सत्ता की निरंकुशता से दो-दो हाथ करने वाला लोकतंत्र के लिए दमदार संघर्ष का साल रहा 2021

साल 2021 कई मायनों में एतिहासिक साल रहा। इस साल को भारत में सत्ता की निरंकुशता के खिलाफ और लोकतंत्र के लिए दमदार संघर्ष के तौर पर याद रखा जाएगा। वहीं भगवान राम के बाद शिव की शरण में पहुंची सत्ता की तस्वीरें भी याद रहेंगी।

 फोटो : सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

लोकतंत्र के लिए दमदार संघर्ष

2021 को जिस एक बात के लिए जरूर ही याद किया जाएगा, वह है किसान आंदोलन। पिछले साल बने तीन कृषि-व्यापार कानूनों के खिलाफ 30 नवंबर, 2020 को किसानों ने दिल्ली की हरियाणा-पंजाब तथा यूपी सीमाओं पर धरना शुरू किया। उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन तक का इस्तेमाल किया लेकिन किसान जम गए और जमे रहे। इसमें संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले 500 किसान यूनियनें शामिल रहीं। 26 जनवरी, 2021 को गणतंत्र दिवस परेड के बाद किसानों ने दिल्ली में मार्च आरंभ किया, तो कुछ तत्वों ने लाल किले पर केसरिया निशान साहिब लगा दिया जो सभी गुरुद्वारों में लगा रहता है। इसे कुछ लोगों ने खालिस्तानी झंडा बताकर विरोध शुरू कर दिया। एकबारगी तो लगा कि अब आंदोलन वापस लेना पड़ेगा। लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत समेत विभिन्न किसान नेताओं ने बहुत समझदारी के साथ इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। अंततः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन कानूनों को यह कहते हुए वापस लेने की घोषणा की कि सरकार किसानों को अपनी बातों को लेकर विश्वास दिलाने में सफल नहीं रही। और इस तरह यह आंदोलन वापस हो गया।

सत्ता की निरंकुशता से दो-दो हाथ करने वाला लोकतंत्र के लिए दमदार संघर्ष का साल रहा 2021

जय-जय शिव शंभो...

कृषि-व्यापार कानूनों को वापस लेने का ऐलान मोदी ने अचानक किया और इसका रहस्य लोगों की समझ में तुरंत नहीं आया। इसे पांच राज्यों, खास तौर से यूपी और पंजाब में होने वाले वि धानसभा चुनावों से जोड़कर देखा गया। कारण चाहे जो भी हों, मोदी ने वाराणसी में 13-14 दिसंबर को विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए जिस तरह हिन्दुत्ववादी शक्ति-गौरव प्रदर्शन किया, उससे यह तो साफ हो गया कि बीजेपी इन चुनावों में सांप्रदायिक कार्ड ठीक तरीके से खेलने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। गंगा स्नान से लेकर काशी में मंदिर जाने के रास्ते के घरों, मस्जिद तक को गेरुआ रंग मे रंग दिया गया। इस एकरंगे अभियान का विरोध भी हुआ और अंततः मस्जिद की सफेदी करा दी गई। जो रंग फिलहाल दिख रहे हैं, वे यही बता रहे हैं कि इन चुनावों में भी बीजेपी हिन्दू-मुसलमान विभाजन पत्ते का ही इस्तेमाल करेगी। मोदी का 15 फरवरी को उज्जैन में महाकाल मंदिर के विकास कार्यों के उद्घाटन का कार्यक्रम बन रहा है। उसे भी ‘शिवमय’ करने की योजना है और उस वक्त पांच राज्यों का चुनावी अभियान लगभग बिल्कुल अंतिम चरण में होगा। मतलब, इस बार ‘राम’ के साथ ‘शिव’ को भी आगे रखकर बीजेपी चुनावी वैतरणी पार करने के प्रयास में है।


