बंगाल की चाबी अब भी महिलाओं के हाथ

संदिग्ध एसआईआर प्रक्रिया ने महिला मतदाताओं का अनुपात खासा कम कर दिया है। ऐसा पिछले एक दशक में पहली बार हुआ है।

ममता बनर्जी ने एलपीजी की कमी और केंद्र सरकार की नाकामियों के साथ ही अपने चुनाव प्रचार के लिए अनोखे तरीके अपनाए हैं (फोटो : Getty Images)
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चुनावी रैलियों में ममता बनर्जी बार-बार पूछती हैं: ‘आपमें से कितने लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं? जरा अपने हाथ ऊपर उठाएं।’ अक्सर, वह लिस्ट से बाहर रह गई कुछ महिलाओं को बुलाती हैं, और चुनाव आयोग तथा ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) पर जान-बूझकर उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित करने का आरोप लगाती हैं। वादा करती हैं, ‘जो लिस्ट से बाहर रह गए हैं, उन्हें डरने की जरूरत नहीं।’ पार्टी कार्यकर्ताओं से कहती हैं कि प्रभावित वोटरों की मदद करें ताकि वे दोबारा लिस्ट में शामिल होने के लिए अपील कर सकें।

ममता शायद अपनी सबसे कठिन चुनावी लड़ाई लड़ रही हैं। तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद उन्हें सत्ता-विरोधी लहर, कई सहयोगियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और रोजगार के अवसरों एवं औद्योगिक विकास में सुस्ती को लेकर निराशा का सामना करना पड़ रहा है। वह 70 साल से ज्यादा की हो चुकी हैं। उन्हें बीजेपी जैसे एक जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ रहा है, जो उन्हें सत्ता से हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

2016 और 2021 के चुनावों में महिलाओं ने भारी संख्या में उनके पक्ष में मतदान किया था। अगर यह रुझान जारी रहता है, तो उनके सत्ता में बने रहने की संभावना है। सवाल यह है कि क्या वे ऐसा करेंगी?

एसआईआर से पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं के अनुपात में काफी कमी आई है- पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है। राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में सामने आए चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि बंगाल में महिला मतदाताओं की संख्या 10 साल के सबसे निचले स्तर पर है; एसआईआर के बाद लिंग अनुपात 2024 की लोकसभा मतदाता सूची में प्रति 1,000 पुरुषों पर लगभग 966 महिलाओं से गिरकर 956 रह गया है।

वोटर लिस्ट से इन नामों को हटाने का चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा? तृणमूल कांग्रेस की नेता और राज्यमंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य बेबाक तरीके से कहती हैं, ‘चुनाव आयोग ने जान-बूझकर महिला मतदाताओं को निशाना बनाया है। हमारे बूथ-स्तर के एजेंटों को सुनवाई सत्रों में मतदाताओं की मदद नहीं करने दी गई।’ वह कहती हैं कि ‘तार्किक विसंगति’ की इस नई श्रेणी का जिक्र तब नहीं किया गया, जब एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई। उनका आरोप है कि इसे बाद में सिर्फ असली मतदाताओं के नाम हटाने के इरादे से शामिल किया गया था, और उन्हें पूरा भरोसा है कि यह चाल कामयाब नहीं होगी।

राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती मानते हैं कि एसआईआर चुनावी गणित में अनिश्चितता की एक नई परत जोड़ देता है। कहते हैं, ‘मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटे जाने के मुकाबले लिंग अनुपात में गिरावट तृणमूल कांग्रेस के लिए ज्यादा बड़ी सिरदर्दी है,’ और बताते हैं कि इसका असर उन सीटों पर पड़ सकता है जहां मुकाबला नजदीकी है। फिर भी, उन्हें उम्मीद है कि ज्यादा मतदान और महिलाओं का एकजुट होना ममता को खोई जमीन वापस पाने में मददगार होगा। 


ममता के जन-कल्याण-आधारित रुख की वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों ने उद्योग के मुकाबले आर्थिक मदद को प्राथमिकता देने के लिए आलोचना की है। लेकिन इसका असर यह है कि ममता के महिला मतदाताओं के साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे बीजेपी-शासित राज्यों में ‘लाड़ली बहना’ और ‘लाड़की बहिन’ जैसी तदर्थ और ऐन मतदान से पहले किए जाने वाले नकद हस्तांतरण के विपरीत, ममता की योजनाएं व्यवस्थित रूप से नियोजित और बजट-बद्ध होती हैं। 

एक और महत्वपूर्ण अंतर परामर्श प्रक्रिया है। तृणमूल कांग्रेस के पहले वित्तमंत्री और जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. अमित मित्रा को 2013 में ‘कन्याश्री’ योजना शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। यह एक सशर्त नकद हस्तांतरण योजना है, जिसका उद्देश्य बाल विवाह को रोकना है। जो लड़कियां स्कूल जाती हैं और अविवाहित रहती हैं, उन्हें सालाना छात्रवृत्ति मिलती है; उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने पर राशि बढ़कर 25,000 हो जाती है। योजना की तारीफ संयुक्त राष्ट्र ने भी की है और राज्य सरकार के दावे के मुताबिक इससे एक करोड़ लड़कियों को लाभ मिला है। 

इसके बाद ‘रूपश्री’ (2018) आई, जिसमें गरीब परिवारों की वयस्क महिलाओं की शादी के लिए 25,000 रुपये की मदद दी जाती है। 2021 में ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना आई जिसमें करीब 2.4 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। यह 25 से 60 वर्ष की सभी पात्र महिलाओं के लिए एक यूनिवर्सल कैश ट्रांसफर योजना है। यह सामान्य वर्ग के लिए 500 रुपये से लेकर एससी/एसटी महिलाओं के लिए 1,700 रुपये तक है और महिलाओं के खातों में नियमित ट्रांसफर किया जाता है।

