नोटबंदी के दो साल: तथ्यों की कसौटी पर छलावा साबित होता है टैक्स व्यवस्था सुधरने का बीजेपी का दावा

टैक्स व्यवस्था सुधरने का बीजेपी का दावा गलत

नोटबंदी के तरह-तरह के फायदों का दावा करने और तथ्यों की कसौटी पर उनके गलत साबित होने के बाद बीजेपी अब यह दावा कर रही है कि टैक्स व्यवस्था को नोटबंदी से काफी फायदा हुआ।

2 साल पहले 8 नवंबर को यानी आज ही के दिन मोदी सरकार द्वारा लागू की गई नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था और जनता को जो भीषण नुकसान झेलना पड़ा, वह जगजाहिर है। लेकिन दुनिया भर में हुए तमाम विश्लेषणों से स्थापित इस बात को बीजेपी लगातार नकारती रही है। आज भी बीजेपी ने ट्वीट कर नोटबंदी के फायदे गिनाए। यह एक तरह से जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है क्योंकि लोग उन कष्टों को नहीं भूले हैं जो उन्हें दो साल पहले नोटबंदी की वजह से उठाने पड़े थे।

नोटबंदी के तरह-तरह के फायदों का दावा करने और तथ्यों की कसौटी पर उनके गलत साबित होने के बाद बीजेपी अब यह दावा कर रही है कि टैक्स व्यवस्था को नोटबंदी से काफी फायदा हुआ। बीजेपी ने आज ट्वीट कर कई आंकड़े पेश किए गए हैं। उसका कहना है:

  • 2013-14 में 3.79 करोड़ इन्कम टैक्स रिटर्न भरे गए थे, जबकि 2017-18 में यह बढ़कर 6.86 करोड़ हो गया।
  • 2013-14 में 3.31 करोड़ लोगों ने रिटर्न फाइल किया था, जबकि 2017-18 में उनकी संख्या 5.44 करोड़ तक पहुंच गई।
  • रिटर्न फाइल करने वालों ने 2014-15 में अपनी कुल आय 26.92 लाख करोड़ घोषित की थी, जबकि 2017-18 में यह आंकड़ा 44.88 करोड़ तक पहुंच गया।
  • टैक्स देने वालों में सालाना 1 करोड़ या उससे ज्यादा की कमाई करने वालों की संख्या 2014-15 में 88.6 हजार थी, 2017-18 में यह 1.4 लाख हो गई।
  • कॉरपोरेट टैक्स देने वालों ने औसतन 2014-15 में 32.28 लाख टैक्स दिया था, जबकि 2017-18 में उन्होंने 49.95 लाख करोड़ टैक्स दिया।

अब सवाल उठता है कि इन आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर बीजेपी क्या साबित करना चाहती है। क्या नोटबंदी के बाद देश की टैक्स व्यवस्था अचानक सुधर गई है? क्या देश को जबरदस्त आर्थिक फायदा हुआ है?

इन आंकड़ों और सवालों की सच्चाई जानने के लिए सरकार की संस्था सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेशन (सीबीडीटी) के आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जिसके आधार पर आर्थिक मामलों के जानकार जेम्स विल्सन और नंदकुमार के. ने 4 नवंबर, 2018 को ‘नेशनल हेरल्ड’ में सरकार के दावों की पोल खोल दी थी।

उन्होंने लिखा, “यह सही है कि 2013-14 में भरे गए टैक्स रिटर्न की संख्या 3.8 करोड़ थी जो 2017-18 में बढ़कर 6.85 करोड़ हो गई। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या इस बढ़ी हुई संख्या से असल में टैक्स देने वालों की संख्या में और इन्कम टैक्स के रूप में प्राप्त धन में वृद्धि हुई है?”

उन्होंने साल दर साल के आंकड़े पेश करते हुए बताया है कि न तो टैक्स रिटर्न फाइल करने वालों की संख्या में और न ही टैक्स के रूप में प्राप्त धन में कोई नाटकीय वृद्धि हुई है। 2013-14 में बिना किसी नोटबंदी के इन्कम टैक्स देने वालों की संख्या में 11.6 फीसदी विकास हुआ था, जो अगले दो सालों में 8.3 फीसदी और 7.5 फीसदी की दर से घट गया। 2016-17 में 12.7 फीसदी की दर से बढ़ा, लेकिन फिर 2017-18 में यह 6.9 फीसदी घट गया। इस तरह से देखा जाए तो इन्कम टैक्स देने वालों की संख्या में कमी-वृद्धि इन सालों में होती रही है, इसमें कुछ भी नया नहीं है। जहां तक सीधे टैक्स से प्राप्त धन का सवाल है तो 2013-14 में यह 6.38 लाख करोड़ था जो 2017-18 में बढ़कर 10.02 लाख करोड़ हो गया। इसमें भी कुछ अनोखा नहीं है। यूपीए सरकार के सालों में साल दर साल सीधे टैक्स में इससे ज्यादा वृद्धि होती रही है। दूसरे मानकों पर भी स्थिति लगभग यही रही है।

तो आखिर बीजेपी नोटंबदी के किस फायदे का ढिंढ़ोरा पीट रही है? असल में फायदा कुछ भी नहीं है, सिर्फ ढिंढ़ोरा है। आंखों में धूल झोंकने की बीजेपी की यह कोशिश इसलिए कामयाब नहीं होगी क्योंकि नोटबंदी से हुआ नुकसान भारतीय जनता का निजी अनुभव है जिसे भुलाना शायद बहुत मुश्किल है।

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