सवाल अभी और भी हैं! सिर्फ ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा ही नहीं है समाधान

अब देश सड़कों पर निकल चुका है। ज्ञानेश कुमार पर सड़कों पर महाभियोग शुरु हो गया है। लेकिन क्या सिर्फ उनका इस्तीफा ही सारी समस्याओं का समाधान है। आखिर कौन से हैं वह सवाल जो आज देश पूछ रहा है।

देश के तमाम हिस्सों में चुनाव आयोग और सीआईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं
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गांधी जयंती, 2 अक्टूबर को देश में एक नए असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई है। ट्रेंड करता हैशटैग #JantarMantarSatyagraha केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं है। यह ऐसा पल है मानो भारतीय एक नए स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद कर रहे हों। जहां दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकारों, सोशल ऐक्टिविस्ट्स, छात्रों और विपक्षी नेताओं समेत 700 से अधिक प्रदर्शनकारियों को दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से हिरासत में लिया गया,वहीं मुंबई के शिवाजी पार्क में भारी पुलिस मौजूदगी के बीच हजारों लोग ‘ज्ञानू उठा ले झोला’ गाते हुए जुटे। यह साफ हो गया कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की शुरुआत सड़कों पर तो हो चुकी है। हम भूल ना जाएं कि यह अभियान सिर्फ़ ज्ञानेश कुमार को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश तक सीमित नहीं, यह उस तंत्र से छुटकारा पाने की शुरुआत है जिसने ‘स्वाधीन’ भारतीयों को अपने ही देश में ग़ुलाम बना दिया है। इस संग्राम में जुटे हमारे 'स्वतंत्रता सेनानियों' के लिए कुछ ‘दिमागी नक्सल’ सवालः

एसआईआर से पहले की बुनियादी वोटर लिस्ट के बजाए हमें 2024 की वोटर लिस्ट पर ही क्यों लौटना चाहिए? 

2024 के लोकसभा चुनावों में इस्तेमाल की गई वोटर लिस्ट देश भर में निर्विवाद और न्यायिक रूप से स्वीकार्य आखिरी सूची बनी हुई है। उसके बाद से, विशेषकर जून 2025 में एसआईआर शुरू होने के बाद से, मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर फेरबदल किए गए हैं। विवादित आंकड़ों और बिना किसी स्पष्टीकरण के नाम जोड़ने और हटाने के गंभीर आरोप तेजी से सामने आए हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा के विधानसभा क्षेत्रों की रिपोर्टें बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की ओर इशारा करती हैं: हजारों की संख्या में दोहरे मतदाता, फर्जी या अमान्य पते, मतदाताओं की अविश्वसनीय उम्र और संदिग्ध रूप से जोड़े गए नए नाम। इन सबके चलते कई जगह मतदाताओं की संख्या में मात्र 6 महीने में इतनी वृद्धि हो गयी जितनी पांच साल में आमतौर पर होती है।

पिछले साल अगस्त, सितंबर और नवंबर में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कर्नाटक, महाराष्ट्र और हरियाणा में खुली हेराफेरी के जरिये मतदाता सूचियों में की गईं विसंगतियों, नामों के जोड़े और काटे जाने के खेल का पर्दाफाश किया था।

मतदाता सूचियां आमतौर पर धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जो जन्म, मृत्यु, प्रवासन और जरूरी सुधारों को दिखाती हैं। पर्याप्त सार्वजनिक सूचना या सुनवाई के बिना नाम जोड़े और काटे जाने में यह अचानक उछाल पारदर्शिता और निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। सबसे अहम बात यह है कि एसआईआर ने स्थापित परंपराओं के उलट पात्रता साबित करने का पूरा जिम्मा नागरिकों पर डाल दिया, जबकि नियम यह रहे हैं कि नाम काटने पर अधिकारी उसका कारण बताए। 

2024 की मतदाता सूचियों की बहाली की मांग इसलिए नहीं है कि वे पूरी तरह सही थीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि वे अंतिम सर्वस्वीकृत पैमाना हैं। वे राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी और मतदाताओं को बदलावों की वैधता की पड़ताल करने और बाद के संशोधनों को जांचने का आधार देती हैं। इस आधारभूत सूची को खारिज करके विवादित एसआईआर के बाद की मतदाता सूचियों को अपनाना चुनावी विश्वसनीयता और जन-विश्वास दोनों के लिए बड़ा खतरा है।


क्यों न निरस्त हो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून?

