1942 में अंग्रेज़ी शासन ने जिस तरह किया था भारतीयों का दमन, मोदी सरकार अपना रही है वैसे ही तरीके
सीईसी के इस्तीफ़े और SIR रद्द करने की मांग पर हो रहे प्रोटेस्ट को लेकर केंद्र सरकार ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में लगभग लॉकडाउन जैसे हालात बना दिए हैं। ये तरीके बिलकुल वैसे ही हैं जैसे 1942 में ब्रिटिश सरकार ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' को कुचलने के लिए अपनाए थे।

‘हज़ारों प्रदर्शनकारियों को नज़रबंद कर दिया गया है; मेट्रो और ट्रेनें रद्द की जा रही हैं; पुलिस हर जगह हमारी तलाश कर रही है। यह खुलेआम इमरजेंसी जैसे हालात हैं; लेकिन जैसे नेताओं की गिरफ़्तारी से 'भारत छोड़ो आंदोलन' नहीं रुका था, वैसे ही यह आंदोलन भी नहीं रुकेगा। अगर कल हमें गिरफ़्तार कर लिया जाता है, तो आपको ही इसकी कमान संभालनी होगी। आप जहां भी हिरासत में लिए जाएं—चाहे रेलवे स्टेशन पर हों या ट्रेन में—वहीं बैठ जाएं। अपनी मांगें दोहराएं। एसआईआर को वापस लिया जाए। ज्ञानेश कुमार को हटना होगा। सरकार को जवाबदेह बनाना होगा। अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं है। यह लड़ाई 'हम जनता बनाम बीजेपी' की है।’
आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने शुक्रवार दोपहर (9 अक्टूबर 2026) को एक वीडियो बयान में यही संदेश जारी किया।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दिल्ली और उसके आस-पास की प्रिंटिंग प्रेस पुलिस के दबाव में पोस्टर और प्रचार सामग्री छापने से इनकार कर रही हैं, वहीं यह याद दिलाना ज़रूरी है कि 1942 में दमनकारी ब्रिटिश सरकार ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' (अगस्त 1942) को कुचलने के लिए क्या किया था। यह इतिहास की सबसे कठोर दमनकारी कार्रवाइयों में से एक थी। इसका मकसद आंदोलन को शुरु होने से पहले खत्म कर देना था, ताकि वह एक संगठित राष्ट्रव्यापी विद्रोह का रूप न ले पाए।
अंग्रेज सरकार ने क्या-क्या था उस समय:
बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां और नज़रबंदी: 8 अगस्त 1942 को 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पास होने के कुछ ही घंटों के भीतर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं—जिनमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद और अन्य नेता शामिल थे—उन सभी को बिना किसी मुक़दमे के गिरफ़्तार कर लिया गया। युद्ध के समय लागू आपातकालीन नियमों के तहत हज़ारों कार्यकर्ताओं, छात्रों, मज़दूरों और स्थानीय नेताओं को जेल में डाल दिया गया। सबसे कम अनुमानों के अनुसार भी, 1943 के अंत तक लगभग 60,000 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका था।
सेंसरशिप और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन: अखबारों पर कड़ी सेंसरशिप लगाई गई। बयानों, भाषणों और विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्ट छापने पर रोक लगा दी गई। आपातकालीन शक्तियों के तहत सार्वजनिक सभाओं, प्रदर्शनों और राजनीतिक जमावड़ों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
युद्ध के समय के असाधारण कानूनों का इस्तेमाल: अधिकारियों ने आम कानूनी सुरक्षा उपायों के बिना लोगों को हिरासत में लेने के लिए 'डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स' और विशेष अध्यादेशों का बड़े पैमाने पर सहारा लिया। संदिग्ध समर्थकों की तलाशी लेने, उन्हें गिरफ्तार करने और सज़ा देने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेटों और पुलिस को विशेष अधिकार दिए गए।
पुलिस और सेना: पुलिस ने बड़े पैमाने पर लाठीचार्ज किया, भीड़ पर गोलियां चलाईं और लोगों की बुरी तरह पिटाई की। ऐसे कई ज़िलों में सेना तैनात की गई, जहां प्रदर्शनकारियों ने रेलवे, टेलीग्राफ़ लाइनों और सरकारी दफ़्तरों को निशाना बनाया था।
सामूहिक जुर्माना: जिन गांवों, कस्बों और इलाकों पर आंदोलन का समर्थन करने का शक था, उन पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया। सामूहिक जुर्माना अध्यादेश ने अधिकारियों को यह अधिकार दिया कि वे किसी व्यक्ति विशेष के अपराध की परवाह किए बिना पूरे समुदाय पर आर्थिक जुर्माना लगा सकें।
कोड़े मारना और शारीरिक सज़ा: कई इलाकों में लोगों को कोड़े मारे गए, पीटा गया और दूसरी तरह की शारीरिक सज़ाएं दी गईं।
संपत्ति ज़ब्त करना और सज़ा के तौर पर छापे मारना: कार्यकर्ताओं के घरों की तलाशी ली गई और कई बार उन्हें ज़ब्त कर लिया गया। अधिकारियों ने उन इलाकों में सज़ा के तौर पर भारी जुर्माना लगाया और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, जिन्हें विरोध का केंद्र माना जाता था।
भूमिगत नेटवर्क को दबाना: गुप्त प्रेस, भूमिगत रेडियो स्टेशन और गुप्त संगठनों को खोजकर खत्म किया गया।
खुफिया और पुलिस एजेंसियों ने नेताओं का लगातार पीछा किया।
सैन्य कार्रवाई और हवाई हमले: कुछ इलाकों में, खासकर बिहार में, सरकार ने भीड़ और संदिग्ध विद्रोहियों के ठिकानों की टोह लेने और उन पर हमले करने के लिए रॉयल एयर फ़ोर्स के विमानों का इस्तेमाल किया। बिहार में दमनकारी कार्रवाई में गोलीबारी, गिरफ्तारियां, सामूहिक जुर्माना और हवाई हमले शामिल थे।
कर्फ़्यू और आवाजाही पर पाबंदियां: अशांत जिलों में कर्फ़्यू लगा दिए गए। गांवों और कस्बों में कड़ी निगरानी रखी गई, चेकपॉइंट बनाए गए और यात्रा व लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदियां लगाई गईं।
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