बढ़ते ही गए नाखून

कृषि-व्यापार कानून को वापस लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इमेज थोड़ी ठीक करने की कोशिश भले ही की, सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में देने, विकास के नाम पर पर्यावरण मापदंडों को किनारे किए रखने, बीजेपी और सरकार के प्रति जरा भी असहमति प्रकट करने वालों पर टूट पड़ने का सिलसिला देशभर में जारी रहा। यही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार चाबुक पटकने के बावजूद सभी संवैधानिक संस्थाओं की धार को भोथरा करते जाने का सिलसिला अबाध गति से जारी रहा। साल के लगभग अंत में निर्वाचन आयोग के सभी सदस्यों के साथ पीएमओ में की गई बैठक ने दिखा दिया कि इस सरकार की मंशा क्या है। आरटीआई को इतना कजमोर कर दिया है कि कोई भी सवाल पूछो, तो सीधी जानकारी देनेकी जगह इतना घुमा-फिरा दि या जाता है कि महीनों बाद आधी-अधूरी कुछ सूचना मिले भी, तो उससे आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। इस सरकार की विशेषता यही है कि कोई विश्वसनीय आंकड़ा कभी सामने नहीं आता और अगर कोई रिसर्च या विदेशी संगठन कड़ी मेहनत के बाद कोई आंकड़ा लाए भी, तो खंडन तैयार रहता है। जहां सरकार डेटा या सालाना स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के ब्योरों को जारी करने से विरक्त रही, वहीं एएसईआर, एनएफएचएस, रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स -जैसी जानी-मानी एनजीओ संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों तथा श्रम विभाग ने शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया और रोजगार पर आकलन एवं महत्वपूर्ण शोध की रपटें जारी कीं। उनके अनुसार, महिलाओं में बेरोजगारी बढ़ी है, खासकर गांवों में, प्राइमरी शिक्षा में गरीब और पिछड़े इलाकों के बच्चे दुष्प्रभावित हुए हैं और उनमें मिड-डे मील बंद होने से कुपोषण तथा महिलाओं में अनीमिया बढ़े हैं। क्राइम ब्यूरो के आंकड़े भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी दिखा रहे हैं।

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साथ ही महिलाओं को एक बड़ा वोटबैंक भी माना जाने लगा है जिनकी बंगाल चुनावों में अहम भूमिका रही। अमेरिका में कमला हैरिस सहित राजनीति और कई बड़े ओहदों पर कंपनियों में गीता गोपीनाथ सरीखी भारतीय मूल की महिलाओं का आगमन हुआ है। दूसरी ओर पेगासस ने तो हालत यह कर दी है कि कोई, यहां तक कि मंत्री-नेता-अधिकारी तक नहीं कह सकता कि उसकी बातें नहीं सुनी जा रहीं। लगता है, हर आदमी के पीछे कोई-न-कोई जासूस लगा हुआ है। यूएपीए और इसी तरह के अन्य कानूनों का इस तरह उपयोग हो रहा है, मानो सरकार की किसी भी बात पर किसी भी तरह की असहमति जताने वाला देशद्रोही ही है। पहले के सारे नेताओं ने सब काम गलत ही किए या किसी ने कुछ किया ही नहीं और जो कुछ भी हो रहा है, वह सिर्फ 2014 के बाद ही।

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करेला, ऊपर से नीम चढ़ा

हालात ऐसे हों तब रचनात्मकता पर भी तलवार का लटकना स्वाभाविक ही है। वाशिंगटन के जॉन एफ केनेडी सेंटर में ‘आई कम फ्रॉम टू इंडियाज’ कविता प्रस्तुत करने वाले वीर दास का हश्र हम देख ही रहे हैं, दूसरे स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा, मुनव्वर फारूकी आदि के शोज भी इस या उस कारण से रद्द कर दिए गए। मुनव्वर को तो जेल की हवा भी फांकनी पड़ी। तब भी कुछ चीजों ने भरोसा दिलाया।

