राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बस नाम का है, ड्राइविंग सीट पर खुद बैठे हैं पीएम मोदी

दोबारा प्रधानमंत्री बनने पर मई 2019 में नरेंद्र मोदी ने अपने सबसे विश्वस्त नौकरशाह नृपेंद्र मिश्रा को हटा दिया था। मोदी के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव के तौर पर नृपेंद्र मिश्रा मोदी की हर घोषणा और योजना का पूरी तरह अनुपालन सुनिश्चित करते थे।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार मयंक

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट का गठन जिस तरह किया गया है, उससे ही समझा जा सकता है कि इसकी कमान परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद संभाल रखी है।

मई 2019 में दोबारा प्रधानमंत्री बनने पर मोदी ने अपने सबसे विश्वस्त नौकरशाह नृपेंद्र मिश्रा को हटा दिया। मोदी के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव के तौर पर नृपेंद्र मिश्रा मोदी की हर घोषणा और योजना का पूरी तरह अनुपालन सुनिश्चित करते थे। इसीलिए अगस्त में उन्हें हटाए जाने पर लोगों को आश्चर्य भी हुआ। फरवरी के दूसरे सप्ताह में मोदी ने मिश्रा को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया, तब समझ में आया कि मोदी के मन में क्या था। साफ है कि अपने सबसे विश्वस्त नौकरशाह को मंदिर निर्माण का जिम्मा देकर मोदी इस अहम मुद्दे को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं।

आखिर कौन हैं नृपेंद्र मिश्रा

नृपेंद्र मिश्रा पर ही उज्ज्वला योजना से लेकर घर-घर शौचालय बनाने की योजना तक के अनुपालन की जिम्मेदारी थी। मिश्रा उत्तर प्रदेश के दो-दो मुख्यमंत्रियों के भी प्रमुख सचिव रह चुके हैं। वह 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव थे। मिश्रा के करीबी दावा करते हैं कि मुलायम ने जब कारसेवकों पर गोलीबारी का आदेश दिया, तो मिश्रा ने उसका विरोध किया और तब से ही वह बीजेपी नेताओं की आंखों के तारा बन गए।

उसके बाद 1991 में बीजेपी की सरकार आने पर मुख्यमंत्री बने कल्याण सिंह ने भी मिश्रा को ही अपना प्रमुख सचिव बनाया। उस दौरान राम मंदिर के लिए बार-बार चले विहिप आंदोलन के मद्देनजर सरकार और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाने का नाजुक काम उन्होंने ही संभाला।

राम मंदिर निर्माण का खेल

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट बनाने का जिम्मा सरकार पर छोड़कर मोदी का काम आसान कर दिया था। ट्रस्ट पंद्रह सदस्यों की बननी थी, पर सरकार ने सिर्फ तेरह सदस्य नियुक्त किए। इनमें से अधिकतर राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े विश्व हिंदू परिषद कार्यकर्ता या साधु-संत थे। बाकी दो जगह ट्रस्ट के सदस्यों की पहली बैठक में आपसी सहमति से भरी जानी थी।

यह युक्ति जरूरी थी क्योंकि जिन दो लोगों- विशेष उपाध्यक्ष चंपत राय और राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्य गोपालदास को पहली बैठक में चुना गया, वे बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले में आरोपी हैं। प्रधानमंत्री अपनी कलम से किसी आपराधिक मामले के आरोपी को मंदिर निर्माण के लिए बन रहे ट्रस्ट में नियुक्त नहीं करना चाहते थे, इसीलिए दो जगह भरने का काम ट्रस्ट के पहले 13 सदस्यों पर छोड़ दिया गया। इससे सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।

ध्यान देने योग्य तीसरी बात

नवनियुक्त ट्रस्ट के सदस्य अयोध्या जाने के बजाय सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी से मिलने गए। उन्होंने मोदी को चुनरी प्रसाद भेंट किया तो मोदी ने भी उन्हें अंग वस्त्र देते हुए सम्मानित किया। इस दौरान ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्य गोपालदास और सचिव चंपत राय ने प्रधानमंत्री को मंदिर के शिलान्यास समारोह में आमंत्रित भी किया।

मंदिर की राजनीति किस तरह हो रही थी और हो रही है, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। तत्कालीन वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले की काट के लिए ही बीजेपी नेतृत्व ने ओबीसी नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री-पद का उम्मीदवार बनाया था। मंदिर निर्माण आंदोलन में भी विनय कटियार, उमा भारती और साक्षी महाराज जैसे पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे रखा गया। आज राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण भी एक और पिछड़े वर्ग के नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किया जा रहा है।

