पश्चिम बंगाल के 'विचाराधीन' वोटरों का किस्सा
प्रधानमंत्री मोदी आज (शनिवार को) बंगाल में रैली कर रहे हैं। चुनाव होने में अब ज्यादा वक्त नहीं है लेकिन 50 लाख से ज्यादा वोटरों का मामला लंबित है, और प्रक्रिया पूरी होने में 90 दिन से ज्यादा लग सकते हैं। ऐसे में टीएमसी ने अपने तरीके से कमर कस ली है।

दो अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ दो दिवसीय दौरे (9-10 मार्च) पर कोलकाता आए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का न सिर्फ हवाई अड्डे, बल्कि राजारहाट के न्यू टाउन स्थित वेस्टिन होटल जाते समय भी काले झंडों से स्वागत हुआ। यह होटल बिहार मूल के एक मारवाड़ी व्यापारी परिवार का है और इसे कई केन्द्रीय मंत्रियों, बीजेपी नेताओं और मुख्यमंत्रियों का स्नेह और संरक्षण हासिल है।
टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने सवाल उठाया कि शहर में पांच हजार से ज्यादा होटल होने के बावजूद, क्या इसे महज संयोग माना जाए कि चुनाव आयुक्तों ने ठहरने के लिए यही होटल चुना? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी चुनाव आयोग पर गड़बड़ी पैदा करने का आरोप लगाया और अंतिम मतदाता सूची के खिलाफ धरना देने की धमकी दी, जिसमें 60 लाख से अधिक मतदाताओं को ‘विचाराधीन’ दर्ज किया गया है।
जुबानी जंग तब भयावह मोड़ लेती दिखी, जब आयोग की पूर्ण पीठ के साथ बैठक में आमंत्रित जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को राजनीतिक आकाओं को जानकारी देने के लिए राज्य सचिवालय नबन्ना में तलब किया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त को यह नागवार गुजरा और उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दे डाली कि यह सब बर्दाश्त नहीं है और रवैया न बदला तो मई में होने वाले चुनाव के बाद उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री ने भी पलटवार करते हुए सवाल दागा: क्या मई के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने रहेंगे?
राज्य विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को पूरा हो रहा है और चुनाव उससे पहले संपन्न होने हैं। बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस सहित ज्यादातर राजनीतिक दलों ने विधानसभा के 294 सदस्यों के चुनाव के लिए एक या दो चरणों में मतदान का आह्वान किया है। हालांकि पांच साल पहले यहां मतदान आठ चरणों में हुआ था।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), तार्किक विसंगतियों और माइक्रो पर्यवेक्षकों को लेकर चल रहा गतिरोध सुप्रीम कोर्ट के 10 मार्च के उस निर्देश से अस्थायी रूप से स्थगित हो गया, जिसमें ‘विचाराधीन’ के तौर पर चिह्नित लोगों की स्थिति का समाधान करने के लिए अपीलीय न्यायाधिकरणों के गठन का निर्देश दिया गया था। धरना समाप्त करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, “रास्ता कुछ हद तक खुल गया है।”
पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के न्यायिक अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के बाद उनके दावों का सत्यापन करने में भले ही लगे हों, फिलहाल तो ‘विचाराधीन’ 60 लाख मतदाताओं का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।
ज्ञानेश कुमार ने भी यह घोषणा तो की कि 10 मार्च तक न्यायिक अधिकारियों द्वारा निर्धारित सूची से 10.6 लाख नाम ‘क्लीयर’ किए जा चुके थे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या वे सब मतदान भी कर पाएंगे। इसके साथ ही 50 लाख और मतदाताओं की स्वीकृति मिलना बाकी है। हालांकि यह आंकड़े 1.67 करोड़ सुनवाइयों से प्राप्त हुए हैं, जिनमें 1.36 करोड़ ‘तार्किक विसंगतियां’ और 31 लाख मतदाता शामिल हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं है। हालांकि, इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि उनमें से कितने अब अपना वोट डालने के पात्र हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, “बंगाल की न्यायिक रूप से स्वीकृत मतदाता सूची से न्यायपालिका द्वारा मंजूरी प्राप्त कोई भी व्यक्ति अंतिम मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा।” उन्होंने आगे कहा कि जिन मतदाताओं को अब भी कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, वे भारतीय नागरिकता के प्रमाण के साथ फॉर्म 6 जमा करके अपना नाम दर्ज करा सकते हैं। हालांकि, अपीलीय न्यायाधिकरणों के बारे में अनिश्चितताएं अब भी बरकरार हैं कि उन्हें कैसे स्थापित किया जाएगा, वे किन प्रक्रियाओं का पालन करेंगे और यह भी कि क्या चुनाव से पहले सभी अपीलों का निपटारा संभव है।
हालांकि मुख्य चुनाव आयोग की मीडिया ब्रीफिंग में बार-बार पूछे गए दो सवालों का कोई जवाब नहीं मिला:
कि एसआईआर के दौरान राज्य में कितने बांग्लादेशी, घुसपैठिये और रोहिंग्या पकड़ में आए?
