यूपी विधान परिषद चुनाव: शक्ति-संतुलन की बड़ी परीक्षा; बागियों के सहारे सपा, बीजेपी को अपनों की चुनौती

समाजवादी पार्टी विधान परिषद चुनाव में बीजेपी के असंतुष्टों को साथ लाकर नया संदेश देना चाह रही है, तो बीजेपी के सामने हाल के वर्षों में पहली बार अपने परंपरागत समर्थक वर्गों को एकजुट रखने की चुनौती है।

23 अक्टूबर को होने वाले उत्तर प्रदेश विधान परिषद गोरखपुर-फैजाबाद खण्ड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचन-2026 के लिए जिला निर्वाचन कार्यालय आजमगढ़ से पोलिंग पार्टियों की रवानगी (फोटो - @airnews_luckonw)
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उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 शिक्षक / स्नातक सीटों के चुनाव में मुकाबला केवल बीजेपी और समाजवादी पार्टी के घोषित उम्मीदवारों के बीच नहीं है। टिकट वितरण से उपजी नाराजगी, निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी और स्थानीय शिक्षक संगठनों का प्रभाव चुनावी समीकरण को नया आकार दे रहा है। समाजवादी पार्टी जहां बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाकर मुकाबला दिलचस्प बनाने की कोशिश में है, तो बीजेपी के सामने हाल के वर्षों में शायद पहली बार, अपने परंपरागत समर्थक खांचों को एकजुट रखने की चुनौती है। इस पूरे घटनाक्रम में गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े संजयन त्रिपाठी का सपा में आना खास राजनीतिक महत्व रखता है।

बीजेपी से टिकट के दावेदार रहे संजयन त्रिपाठी का पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होना महज एक उम्मीदवार का पाला बदलना नहीं है। इससे शिक्षक राजनीति में बीजेपी के संगठनात्मक प्रभाव और स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत स्वीकार्यता के बीच का अंतर भी उभरा है। बीजेपी ने इस सीट पर मौजूदा विधान परिषद सदस्य ध्रुव कुमार त्रिपाठी को फिर उम्मीदवार बनाया, जबकि संजयन त्रिपाठी ने पहले निर्दलीय चुनाव लड़ने का रास्ता चुना और बाद में सपा के प्रत्याशी बन गए।  सपा ने इस बदलाव के तहत अपने पूर्व घोषित उम्मीदवार कमलेश यादव की जगह उन्हें मैदान में उतारा। एक तीसरे उम्मीदवार अजय सिंह भी हैं, जो मुक़ाबले को रोचक बना सकते हैं।

सपा मान कर चल रही है कि संजयन त्रिपाठी का व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक समुदाय में उनकी पहचान और बीजेपी के भीतर टिकट को लेकर पैदा हुई नाराजगी उसके लिए समर्थन जुटाने में मददगार हो सकती है। हालांकि, किसी एक नेता के दल बदलने का असर कितने मतदाताओं तक पहुंचेगा, यह अलग सवाल है।

गोरखपुर की राजनीति में कितना असर?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहक्षेत्र गोरखपुर से जुड़े इस चुनाव पर स्वाभाविक रूप से प्रदेश भर की निगाहें हैं। यहां संजयन त्रिपाठी की उम्मीदवारी को समाजवादी पार्टी, सत्तारूढ़ बीजेपी के भीतर उभरते असंतोष के रूप में उभारना चाह रही है। पार्टी इसे शिक्षक राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर ही नहीं, बीजेपी के स्थानीय समीकरणों को चुनौती देने के मज़बूत औज़ार के रूप में भी देख रही है। लेकिन, बीजेपी के पास भी ध्रुव कुमार त्रिपाठी जैसे अनुभवी के साथ संगठनात्मक संपर्क और चुनाव क्षेत्र में पहले से मौजूद राजनीतिक आधार की उपस्थिति की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

ऐसे में मुकाबले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि संजयन त्रिपाठी के साथ बीजेपी के कितने पुराने समर्थक खड़े रहते हैं, और कितने मतदाता उम्मीदवार बदलने के बावजूद पार्टी के साथ बने रहते हैं। ब्राह्मण नेतृत्व की नाराजगी या टिकट वितरण में उपेक्षा का मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है, लेकिन इसे पूरे ब्राह्मण मतदाता वर्ग के एकमुश्त समर्थन में बदलकर देखना भी उचित नहीं होगा। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहुंच, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं से पुराने संबंध भी अहम भूमिका निभाते हैं। 