ये कैश ट्रांसफर, वृद्धावस्था और विधवा पेंशन के अलावा हैं; साथ ही यूनिवर्सल स्वास्थ्य बीमा योजना ‘स्वास्थ्य साथी’ (2016)- जो ‘आयुष्मान भारत’ से काफी पहले शुरू हुई और जिसमें परिवार का कार्ड महिलाओं के नियंत्रण में रहता है-स्कूल जाने वाले लड़के-लड़कियों को साइकिल देने वाली योजना ‘सबुज साथी’ (2025), और शौचालय और घर बनाने के लिए दिए जाने वाले अनुदान भी इसमें शामिल हैं।

विधानसभा चुनावों से महीनों पहले राज्य सरकार ने इन योजनाओं के तहत दी जाने वाली राशि बढ़ा दी है। इसके अलावा, 2025-26 के बजट में महिलाओं से जुड़ी विशेष योजनाओं के लिए 1.18 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा और बच्चों से जुड़ी पहलों के लिए 59,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग का बजट बढ़ाकर 38,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। ‘आशा’ फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाया गया है, और हाल ही में शुरू की गई ‘युवा साथी’ योजना के तहत 21 से 40 वर्ष के बेरोजगारों को पांच साल तक हर महीने 1,500 रुपये दिए जाएंगे।

‘मुक्तिधारा’ जैसे अन्य कार्यक्रम ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं को छोटे उद्यमों के लिए मदद देकर सशक्त बनाते हैं, जबकि ‘महिला समृद्धि योजना’ अनुसूचित जाति और हाशिये की महिला उद्यमियों को ऋण और सब्सिडी देती है।


जमीनी स्तर पर फर्क साफ दिखता है। फूलों का कारोबार करने वाली दीपाली सांतरा के पति की महामारी के दौरान ड्राइवरी की नौकरी चली गई तो दीदी ने उन्हें मुश्किल से निकाला। अब उन्होंने अपने कारोबार को बढ़ाते हुए बोतलबंद पानी, सत्तू का शरबत और नाश्ता बेचना शुरू कर दिया है। उनके बेटे सुरजीत कहते हैं, ‘हम दीदी के शुक्रगुजार हैं। ममता बनर्जी ने मेरी मां को मुश्किलों से लड़ने की हिम्मत दी।’

कोलकाता की एमहर्स्ट स्ट्रीट पर, पूजा घोष सड़क किनारे स्टॉल चलाती हैं, जहां वह सिंदूर, अगरबत्ती और मालाएं बेचती हैं- यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद किस तरह उनकी आजीविका चलाने में सहायक होती है।

तृणमूल की राज्यसभा सांसद रचना बनर्जी, जी बांग्ला पर प्रसारित होने वाले लोकप्रिय टीवी शो ‘दीदी नंबर 1’ होस्ट करती हैं; इसमें हिम्मत और लगन से कामयाबी हासिल करने वाली महिलाओं की कहानियां दिखाई जाती हैं। वह कहती हैं, ‘गांव की कई महिलाओं ने अपने भत्ते का इस्तेमाल पोल्ट्री फार्म शुरू करने, सिलाई मशीन खरीदने या छोटी-मोटी किराने की दुकानें खोलने के लिए किया है। ये भत्ते तुरंत मुश्किलें तो खत्म नहीं करते, लेकिन महिलाओं को योजना बनाने, बचत करने और सपने देखने का मौका जरूर देते हैं।’ 

स्वतंत्र टिप्पणीकार सुदीप्ता सेनगुप्ता कहती हैं, ‘ममता जानती हैं कि कौन मुद्दे अहम हैं, और उन्होंने अपनी कोर टीम से राय लेकर इन योजनाओं को तैयार किया।’ हालांकि, सभी लोग नहीं मानते कि ये नकद हस्तांतरण डॉ. मित्रा के सुझाए फॉर्मूले के अनुसार दिए जा रहे हैं। माकपा की पूर्व पार्षद नियति दासगुप्ता इन योजनाओं की वजह से कम उम्र में होने वाली शादियों को बढ़ावा मिलने पर चिंता जताती हैं।

राजनीतिक विश्लेषक सुजीत चटर्जी का मानना ​​है कि जहां बीजेपी ज्यादा पैसे के वादे के साथ शहरी और युवा महिलाओं के एक तबके में पैठ बना सकती है, वहीं ग्रामीण इलाकों की ज्यादातर महिलाएं ममता के प्रति वफादार रहेंगी।

बीजेपी के सामने विश्वसनीयता का भी संकट है और यह हाल ही में तब साफ दिखा जब एक युवा ने ई-रिक्शा से प्रचार कर रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं पर झूठे वादे फैलाने का आरोप लगाया और बीजेपी की उस दिल्ली योजना को लागू करने में नाकामी का जिक्र किया, जिसमें महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये देने का वादा किया गया था। उसने कहा, ‘आप लोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं?’

मतदाताओं के रुझान को हटाकर बात करें तो तमाम राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि इस चुनाव का नतीजा एसआईआर प्रक्रिया, विवादों के निपटारे के लिए तय की गई असंभव समय-सीमाओं और अंतिम मतदाता सूची में कितने लोगों को जगह मिलती है, जैसी बातों पर निर्भर करेगा।