समान नागरिक संहिता से आदिवासियों की पहचान खत्म हो जाएगी: विक्रांत भूरिया

विक्रांत भूरिया ने दावा किया कि बीजेपी आदिवासियों को बांटना चाहती है, जिससे उनकी संख्या कम हो जाए और फिर उनका आरक्षण घटा दिया जाए। इसके बाद आदिवासी विधानसभा और लोकसभा सीटों को कम कर दिया जाएगा।

समान नागरिक संहिता से आदिवासियों की पहचान खत्म हो जाएगी: विक्रांत भूरिया
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नवजीवन डेस्क

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कांग्रेस के आदिवासी विभाग के प्रमुख विक्रांत भूरिया ने मंगलवार को बीजेपी पर आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर बुलडोजर चलाने का आरोप लगाया और दावा किया कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और ‘डीलिस्टिंग’ से आदिवासियों की पहचान खत्म हो जाएगी। विक्रांत भूरिया ने बीते 24 मई को गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि बीजेपी को आदिवासियों से नहीं, बल्कि कॉरर्पोरेट से लगाव है।

कांग्रेस नेता विक्रांत भूरिया ने यूसीसी और डीलिस्टिंग को आदिवासियों की पहचान और अधिकारों पर बड़ा हमला बताया और कहा कि इनसे उनकी पहचान खत्म हो जाएगी। ‘डीलिस्टिंग’ शब्द का उपयोग आदिवासी समुदायों के आरक्षण और अधिकारों से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के लिए भी किया जाता है। इसके तहत यह मांग की जाती है कि जिन आदिवासियों ने धर्मांतरण कर लिया है, उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर कर दिया जाए।


भूरिया ने दावा किया, ‘‘बीजेपी आदिवासियों को बांटना चाहती है, जिससे उनकी संख्या कम हो जाए और फिर उनका आरक्षण घटा दिया जाए। इसके बाद आदिवासी विधानसभा और लोकसभा सीटों को कम कर दिया जाएगा। जैसे ही पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आदिवासियों के लिए आरक्षित क्षेत्र घट जाएंगे तो जंगलों को सुरक्षित रखने वाले नियम भी खत्म कर दिए जाएंगे और फिर पूंजीपति घराने आदिवासियों की जमीन के नीचे छिपी खनिज संपदा को आसानी से लूट सकेंगे।’’

उन्होंने दिल्ली में चल रही ‘हाउसिंग लिस्टिंग’ का जिक्र करते हुए दावा किया कि सरकारी कर्मचारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे आदिवासियों के नाम एसटी कॉलम में दर्ज न करके अन्य वाले विकल्प में भरें। उन्होंने कहा, ‘‘बीजेपी के लोग 'आदिवासी' को 'वनवासी' मानते हैं। आदिवासी और वनवासी में बहुत बड़ा फर्क है। आदिवासी वो हैं जो आदिकाल से इस धरती पर रह रहे हैं और इस धरती के मालिक हैं। वनवासी वो हैं, जो सिर्फ वनों तक सीमित हैं, जो जंगल में रहते हैं।’’ भूरिया ने कहा, ‘‘आदिवासी एक शब्द नहीं, इतिहास है, वनवासी एक राजनीतिक प्रोजेक्ट है।’’


विक्रांत भूरिया ने कहा कि 24 मई को बीजेपी ने आदिवासी समाज के लिए एक कार्यक्रम किया, जिसमें इनका लक्ष्य हर राज्य से 5 लाख लोगों को लेकर आना था। लेकिन सच्चाई ये निकली कि इस कार्यक्रम में बहुत ही कम लोग आए और जो आए उन्हें बहला-फुसलाकर लाया गया था। BJP ने इस कार्यक्रम का नाम 'जनजातीय सांस्कृतिक समागम' रखा था, जो कॉरपोरेट की लूट पर पर्दा डालने का प्रयास था। एक तरफ बीजेपी सरकार हसदेव, सिजिमाली और अंडमान-निकोबार में आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन पर बुल्डोजर चलाने का काम कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ आवाज उठाने वाले आदिवासी साथियों का एनकाउंटर कर दिया जाता है। BJP को आदिवासियों से मतलब नहीं है, वो उनकी जमीन में दबा खनिज लेना चाहती है।