आगे की योजना क्या

जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मंडल कमीशन की काट बीजेपी में पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को उभार कर की, उसी तर्ज पर यह भी संभव है कि इस बार मंदिर का मुख्य पुजारी किसी दलित को बनाया जाए। उनका तर्क है कि रामायण भी आखिर दलित संत वाल्मीकि ने लिखा था, इसलिए एक दलित व्यक्ति को राम मंदिर का पुजारी बनाए जाने से संघ और बीजेपी अतिपिछड़े और अतिदलितों के बीच एक अच्छा राजनीतिक और सामाजिक संदेश भेजने में सफल होंगे।

वैसे भी पिछले कुछ चुनावों में गैर-यादव पिछड़े और गैर-चमार दलितों के एक बड़े वर्ग का समर्थन बीजेपी को मिलता रहा है। साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सफलता के पीछे यही कारण प्रमुख माना जाता है।

राम मंदिर ट्रस्ट का गठन कोई बहुत आसान प्रक्रिया नहीं रही है। अदालत के आदेश पर सरकार को ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को प्रतिनिधित्व देना जरूरी था। अखाड़ा चाहता था कि 15 में से पांच सदस्य उसके हों और ट्रस्ट की नियमावली में स्पष्ट तौर पर लिखा जाए कि मंदिर निर्माण के बाद वहां पूजा-पाठ का अधिकार अखाड़े के प्रतिनिधियों को ही मिलेगा, लेकिन सरकार ने निर्मोही अखाड़े के सिर्फ एक व्यक्ति को ही ट्रस्ट में रखा।

इसी तरह ट्रस्ट ने विश्व हिंदू परिषद द्वारा 1989 में तैयार किए गए राम मंदिर की डिजाइन को तो स्वीकार किया लेकिन वह इसे दो के बजाय तीन मंजिल का बनाना चाहता था। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय नाराज होकर बोले, “जो लोग भी मंदिर की मूल डिजाइन में परिवर्तन करना चाहते हैं, वे दरअसल मंदिर का निर्माण ही नहीं चाहते। डिजाइन बदलने के साथ ही बहुत-सी चीजें बदली जाएंगी। उसकी नींव ज्यादा गहरी करनी होगी। देखना पड़ेगा कि वहां की भूमि इतना अधिक भार सह सकती है या नहीं। उसके लिए एक बरसात का इंतजार करना होगा। देश अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। वैसे भी हमारे पास पिछले 26 वर्षों के दौरान तराशे गए पत्थर मौजूद हैं। इनसे मंदिर की नींव और ग्राउंड फ्लोर तैयार हो सकता है।”

विहिप के मॉडल में मंदिर में 424 नक्काशीदार स्तंभ होंगे जिनमें से हर एक की ऊंचाई 16 फीट होगी। राम मंदिर के अलावा इस कांप्लेक्स में सीता रसोई, धर्मशाला, भजन के लिए स्थान, गर्भगृह, और एक सिंह द्वार होगा, जिसपर शेर और हाथी उकेरे जाएंगे। मंदिर निर्माण के दौरान रामलला की मूर्ति को पास ही में एक फाइबर के मंदिर में रखा जाएगा।

राम मंदिर का पूरा राजनीतिक लाभ उठाने के लिए मोदी इसे विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र बनाना चाहते हैं। जहां मक्का 90 एकड़ में बना है और वेटिकन सिटी 110 एकड़ में, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र 111 एकड़ में फैला होगा। फिलहाल ट्रस्ट के पास सिर्फ 70 एकड़ जमीन है। पास ही स्थित श्री अरबिंदो आश्रम अपनी 3 एकड़ जमीन ट्रस्ट को देने को राजी है। शेष भूमि सरकार को अधिग्रहित करनी होगी।

फिलहाल मंदिर के शिलान्यास के लिए 4 तारीखों पर विचार हो रहा है। 25 मार्च चैत्र प्रतिपदा यानी हिंदू नववर्ष का प्रारंभ है। जबकि 2 अप्रैल को रामनवमी पड़ रही है। 4 अप्रैल एकादशी तो 8 अप्रैल राम भक्त हनुमान का जन्मदिवस होगा। इस पूरी प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री कार्यालय की पैनी नजर है, क्योंकि यह 2024 में बीजेपी के चुनावी अस्त्रों में से एक होगा।

लेकिन मोदी जी को यह भी याद रखना होगा कि 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बीजेपी शासित जिन चार राज्यों- यूपी, एमपी, हिमाचल और राजस्थान- की सरकारों को बर्खास्त किया गया था, उनमें से पार्टी किसी भी राज्य में बहुमत जुटा पाने में असफल रही थी। केवल राजस्थान में ही भैरों सिंह शेखावत जोड़-तोड़ की सरकार बना पाए थे। ऐसे में जब मोदी सरकार न तो अर्थव्यवस्था संभाल पा रही है और ना ही लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करा पा रही है, मंदिर निर्माण उसकी नैया पार लगाने में कितना सफल होगा यह तो सिर्फ रामलला ही जानते होंगे। आखिर भावनाओं से पेट नहीं भरता।

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