सपा की उम्मीदें सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं

समाजवादी पार्टी के लिए इस चुनाव का महत्व इसलिए भी है कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में उसे अपनी संगठनात्मक क्षमता तथा शिक्षित मतदाता वर्ग के बीच स्वीकार्यता साबित करने का अवसर मिलता है। वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव और वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में आशुतोष सिन्हा जैसे चेहरों के जरिए पार्टी अपने पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में है। 

बीजेपी के बागियों और निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कोई असंतुष्ट उम्मीदवार शिक्षक संगठनों या स्नातक मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रखता है, तो वह बीजेपी के मतों को प्रभावित कर सकता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि उससे मिलने वाला लाभ सीधे सपा के खाते में जाए। निर्दलीय उम्मीदवार सपा के समर्थकों और असंतुष्टों को भी अपनी ओर खींच सकते हैं। लिहाजा, बागियों की मौजूदगी से पैदा होने वाले राजनीतिक अवसर को वास्तविक समर्थन में बदलना सपा के लिए अलग चुनौती होगी।

सपा के सामने उम्मीदवारों के चयन से पैदा होने वाली असहजता को संभालने का सवाल भी है। संजयन त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाने के लिए उसे पूर्व घोषित कमलेश यादव को हटाना पड़ा। ऐसे बदलावों से नए समीकरण बनते हैं, लेकिन पहले से सक्रिय स्थानीय कार्यकर्ताओं और दावेदारों की भूमिका भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए पार्टी के लिए बाहरी असंतोष को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के साथ अपने संगठन के भीतर तालमेल बनाए रखना जरूरी होगा।

बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती

बीजेपी की चुनौती केवल विपक्ष के उम्मीदवारों से मुकाबला करने की नहीं, टिकट वितरण के बाद उभरी नाराजगी सीमित रखने की भी है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनावी गणित विधानसभा क्षेत्रों से अलग होता है। यहां सीमित मतदाता वर्ग, शिक्षक संगठनों की सक्रियता, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और वर्षों से बने संपर्क परिणाम को प्रभावित करते हैं। पार्टी का सांगठनिक ढांचा मज़बूत होने के बावजूद स्थानीय असंतोष नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।

बीजेपी के लिए संजयन त्रिपाठी प्रकरण यह सवाल खड़ा करता है कि क्या उसके घोषित उम्मीदवार के पक्ष में संगठन और पुराने समर्थक अंत में भी एकजुट रहेंगे। वहीं सपा के लिए परीक्षा यह है कि क्या वह बीजेपी की अंदरूनी नाराजगी को अपने समर्थन में बदल पाएगी। दोनों दलों के सामने उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव और संगठन की ताकत के बीच संतुलन साधने की चुनौती है।


संजयन त्रिपाठी का सपा में आना इस चुनाव का उल्लेखनीय राजनीतिक घटनाक्रम भले हो, असर कितना व्यापक होगा, यह उनके व्यक्तिगत प्रभाव, भाजपा के स्थानीय संगठन की प्रतिक्रिया, निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका और सपा की अपनी एकजुटता पर निर्भर करेगा। असली तस्वीर इस बात से बनेगी कि टिकट को लेकर पैदा हुई नाराजगी कितनी दूर तक जाती है और स्थानीय मतदाता दलगत निष्ठा, उम्मीदवार की पहचान तथा अपने मुद्दों में से किसे प्राथमिकता देते हैं। 

यूपी में शिक्षक और स्नातक क्षेत्र में विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) के लिए 11 सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान होगा और नतीजे 27 को आने हैं। 11 में से पांच सीट पश्चिमी यूपी की आगरा स्नातक , मेरठ स्नातक , आगरा शिक्षक, मेरठ शिक्षक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीटें पश्चिमी यूपी हैं। छह अन्य सीटों में लखनऊ स्नातक, वाराणसी स्नातक, इलाहाबाद-झांसी स्नातक, लखनऊ शिक्षक, वाराणसी शिक्षक और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक क्षेत्र शामिल हैं।

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