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023, जिसे सरकार ने दिसंबर में लागू किया था, मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की मूल भावना के बिल्कुल उलट था जिसमें जस्टिस के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने आदेश दिया था कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाया जाना चाहिए।

अंतरिम व्यवस्था के तौर पर शीर्ष अदालत ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता को मिलाकर एक समिति बनाने की सिफारिश की थी। हालांकि, बिना किसी तर्कसंगत कारण के, उसी साल बाद में 2023 का यह अधिनियम पारित कर दिया गया, जिसने प्रधानमंत्री और उनकी पसंद के एक केन्द्रीय मंत्री को इस समिति का हिस्सा बना दिया। इससे नियुक्ति प्रक्रिया की उस प्रक्रिया पर कार्यपालिका का नियंत्रण और मजबूत कर दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट हलका करना चाहता था।

ऐसी व्यवस्था चुनाव आयोग की निष्पक्षता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। स्वतंत्रता में यह सेंध उस धारणा को और हवा देती है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव रखता है। चुनाव आयुक्तों को आपराधिक मुकदमों से आजीवन छूट देने का यह प्रावधान तो जनभावनाओं को और भड़काने वाला है। यह ऐसा अप्रत्याशित विशेषाधिकार है जो जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर सरकार ऐसा क्या मानकर चल रही थी कि वे किस तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होंगे?

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और कार्यपालिका के मनमाने दखल पर अंकुश लगाने के लिए एक नए कानून की सख्त जरूरत है, जिसमें गैर-सत्तारूढ़ विपक्षी दलों की अनिवार्य भागीदारी हो।

एसआईआर प्रक्रिया के बीच में ही ‘ईआरओ-नेट’ कोे ‘ईसीआई-नेट’ से क्यों बदला गया?

‘ईआरओ-नेट’ को मूल रूप से एक ऐसे 'डिसीजन सपोर्ट सिस्टम' के रूप में तैयार किया गया था जो विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) की मदद करता। यह गड़बड़ियों को चिह्नित करने में मदद तो करता था, लेकिन जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मिले वैधानिक अधिकारों के अनुसार अंतिम फैसला ईआरओ के विवेक पर ही छोड़ता था। इसके उलट, ‘ईसीआई-नेट’ एक केन्द्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया है और यह चुनाव आयोग के आईटी विभाग को अंतिम नियंत्रण देता है। यह कदम सत्ताधारी दल के आईटी सेल द्वारा चुनावी डेटा के तालमेल और नियंत्रण के आरोपों के लिए सीधे दरवाजे खोलता है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और दोनों निर्वाचन आयुक्तों-एस एस संधू और विवेक जोशी-ने स्वतंत्र रूप से यह बात उठाई थी कि ईआरओ को ईसीआई-नेट का एक्सेस नहीं दिया जा रहा था और बिना मानवीय दखल के केवल मशीनी एल्गोरिद्म ही ‘तार्किक विसंगतियों’ की पहचान कर रहे थे। इसके बावजूद, चुनाव आयोग ने जनवरी 2026 में ईआरओ-नेट से ईसीआई-नेट पर जबरन माइग्रेशन कर दिया, जबकि एसआईआर प्रक्रिया अभी चल ही रही थी और लाखों वोटर के रिकॉर्ड की जांच हो रही थी।

ईसीआई-नेट को एक तकनीकी अपग्रेड के रूप में पेश किया गया था, जो चुनाव आयोग के 40 से अधिक एप्लीकेशन और सेवाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर साथ लाता है। प्रक्रिया के बीच में तकनीक का यह अप्रत्याशित बदलाव न केवल बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) और ईआरओ जैसे जमीनी स्तर के अधिकारियों के लिए बाधक बना, बल्कि इसने जवाबदेही को भी इंसानों से छीनकर एक केन्द्रीकृत एल्गोरिदम पर डाल दिया। यह बदलाव इस बात का उदाहरण है कि चुनावी तकनीक का इस्तेमाल पारदर्शिता को खत्म करने के औजार के रूप में कैसे किया जा सकता है। गलतियों के लिए ईआरओ और बीएलओ की तो जवाबदेही तय की जा सकती है, लेकिन मतदाता किसी तकनीकी प्लेटफॉर्म को कटघरे में कैसे खड़ा करेंगे?


अगस्त 2025 में उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार को आयोग से क्यों हटाया गया?

