यूपी इलेक्शन की सबसे रोचक कहानी: योगी की महत्वाकांक्षा, अयोध्या का असमंजस और गोरखपुर में 'घर वापसी'

योगी गोरखपुर से चुनाव लड़ेंगे। तो क्या बीजेपी ने यह ऐलान कर योगी के पर कतरे हैं, या योगी अयोध्या से भी चुनाव लड़कर नया दांव चल सकते हैं? वजह कुछ भी हो, लेकिन अयोध्या और गोरखपुर के बीच योगी का नाम लहराकर बीजेपी ने योगी के साथ खुद का भी नुकसान ही किया है।

फाइल फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके गृह जिले गोरखपुर से ही विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी के इस फैसले ने बहुत लोगों को चौंका दिया, क्योंकि योगी तो अयोध्या से चुनाव लड़ने का मन बना चुके थे। तो सवाल है कि क्या योगी ने खुद अपने लिए 'सेफ सीट' चुनी या फिर पार्टी ने ही उनके पर कतर दिए क्योंकि उनकी छवि मोदी ब्रांड की तरह की जाने लगी थी? दोनों ही पस्थितियों में नुकसान बीजेपी को ही होना है। हालांकि चर्चा ऐसी भी है कि योगी अभी भी अयोध्या से भी चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन फिलहाल यह दूर की कौड़ी लगती है।

अयोध्या सीट को लेकर योगी का लगाव ऐसा नहीं है जिसका प्रभाव हाल-फिलहाल खत्म हो जाएगा, लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी में लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। अयोध्या एक ऐसी जगह है जो दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े लोगों के लिए काफी अहम है। अयोध्या सीट पर करीब 3.16 लाख वोटर हैं। अयोध्या शहर की सीट बरसों से यूपी में पॉलिटिकल नेरैटिव का केंद्र रही है। बीजेपी के लिए अयोध्या, मथुरा या वाराणसी में हारने का अर्थ है उसके कोर वोटर के बीच उसकी विश्वस्नीयता खत्म हो जाना क्योंकि वह खुद को हिंदुत्व की रक्षक के तौर पर पेश करती रही है। हालांकि 1990 के दशक में मंदिर आंदोलन के चरम के बावजूद सत्तारूढ़ दल कई बार इस सीट पर हार का सामना कर चुका है। फिर भी अयोध्या विधानसभा सीट आकर्षण का केंद्र तो बनी ही रही है।

योगी ने जब अयोध्या सीट से उम्मीदवारी का दावा पेश किया होगा तो उनके जहन में कई बातें रही होंगी। पहली और सबसे अहम तो यही कि वह एक ऐसी सीट का प्रतिनिधित्व करेंगे जो हिंदूओं की धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। वैसे यह नैरेटिव भी दक्षिणपंथियों का ही गढ़ा हुआ है। हालांकि योगी देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन पूरे भारत में उन्हें अपनी पहचान स्थापित करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। उन्हें खुद की छवि भविष्य के एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करनी होगी जो जो हिंदू धर्म का रक्षक है, और यह वह बात है जिसके लिए भगवा दल वर्षों के जीतोड़ कोशिश करता रहा है। लेकिन क्यों? हो सकता है वह आने वाले वक्त में वह खुद को किसी बड़ी भूमिका में देख रहे हों।

शीर्ष पद की महत्वाकांक्षा?

देश में जब 2024 के चुनाव होंगे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 73 साल के हो चुके होंगे। और जो मानदंड खुद उन्होंने ही स्थापित किए हैं, उसके मुताबिक उन्हें 2026 तक मार्गदर्शक मंडल में चले जाना चाहिए। तो क्या वे 2026 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे या फिर 2024 का चुनाव हार जाएंगे? उनके बाद कौन होगा नेता? हालांकि अभी पूछना थोड़ा अटपटा है, लेकिन बीजेपी में अंदरखाने ऐसी ही चर्चाएं शुरु हो चुकी हैं। रोचक बात यह है कि बीजेपी ने जब 2017 में यूपी चुनाव लड़ा था तो उस समय योगी मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं थे। उन्होंने इस पद के लिए काफी मेहनत की और जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं कि ‘मोदी-शाह की पूर्ण सहमति के बिना ही’ उन्हें सीएम बनाया गया।

तो क्या मान लिया जाए कि बीते 5 साल के दौरान योगी ने पहाड़ फतह कर लिया है? सबसे बड़ा सवाल तो यही है। हर राजनीतिज्ञ की आकांक्षाएं होती हैं, और इसमें कुछ गलत भी नहीं है, लेकिन यह ऐसी आकांक्षा है जिससे कई लोग असहज हो रहे हैं। प्रदेश में देखें तो उनके डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य की अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं। इसके अलावा भी कई और हैं जो अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इनमें राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और सबसे अधिक तो खुद अमित शाह हैं।


क्या योगी को मजबूर किया गया 'घर वापसी' के लिए?