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हमेशा स्टार के कंधे पर सवार रहने वाले हिन्दी सिनेमा का ‘स्टारडम वाला मिथ’ टूटा और अभिनय सर चढ़कर बोला। नए तरह का कथ्य पसंद किया गया। यह सब किया ओटीटी प्लेटफार्म ने जिसे लॉकडाउन के दौरान अपार सफलता मिली। ‘बंदिश बैंडिट’ जैसे नाम से पूरी तरह अगंभीर दिखती फिल्म/सीरीज ने, शास्त्रीय संगीत की क्लासिकल जमीन के बावजूद नए सितारे पैदा कर दिए। ऐसा कई फिल्मों और सीरीज में हुआ। यह राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना जैसे अ-चाकलेटी चेहरों के अलग जमीन की फिल्मों के चयन और अद्भुत अभिनय क्षमता के कारण भी हुआ। इसी दौर में तापसी पन्नू जैसी अभिनेत्री पहले थप्पड़, फिर रश्मि रॉकेट और फिर, आने वाली ‘लूप लपेटा’ से स्त्री चरित्र की एक नयी परिभाषा गढ़ती दिखीं। स्वरा भास्कर (शीर कोरमा) में लीक तोड़ती है तो वेब सीरीज के तौर पर आई ‘शी’, ‘फैमिली मैन’ और ‘अरण्यक’ बिलकुल नया स्वाद परोसकर लोकप्रिय हो जाते हैं।

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सुष्मिता सेन की आर्या-2, रवीना टंडन की ‘अरण्यक’ और तापसी पन्नू की ‘रश्मि रॉकेट’ अपने महिला चरित्रों के कारण भी अलग से रेखांकित हुईं। यह एक नए तरह का स्टारडम है जो अभिनय और कथ्य की वापसी लेकर आया, यानी बेल्ट पकड़कर और तौलिया टांगों के बीच डालकर नाचने के दिन पीछे छूट गए से दिखने लगे। कुछ बड़े बजट की फिल्में जिस तरह ओटीटी पर सफल हुईं, वह बड़े पर्दे के लिए चुनौती भी बना और आम आदमी के लिए फायदे का सौदा भी। ओटीटी की सफलता का एक लाभ यह भी हुआ कि दर्शक कुछ बहुत अच्छी फिल्में/सीरीज घर बैठे देख पाया। फिर भी, कई फिल्म वालों की बोलती बंद कर दी गई। अगर आप राष्ट्रवादी- हिन्दुत्ववादी धारा के नहीं हैं और गैर हिन्दू भी हैं तो करेला और ऊपर से नीम चढ़ा वाला है। फिल्म का मैसेज क्लीयर और लाउड होना जरूरी नहीं है।

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शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को जिस तरह बिना सबूतों के ही एनसीआरबी ने जेल में बंद रखा, उससे साफ है कि सरकार यह मानकर चल रही है कि जो हमारे साथ नहीं, वह और उसका परिवार हमारा दुश्मन है। और खेल? भाई, जब किसी शीर्ष संगठन के शीर्ष पद पर बैठने का क्राइटेरिया सिर्फ यह हो कि आप किस शीर्षस्थ व्यक्ति के सुपुत्र हैं, तो उसमें समय-समय पर विराट खेल दिखाने वाला कोई विराट क्या कर लेगा? और कोई शिकायत लेकर मंच पर चढ़ भी गया, तो उसे थप्पड़ ही खाना होगा क्योंकि सामने वाला दबंग भाजपा एमपी है।


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सब चंगा सी...

शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसका किसी परिचित, मित्र, संगे-संबंधी या रिश्तेदार ने कोरोना महामारी के दौरान इलाज, खास तौर से रेमडेसिविर, ऑक्सीजन के अकाल की वजह से जान नहीं गंवाई हो। मोदी जिस गंगा में डुबकी लगाकर चुनावी वैतरणी पार कर रहे हैं, उसमें सैकड़ों लाशें तैरती दिखी थीं क्योंकि लोगों के पास इतने पैसे, सुविधा नहीं थी कि वे मृतात्माओं का अंतिम संस्कार कर सकें। लेकिन जो चले गए, उनके बारे में कौन सोचता है? यहां तो देश का भविष्य सोचने पर ही प्रतिबंध है!

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