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की 22 सितंबर की रिपोर्ट से यह बात सामने आई कि संधू और जोशी ने ईसीआई-नेट, ईआरओ को सिस्टम का एक्सेस न दिए जाने और पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए चुनाव आयोग की ओर से की गई अनधिकृत अपीलों पर लिखित में गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने आईटी प्रभाग की देखरेख कर रहे उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार को- जो प्रतिनियुक्ति पर चुनाव आयोग में तैनात थे- ईसीआई-नेट का स्वतंत्र ऑडिट और समानांतर विभागीय ऑडिट कराने का निर्देश दिया था। कुमार ने महानिदेशक (आईटी) डॉ. सीमा खन्ना को पत्र लिखकर दोनों चुनाव आयुक्तों की चिंताओं से अवगत कराया और ऑडिट कराने की मांग की।

हालांकि, जब कुमार कुछ दिनों की छुट्टी पर थे, उन्हें वापस उनके मूल कैडर में भेज दिया गया और उनका प्रभार वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त संदीप गर्ग को सौंप दिया गया, जिन्होंने तुरंत ही ऑडिट की जरूरत को खारिज कर दिया। बताया जाता है कि इसी घटनाक्रम के बाद दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को औपचारिक शिकायत भेजी थी।

डैमेज कंट्रोल की कवायद में चुनाव आयोग ने बाद में दावा किया कि गर्ग द्वारा जारी आदेशों को कभी लागू नहीं किया गया था, कुमार अपने पद पर वापस आ चुके हैं और आईआईटी दिल्ली के एक प्रोफेसर की विशेषज्ञता वाली समिति ईसीआई-नेट के कामकाज की समीक्षा करेगी।

अनियमितताओं की याचिकाओं के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को हरी झंडी क्यों दी?

कानूनी नजरिये से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूचियों के रखरखाव और पुनरीक्षण के चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार की पुष्टि की, जिसमें गैर-नागरिकों और अपात्र मतदाताओं को हटाने का अधिकार भी शामिल है। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने जहां एसआईआर के त्रुटिपूर्ण क्रियान्वयन पर गंभीर चिंताएं जताई थीं-जिसमें नागरिकों पर ही पात्रता साबित करने का बोझ डालना और बड़े पैमाने पर प्रक्रियागत विसंगतियां शामिल थीं- वहीं अदालत का ध्यान मुख्य रूप से आयोग की शक्तियों की कानूनी वैधता पर ही केन्द्रित रहा, न कि इस पूरी कवायद के निष्पादन या निष्पक्षता पर।

आलोचकों का तर्क है कि किसी प्रक्रिया की वैधानिकता और उसके क्रियान्वयन की वैधानिकता दो अलग-अलग बातें हैं, जिन पर अदालत को गौर करना चाहिए था। इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने इस तथ्य की अनदेखी की कि एसआईआर को देश भर में लागू किया गया, जबकि चुनावी नियम केवल विशेष जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में और पूर्व लिखित स्पष्टीकरण के साथ ही ऐसे ‘विशेष’ पुनरीक्षण की अनुमति देते हैं।

अदालत के इस रुख के पीछे फैसले का वक्त एक वजह हो सकती है, क्योंकि तमाम गड़बड़ियां हाल के दिनों में ही खुलकर सामने आई हैं। बहरहाल, एसआईआर को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं अब भी लंबित हैं, जिससे आगे न्यायिक समीक्षा की उम्मीद अभी बाकी है। 


क्या इन परिस्थितियों में देश संस्थागत समाधानों पर भरोसा कर सकता है?

सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा आज बेहद निचले स्तर पर है। एसआईआर की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं और इसका क्रियान्वयन बेहद संदिग्ध रहा है। इसके बावजूद, बहुत कम लोगों को उम्मीद है कि ये संस्थाएं अपनी गलतियों को स्वीकार करेंगी और सुधार के लिए तैयार होंगी।

ऐसे में राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के सामने इस विकट स्थिति से सीधे दो-दो हाथ करने की कठिन चुनौती है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि एसआईआर से अनुचित रूप से प्रभावित मतदाताओं के पास अब भी अदालतों का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला है। जैसा कि एक प्रमुख सोशल ऐक्टिविस्ट ने कहा- अगर मुख्य चुनाव आयुक्त पर संसद में महाभियोग नहीं चलाया गया, तो जनता सड़कों पर उनका फैसला करेगी।

एक सुझाव यह भी है कि चुनाव आयुक्तों को भले ही कानूनी छूट हासिल हो, लेकिन सीमा खन्ना जैसे प्रशासनिक अधिकारियों को यह सुरक्षा प्राप्त नहीं है। उनके कार्यकाल के दौरान हुए अनुबंधों, सॉफ्टवेयर की तैनाती (ईसीआईनेट की रूपरेखा) और वेंडरों के चयन की स्वतंत्र जांच कराए जाने का पर्याप्त आधार बनता है।

लगातार चलने वाला नागरिक प्रतिरोध और सटीक कानूनी कदम ही अंततः संस्थाओं को अपनी व्यवस्थागत कमियों को सुधारने के लिए मजबूर कर सकते हैं। सवाल यही है कि क्या देश अब इस चुनौती के खिलाफ उठ खड़ा होगा?

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