यूपी उपचुनाव: फूलपुर में हार करीब देख डर गई है बीजेपी

2014 के लोकसभा चुनाव में 284 सीट जीतने वाली बीजेपी को डर सताने लगा है। 11 मार्च को यूपी में लोकसभा की 2 सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर सीएम योगी लगातार सभाएं कर रहे हैं।

फोटो: सोशल मीडिया 
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आस मोहम्मद कैफ

2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 281 सीटों पर जीत मिली थी। उसके बाद से यह संख्या लगातार घटती जा रही है। यूपी में लोकसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव को लेकर भी बीजेपी के मन में डर बैठ गया है।

उत्तर प्रदेश की 3 लोकसभा सीटें इस समय सांसदविहीन हैं, जिनमें 2 सीटों पर 11 मार्च को चुनाव है और तीसरी सीट यानी कैराना के लिए अभी घोषणा नहीं हुई है। बीजेपी अगर यह तीनों सीट पर हार जाती है तो इसे बीजेपी की नैतिक हार मानी जाएगी और मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में इसकी संभावना बढ़ गई है।

उत्तर प्रदेश 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने वाली बीजेपी की खुशी गायब होने वाली है। तीनों लोकसभा सीट पर बीजेपी की वापसी बहुत मुश्किल हो गई है। समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ आने से बीजेपी भारी संकट में है।

कैराना में अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन वहां भी समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय लोकदल का यह गठजोड़ कायम रहता है तो दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की मौत से रिक्त हुई इस सीट पर तो बीजेपी की निश्चित हार हो जाएगी।

फिलहाल संकट फूलपुर में है। यहां की जमीन बीजेपी के लिए कांटेदार हो गई है। पूरी ताकत झोंकने के बाद भी हालात काबू में नही आ रहे हैं। इस संकट से निपटने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां लगातार सभा कर रहे हैं। मगर वे गैर-बीजेपी दलों के एकता से जीत पाएंगे, इसमें संदेह है। यहां 2014 में उनके प्रत्याशी केशव प्रसाद मौर्य ने बीएसपी के कपिल करवरिया को 5 लाख से अधिक वोटों से हराया था। केशव प्रसाद मौर्य अब उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम हैं। उन्होंने दावा किया है कि बीजेपी अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ देगी। लेकिन समाजवादी पार्टी, बीएसपी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ आने के बाद यह संभव नही दिख रहा है।

समाजवादी पार्टी के इलाहाबाद के जिलाअध्यक्ष कृष्णमूर्ति यादव कहते हैं, “14 मार्च यानी मतगणना वाले दिन का इंतजार कीजिये। बीजेपी को करारा जवाब मिलेगा। जनता इनसे तंग आ चुकी है।”

फूलपुर लोकसभा की ऐतिहासिक सीट है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू यहां से 3 बार सांसद रह चुके हैं। बाद में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित यहां सांसद रहीं। राममनोहर लोहिया यहां हार गए और जनेश्वर मिश्रा बाद में जीते। वीपी सिंह भी यहां से जीतकर प्रधानमंत्री बने। यहां ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी ने इफको की स्थापना की थी, जो इस इलाके का सबसे बड़ा रोजगार का साधन है। उनके निजी सचिव रहे जे एन मिश्रा यहां पूरे एक गांव को रोजगार देने के लिए जाने जाते है। उनके पुत्र मनीष मिश्रा को कांग्रेस ने यहां प्रत्याशी बनाया है। डेढ़ लाख की आबादी वाली सवर्ण जातियों में उनकी पकड़ मजबूत है। 3 लाख की संख्या वाली पटेल बिरादरी को समाजवादी पार्टी और बीजेपी दोनों ने टिकट दिया है। बीएसपी के समर्थन के बाद समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी नागेन्द्र पटेल की स्थिति मजबूत हो गई है। बीजेपी के कौशलेंद्र पटेल को चुनाव लड़ा रही है और कौशलेंद्र वाराणसी के मेयर रह चुके है।