कि जिन मतदाताओं ने पहले ही जनगणना प्रपत्र भर दिए थे और आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत कर दिए थे, जिनकी शारीरिक रूप से पुष्टि हो चुकी थी, जो गलतफहमियां दूर करने के लिए सुनवाई में उपस्थित हुए थे और जिनका नाम 2002 की मतदाता सूची से मेल खाता पाया गया था, वे अब भी ‘विचाराधीन’ क्यों थे?
जवाब में ज्ञानेश कुमार बस मुस्कुराकर रह गए।
तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच नापाक सांठगांठ का आरोप लगाती रही है। पार्टी का दावा है कि एसआईआर प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण है और तृणमूल समर्थक मतदाताओं (अर्थात मुस्लिम और पिछड़े समुदायों) को हटाने का लाभ भाजपा को मिलेगा।
टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा, “बीजेपी को बंगाल में लोगों का मताधिकार छीनने, उन्हें वंचित करने में आनंद मिलता है।” सीपीएम फर्जी मतदाताओं को हटाने के पक्ष में है, लेकिन आयोग की शक्तियों के दुरुपयोग की विरोधी है। राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने स्पष्ट किया, “हम एसआईआर के खिलाफ नहीं है, बल्कि किसी भी समुदाय के वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए इस प्रक्रिया के दुरुपयोग के खिलाफ हैं।” कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने “छोटी-मोटी गड़बड़ियों” को आधार बनाकर लोगों को मतदान प्रक्रिया से बाहर करने पर चिंता जताई।
मालदा जिला एवं सत्र न्यायालय के अधिवक्ता अनवारुल हक ने पुष्टि की कि जिला उप-पंजीयक कार्यालय ने अंतिम मतदाता सूची में ‘विचाराधीन’ व्यक्तियों से संबंधित संपत्तियों का पंजीकरण एकतरफा रोक दिया है, जबकि जिलाधिकारी ने ऐसे किसी निर्देश से इनकार किया। मालदा कस्बे के उत्तरी सनी पार्क निवासी एस.के. असिरुद्दीन ने बताया कि उनकी जमीन की बिक्री इस आधार पर रोक दी गई क्योंकि खरीदार का नाम ‘विचाराधीन’ सूची में था।
यह घटना उन 60 लाख मतदाताओं की संभावित मुश्किलों का अंदाजा लगाने को पर्याप्त है, जिनकी सूची इसी तरह बनाई गई है। अफवाहों पर ध्यान दें तो चुनाव आयोग द्वारा मताधिकार से वंचित किए गए लोगों के बैंक खाते फ्रीज किए जा सकते हैं, उन्हें मोबाइल फोन रखने, लेन-देन करने या संपत्ति पंजीकरण से रोका जा सकता है। इन आशंकाओं के आलोक में पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से रिपोर्ट की गई प्राकृतिक कारणों (जैसे उच्च रक्तचाप) से हुई मौतों की संख्या और अवसाद और आत्महत्या के बढ़ते मामलों की व्याख्या भी हो रही है।
