कोरोना संकट में भी वाट्सएप यूनिवर्सिटी के नफरती अनारों से लहालोट हैं ‘भक्तवत्सल’

सरकार कहती है कि फेक और भड़काऊ मैसेज के खिलाफ वह हरसंभव कदम उठा रही है। फिर भी, इस तरह रोज नए-नए फेक मैसेज किस तरह और क्यों वायरल हो रहे हैं। बात साफ है- फेक बनाओ तो ऐसा जो सत्ताधारी लोगों को लाभ दिलाए, आखिर, समाज में जितना विभाजन होगा, फायदा उतना ही होगा!

फोटोः सोशल मीडिया
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दिवाकर

इधर लाॅकडाउन के दौरान वाट्सएप यूनिवर्सिटी लोगों को धर्म और इतिहास की इतनी जानकारी दे रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपनी परिभाषा में जीवन के सामान्य होने की घोषणा करेंगे, तो उनका न्यू इंडिया बिल्कुल उनके नक्शेकदम पर चलने को तैयार मिलेगा।

जब जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई थी, तब एक-दो दिनों तक इस यूनिवर्सिटी के फैकल्टी-अध्येता चुप रहे थे। लग रहा था कि संकट का समय है, तो उन्हें भी समझ में आया कि इस वक्त अपना ज्ञान बांटना उचित नहीं होगा। लेकिन लाॅकडाउन के पहले चरण में ही वे फिर पहले की तरह ही सक्रिय हो गए। वैसे भी, इस यूनिवर्सिटी के फैकल्टी से लेकर विद्यार्थी तक ज्ञान को एक-दूसरे के बीच प्रवाहित करते रहते हैं। यह प्रवाह सामान्य लहरों की तरह नहीं होता। तूफान भी इसकी गति को देखकर शर्मा जाता होगा।

धर्म और इतिहास पर इस यूनिवर्सिटी के लोगों ने इतना गहन शोध किया हुआ है कि किताबों की कोई जगह ही नहीं रह गई है। संदर्भ ग्रंथों की भी अब कोई जरूरत ही नहीं रह गई है क्योंकि धर्म और इतिहास को लेकर अब तक अपने यहां इतनी गहनता और विलक्षणता से कोई काम कभी हुआ ही नहीं है। ऐसी-ऐसी बातें बताने और उन्हें प्रवीणता से स्वयंसिद्ध बताने की परंपरा का इतना सुंदर उपक्रम न तो इतिहास में कभी हुआ है, न इनका कोई सानी है।

खासकर इस्लाम और मुसलमानों को लेकर जो व्याख्याएं प्रस्तुत की जा रही हैं, वह न तो कभी सुनी गईं, न कहीं किसी ने कभी लिखी हैं। सच में, हम उस युग में वापस आ गए हैं जहां ज्ञान श्रवण परंपरा से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती थी। लिखने-पढ़ने की परंपरा तो नए युग में चलन में आई और उसने ही संदर्भ ग्रंथों पर अनावश्यक तौर पर जोर देना शुरू किया। यह दृश्य-श्रवण परंपरा का काल है। मसि कागद छूऔं नहीं, कलम गहौं नहि हाथ ...

वैसे, वाट्सएप यूनिवर्सिटी की खासियत यह भी है कि उसकी सक्रिय फैकल्टी किसी घटना का ऐतिहासिक संदर्भों के साथ तुरत-फुरत विश्लेषण करने में सक्षम ही नहीं, प्रवीण भी हैं। वे इंतजार करने में यकीन नहीं करते कि उन्हें किसी घटना, बयान या तथ्य के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा कर लेना चाहिए। ऐसा सब करना तो तुच्छ बुद्धिजीवियों का काम है।

अब जैसे, महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं और उनके कार चालक की हत्या 16 अप्रैल को रात 9ः30 बजे के बाद हुई। तीन दिनों बाद- 19 अप्रैल को पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उस पर सवाल उठाए। तब तक सरकार इसकी जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई के कदम उठा चुकी थी। लेकिन वाट्सएप यूनिवर्सिटी के लोगों ने अपने ब्रह्मज्ञान से जान लिया था कि भीड़ में वे कौन लोग थे, जिन्होंने इस तरह इन साधुओं और चालक की पीट-पीटकर हत्या की। आखिर, साधुओं की हत्या मुसलमानों के अलावा कौन कर सकता है और इसके लिए बहुत सोचने-समझने की जरूरत ही क्या है?

