पर रख रहे, उन पर 'नियंत्रण' रखें।

अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि 'हमारे यहां बेरोजगारी बहुत ज्यादा है, 94 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। ऊपर से वास्तविक महंगाई बहुत ज्यादा है, और मजदूर की 'असल आय' बहुत तेजी से गिर रही है। अगर आपकी तनख्वाह जस की तस रहे और महंगाई बढ़ जाए, तो असली आय कम हो जाती है, यानी आपकी खरीदने की क्षमता घट जाती है। मजदूरों की तनख्वाह नहीं बढ़ रही, लेकिन महंगाई बढ़ रही है। बार्गेनिंग पावर कम होने की वजह से मजदूर अपनी तनख्वाह को महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़वा पा रहे। दूसरी बात कि संगठित क्षेत्र भी अब स्थायी मजदूरों की जगह ठेका मजदूर रख रहा है। ये ठेका मजदूर यूनियन में नहीं होते, इसलिए वे संगठित ढंग से लड़ाई नहीं लड़ पाते। तभी गुरुग्राम-नोएडा सहित देश के तमाम हिस्सों में अचानक प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, क्योंकि सबकी परेशानी एक जैसी है।'


बड़ी बात यह है कि नए लेबर कोड में फैक्ट्री की परिभाषा बदल दी गई है। पहले जहां बिजली से चलने वाली फैक्ट्री में 10 मजदूर और बिना बिजली वाली फैक्ट्री में 20 मजदूर होने पर कानून लागू होता था, अब मजदूर सीमा बढ़ाकर क्रमशः 20 और 40 कर दी गई है। मतलब, बहुत सी छोटी फैक्ट्रियां अब कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगी। जब फैक्ट्री कानून के दायरे से बाहर हो जाएगी, तो कोई नहीं देखेगा कि वहां 8 घंटे काम हो रहा है, 12 घंटे या 14 घंटे। ठेका मजदूरों के मामले में भी यही हो रहा है। पहले अगर कोई ठेकेदार 20 या उससे ज्यादा मजदूर सप्लाई करता था, तो उसे लाइसेंस लेना पड़ता था। अब यह सीमा 50 कर दी गई है। अगर कोई ठेकेदार 48 मजदूर सप्लाई करता है, तो उसे लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी। जब लाइसेंस नहीं होगा, तो उस पर कानून भी लागू नहीं होगा- न न्यूनतम वेतन की गारंटी, न ईपीएफ, न सुरक्षा की जिम्मेदारी और न ही निश्चित काम के घंटे।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर कहती हैं कि 'सरकार की तरफ से कहा जा रहा था कि 'इंस्पेक्टर राज' खत्म करना है और उसकी जगह 'फैसिलिटेटर' लाना है, जबकि ट्रेड यूनियन कह रहे थे कि नए लेबर कोड मजदूरों को लगभग गुलामी की ओर धकेलते हैं। इससे औद्योगिक अशांति बढ़ेगी। अब जो घटनाएं अलग-अलग राज्यों में हो रही हैं, वे उसी का संकेत हैं और यह आगे और फैल सकती हैं।'

नोएडा फेज-2 में प्रदर्शनकारी अकुशल मजदूर सिर्फ सैलरी बढ़ाने की बात करते हैं, वह चार नए श्रम कानूनों का जिक्र नहीं करते हैं। मगर नवंबर 2025 के बाद से भाजपा और भारतीय मजदूर संघ ने लगातार इस बात का प्रचार किया कि मोदी सत्ता द्वारा संसद से पारित कराए गए चार नए लेबर कोड मजदूरों के हित में हैं।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस के हरियाणा महासचिव जयभगवान कहते हैं कि 'यह ऑफिशियल प्रोपेगैंडा था, मगर अनऑफिशियल प्रोपेगैंडा था कि 1 अप्रैल से सबकी सैलरी बढ़ जाएगी, सब पक्के हो जाएंगे, सबको तमाम सुविधाओं का लाभ मिलेगा। इसलिए अकुशल श्रमिकों को उम्मीद थी कि 1 अप्रैल से उनकी जिंदगी बदल जाएगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। मजदूर भले लेबर कोड की बात नहीं करते हो, लेकिन अंत में उनकी लड़ाई नए श्रम कानूनों के खिलाफ ही होगी।'

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