कोलकाता के बीएलओ अभिजीत भट्टाचार्य कहते हैं- “मेरे पास लोगों के फोन आ रहे हैं, जो पूछते हैं कि अंतिम सूची में उनका नाम क्यों नहीं हैं। कुछ रोते हैं; कुछ तो पहली पूरक सूची में अपना नाम शामिल करवाने के लिए कीमत तक चुकाने को तैयार हैं।” भट्टाचार्य का कहना है कि इनमें अधिकांश असली हैं, लेकिन उन्हें ‘तार्किक विसंगति’ या ‘गलत मैपिंग’ के कारण चिह्नित कर दिया गया है, जिसके लिए आमतौर पर आयोग के अपने ऐप्स, उसका एल्गोरिदम या कर्मचारियों की गलतियां जिम्मेदार हैं।
एक अन्य बीएलओ, बसुदेब मंडल उम्मीद जताते हैं कि लंबित मामलों में से अधिकांश नाम आखिरकार पूरक सूचियों में शामिल हो जाएंगे, क्योंकि वे वास्तविक लोग हैं। उन्होंने कहा, “समय कम होने से अधिकारी प्रस्तुत सभी दस्तावेजों का सत्यापन नहीं कर सके, इसलिए बड़ी संख्या में नाम इस सूची दर्ज हैं।”
टीएमसी के सामने बड़ी चुनौती है कि ‘लंबित’ सूची से ज्यादा से ज्यादा नाम ‘नियमित’ सूची में कैसे शामिल कराए जा सकें। दूसरी ओर, प्रक्रिया में देरी या कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर लंबित सूची को लंबा खींचना भाजपा के लिए फायदेमंद है। मालदा के भाजपा नेता बिस्वजीत रॉय कहते हैं- “उन्होंने उचित दस्तावेज दाखिल नहीं किए हैं, इसलिए उनके नाम सूची से हटा दिए गए हैं।”
चुनाव आयोग के एक सूत्र के अनुसार, लोगों का जनसांख्यिकीय ब्योरा और उपलब्ध न्यायाधीशों की संख्या के आधार पर न्यायिक अधिकारियों को निर्णय संबंधी कागजात सौंपे गए हैं। “कुछ न्यायाधीशों को 2,000 मामले आवंटित हैं, जबकि अन्य के पास 7,000 मामले हैं। वे तार्किक विसंगति जांच रहे हैं और अंतिम सूची में दिए गए ब्योरे का मिलान प्रस्तुत दस्तावेजों से कर रहे हैं।”
प्रक्रिया में शामिल एक न्यायिक अधिकारी का कहना है कि बंगाल के 600 और अन्य राज्यों के 150 न्यायाधीशों के साथ, इस प्रक्रिया को पूरा करने में 90 दिन से अधिक का समय लगेगा। “इसलिए, इस बात की संभावना ज्यादा है कि लंबित सूची में शामिल अनेक लोग, भले ही वे वास्तविक मतदाता हों, आगामी विधानसभा चुनाव में अपना वोट देने का मौका खो सकते हैं।”
इसबीच तृणमूल कांग्रेस ने अपने विशाल सांगठनिक तंत्र का इस्तेमाल करते हुए जमीनी स्तर पर अपना एसआईआर अभियान शुरू किया है। प्रकाशित ‘अंतिम’ सूची के साथ, पार्टी कार्यकर्ता घर-घर जाकर देख रहे हैं कि मौजूद निवासी, सूची में उल्लिखित नामों से मेल खाते हैं या नहीं। यही संगठनात्मक शक्ति अंततः मतदान के दिन निर्णायक साबित होगी।
इस मामले में, बंगाल में टीएमसी भाजपा से काफी आगे नजर आ रही है।
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