यह होता है घटना का विश्लेषण! अब आप तलाशते रहिए कि सत्य कहां है। वाट्सएप यूनिवर्सिटी सत्य का अनुसंधान अपनी तरह से करता है। उसे यह जानने-समझने की जरूरत ही कहां है कि पालघर इलाके में बच्चा चोरों के गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह वाट्सएप वालों ने ही पहले से फैला रखी थी और इन हत्याओं की बड़ी वजह यही है। जब पता चला कि जितने भी लोगों को आरोपी माना गया या उन्हें गिरफ्तार किया गया, उनमें कोई भी मुसलमान नहीं है, तब भी वाट्सएप यूनिवर्सिटी के लोग पीछे नहीं हटे- आखिर, वे हटें भी क्यों, उन्हें तो सिर्फ वही देखना-बताना है जो वे चाहते हैं।

वाट्सएप का ही कमाल है कि लोग सब्जी-फल भी बेचने वाले का नाम जानकर खरीद रहे हैं। वजह कोई एक वीडियो क्लिप है, जिसमें कोई दाढ़ी वाला सब्जी-फल में थूक लगा रहा है। अब यह जो भी है, उसने भी जानबूझकर ही वाट्सएप ग्रुप में इसे डालने की शुरुआती शरारत की, ताकि जहर जहां तक हो सके, फैल सके। आज हर कोई इस ट्रैप में फंसा हुआ है- बेचने वाले मर रहे हैं, खरीदने वाले आंखें दिखा रहे हैं।

वैसे, इसी बहाने मजा चखा देने वाले वाट्सएप मैसेज भी धड़ल्ले से चल रहे हैंः जब स्थिति सामान्य हो जाए, तो न इनसे बाल कटवाओ, न दाढ़ी बनवाओ; इनसे टेलरिंग का काम भी बंद कर दो; पंक्चर-कार-बाइक के काम भी इनसे न करवाओ; इनकी दुकानों से कोई सामान न खरीदो वगैरह-वगैरह। कोरोना ऐसा मुसलमान हुआ जा रहा है कि लगता है, हिंदू राष्ट्र बनाने का सारा अभियान जल्द ही पूर्णाहुति की ओर अग्रसर हो जाएगा।

कोई बात न तो भुलाई जा रही है, न भूलने दी जा रही है। अभी एक वीडियो वायरल है जिसमें किसी मुस्लिम-बहुल मुहल्ले में महिलाएं राशन के लिए लंबी लाइन में हैं। इसमें बार-बार यह बात कही जा रही है कि देखिए, एनपीआर, एनआरसी के लिए तो इन लोगों के पास कागज नहीं हैं लेकिन राशन लेना हो, तो सारे कागज बाहर निकल आते हैं। यह टिप्पणी हर तरह से अपमानजनक तो है ही, यह भी ध्यान दिलाती है कि अभी हाल में हुए विरोध प्रदर्शनों को यह मुंह चिढ़ाने की कोशिश भी है।

वैसे, यह सब एकतरफा नहीं है। एक ऐसा वीडियो भी वायरल है, जिसमें बताया जा रहा है कि दूसरे धर्म वाले डाॅक्टर और हेल्थ वर्कर आएंगे और जांच के नाम पर ऐसा इंजेक्शन दे देंगे कि आप कोविड-19 से ग्रस्त हो जाएंगे। जगह-जगह हेल्थ वर्कर्स की टीम पर हमले की एक बड़ी वजह यह भी है।

सरकार कहती है कि फेक और भड़काऊ मैसेज के खिलाफ वह हरसंभव कदम उठा रही है। अगर आप इन दिनों दूरदर्शन पर चल रहे रामायण सीरियल देख रहे हैं, तो उसमें यह विज्ञापन भी आता है कि फेक मैसेज से बहुत डर लगता है। फिर भी, समझिए कि आखिर, इस तरह के नए-नए फेक मैसेज रोज-ब-रोज वायरल किस तरह और क्यों हो रहे हैं। चूंकि सोशल मीडिया के ये खतनाक हथियार केंद्र में सत्ताधीन लोगों को सुहाते हैं इसलिए वे इस ओर से आंखें मूंदे रखना ही उचित मानते हैं। हां, वे उन मैसेज पर तुरत-फुरत कार्रवाई करने लगते हैं जो उन्हें नहीं सुहाते। बात साफ है- फेक बनाओ भी तो ऐसा जो सत्ता में बैठे लोगों को फायदा पहुंचाए; आखिर, समाज में जितना विभाजन होगा, फायदा उतना ही होगा!

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