बीजेपी के लिए अयोध्या इस बार आसान नहीं है। मुख्यमंत्री योगी के लिए भी नहीं। 2017 के चुनाव में बीजेपी के वेद प्रकाश गुप्ता 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे। समाजवादी पार्टी के तेज नारायण पांडे को भी 56.574 वोट मिले थे और बीएसपी के बज्मी सिद्दीकी ने भी 39,554 वोट हासिल किए थे। इससे पहले 2012 में सपा के तेज नारायण पांडे ने बीजेपी के लल्लू सिंह को 5,405 वोटों के नजदीकी अंतर से हराया था। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के तमाम धुआंधार प्रचार के बावजूद समाजवादी पार्टी को 40.9 फीसदी वोट हासिल हुए थे। ऐसे में अगर ओबीसी और अनुसूचित जातियां एकजुट होकर सपा की तरफ चली गईं और कांग्रेस उम्मीदवार को अच्छे वोट मिले तो बीजेपी को अयोध्या में ही मुंह की खानी पड़ सकती है।

गोरखपुर में भी योगी को कड़े मुकाबले का सामने करना पड़ता अगर निषाद पार्टी के साथ बीजेपी का गठबंधन नहीं हुआ होता। बहुत से नेता, जिनमें अयोध्या से मौजूदा विधायक भी शामिल हैं, वे योगी का अयोध्या से टिकट कटने से राहत महसूस कर रहे हैं। बीजेपी में कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि योगी की महत्वाकांक्षाएं कुछ ज्यादा ही बड़ी हैं। एक नेता ने कहा, "अगर योगी अयोध्या से लड़ते और जीत जाते तो निश्चित रूप से उनकी राष्ट्रीय पहचान बनती, जिससे मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह को चुनौती मिलती।"

क्या योगी अभी भी अयोध्या से ही लड़ना चाहते हैं?

तो क्या योगी अभी भी अयोध्या से ही चुनाव लड़ना चाहते हैं। हवा में बातें तो यह हैं कि गोरखपुर की सेफ सीट के बावजूद योगी अयोध्या से भी चुनाव लड़ने की जुगत में हैं। वैसे भी बीजेपी अभी तक बीजेपी योगी पर नकेल तो नहीं ही डाल पाई है। योगी के मन में भी कुछ तो भय है इसीलिए वह दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं।

अयोध्या के स्थानीय निवासी कृष्ण कुमार पांडे का कहना है कि, “एक थ्योरी तो यह भी चल रही है कि बीजेपी में ही कोई है जो योगी आदित्यनाथ के भविष्य को सीमित करना चाहता है। भले ही उन्हें अयोध्या से भी टिकट मिल जाए, लेकिन कोई भी उन्हें जीतते हुए नहीं देखना चाहता ताकि उनका कद बड़ा न हो।”

लखनऊ में राजनीतिक विश्लेषक नीरज सक्सेना कहते हैं कि, “लेकिन अगर योगी ने दोनों सीटों से नामांकन दाखिल कर दिया तो? वह दोनों सीटें जीत जाएँगे और बीजेपी को खामियाजा भुगतना पड़ेगा। एक नैरेटिव यह भी गढ़ा गया है कि योगी अयोध्या में विपक्ष का सामना करने से डर रहे हैं। और अगर वे दोनों सीटों से लड़ते हैं तो लोग तो यही कहेंगे कि उन्हें गोरखपुर की सेफ सीट तक पर जीत का भरोसा नहीं है।“


योगी के साथ नुकसान तो बीजेपी का भी हुआ!

तो फिर योगी के अयोध्या से चुनाव लड़ने के कयास किसने लगाए थे, उन्होंने खुद या बीजेपी ने। जो भी हो लेकिन मीडिया में हो हल्ला खूब हुआ था। लखनऊ में काम करने वाले एक पत्रकार अमन कहते हैं कि, “जब चुनाव नजदीक होते हैं तो इस किस्म के ऐलान जानबूझकर किए जाते हैं, इससे या तो नया संदेश देने की कोशिश होती है या फिर पहले से तय माहौल में को बदलने की।” वे कहते हैं कि अयोध्या योगी का मास्टरस्ट्रोक तो था, लेकिन अब कहानी पलट चुकी है।

गोदी मीडिया में ढोल-नगाड़ों के बाद हकीकत यही है कि योगी की घर वापसी हो गई है, जैसा कि विपक्ष कटाक्ष कर रहा है। कांग्रेस नेता चंद्र भूषण कहते हैं ‘उन्हें अयोध्या में हार का आभास हो गया था...।’ ऐसा ही कुछ समाजवादी पार्टी भी कह रही है। अब विपक्ष पूरा जोर लगाकर योगी को गोरखपुर में हराने की कोशिश में है, लेकिन शायद ऐसा करना टेढ़ी खीर होगा।

कुल मिलाकर कहानी यह बनती है कि योगी फंस गए और गलत मैसेज का शिकार बने। वह भले ही गोरखपुर से जीत जाएं, और अगर दो सीट से लड़े तो अयोध्या से भी जीत सकते हैं, लेकिन योगी और बीजेपी दोनों को जो राजनीतिक नुकसान होना था, वह तो हो ही चुका है।

(सैयद जैगाम मुर्तजा की रिपोर्ट)

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