2014 में बीजेपी ने सबसे अधिक मतों से इसी सीट को जीता था। इससे पहले बीजेपी यहां कभी नही जीत पाई थी। यहां से जीत के बाद केशव प्रसाद मौर्य को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी बतौर इनाम दी गई थी। जावेद इकबाल कहते है, “अब हार के बाद डिप्टी सीएम की कुर्सी भी छीन ली जाएगी। इस गंभीरता को समझते हुए केशव प्रसाद मौर्य यहां पूरी ताकत लगा रहे हैं। यह अलग बात है कि टिकट उनकी मर्जी के खिलाफ दिया गया।”

इलाहाबाद के विजय मिश्रा बताते हैं, “2014 की जीत के बाद क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत कम रही। यहां न युवाओं को रोजगार मिला और न ही सुविधाओं में कोई सुधार हुआ, उनकी जवाबदेही को लेकर लोग यहां सवाल पूछते हैं। वे अपने किसी करीबी के लिए टिकट मांग रहे थे। मगर उनकी नहीं चली तो भी वे पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। मगर उनके समर्थकों में रोष है, वे बुझे मन से काम कर रहे हैं।”

फूलपुर की सीट से बीजेपी टेंशन में आ गयी है। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को बीएसपी के समर्थन के बाद यहां बीजेपी के नेता पूरी तरह बौखला गये हैं। उन्होंने शब्दों की मर्यादा भी लांघ दी है। प्रदेश सरकार में एक मंत्री नदगोपाल नंदी ने तो बीएसपी सुप्रीमो मायावती को ‘सुपर्णखा’ और मुलायम सिंह की ‘रावण’ से तुलना कर दी, जबकि मंच पर मौजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद इस भाषण पर हंसते नजर आए।

बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी इसे सांप और नेवला की दोस्ती बता चुके हैं। फूलपुर में समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचार कार्यालय प्रभारी पूर्व मंत्री मुनीर अहमद खान कहते है, “अगर बीजेपी 365 दलों से गठबंधन कर ले तो कोई बात नहीं। लेकिन जायज और न्याय के लिए शोषित समाज के लोग एक मंच पर आ जाए तो इनको पेट में दर्द हो जाता है।”

दलितों में भी इस बार आक्रोश चरम पर है। छात्र नेता ऋचा कहती हैं, “यहां शहर में सरेआम एक दलित युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। क्या योगी इसी प्रकार की कानून व्यवस्था को आदर्श बताते हैं। इस बार दलितों और मुसलमानों में कोई गलतफहमी नहीं है। वे बीजेपी के अहंकार को तोड़ने के लिए वोट कर रहे हैं।” यहां से सांसद रहे बाहुबली अतीक अहमद भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। मगर जनता उन्हें सिर्फ वोट-कटवा मान रही है। इलाहाबाद में कम्प्यूटर की दुकान चलाने वाले मोहम्मद नासिर कहते हैं, “अतीक भाई को अपना पर्चा नही भरना चाहिए था, इस बार उनको कोई पसंद नही कर रहा है।”

बीजेपी को भी फूलपुर के बारे में यह सारी खबर है, तभी यहां पूरी ताकत झोंक दी गई है। जबकि फूलपुर के कांटों के चक्कर में गोरखपुर से नजर हट गई है। वहां योगी आदित्यनाथ के धुर-विरोधी एसपी शुक्ला के करीबी उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया गया है, जिससे योगी के खास समर्थकों का दिल टूट गया है। यहां समाजवादी पार्टी प्रवीण निषाद को लड़ा रही है। कांग्रेस ने यहां सीमा वजाहत रिजवी को टिकट दिया है। जिन्हें हाल ही में हुए मेयर चुनाव में 81 हजार वोट मिले थे। बीजेपी का ध्यान गोरखपुर से हट गया है।

गोरखपुर के अलहम्द हुसैन कहते है, “यहां बीजेपी पूर्णतया विश्वास में है कि वह प्रचार भी नहीं करेगी, तब भी जीत उसकी होगी। जल्दी ही यह घमंड टूटने वाला है। बीजेपी अगर यहां से हार जाती है तो उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।”

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