उत्तर प्रदेश: बुलडोज़र की उलटी पड़ती चाल और हताशा

सही है कि उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र की मार अब तक मुख्य रूप से मुसलमानों, मस्जिदों और कथित अपराधियों पर ही पड़ती रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर इसके ‘उपयोग’ और ‘दुरुपयोग’ के लिहाज़ से खासे दूरगामी नतीजों वाला हो सकता है।

पिछले सप्ताह बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन के लिए मेरठ में बुलडोजर से पुष्प वर्षा की गई
i

उत्तर प्रदेश में यह नजारा अब आम है कि जब भी बीजेपी का कोई बड़ा नेता आता है, उसके स्वागत में हाईवे पर जीसीबी बुलडोज़रों की लाइन लगा दी जाती है। 21-22 सितंबर को पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन के मेरठ और सहारनपुर दौरे के समय भी ऐसा ही हुआ। उनका काफिला मेरठ में दाखिल होते ही एक टोल प्लाज़ा पर जब उन पर फूल बरसे, वह ख़ासे खुश दिखे। अलग बात है कि स्वागत का यह अंदाज मेरठ के बीजेपी समर्थकों के बीच काफी नाराज़गी भी पैदा कर गया, क्योंकि वहां तो बुलडोज़र इन दिनों ‘अवैध’ व्यावसायिक इमारतों को ढहाने वाले अभियान में जुटे हुए हैं। नाराज़गी का मामला नवीन तक भी पहुंचा और यही कारण रहा कि अगले दिन उनका काफिला सहारनपुर पहुंचा तो जेसीबी के ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ के सामने बिना रुके तेज़ी से गुज़र गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में शास्त्री नगर के सेंट्रल मार्केट की ऐसी 44 रिहायशी  सम्पत्तियां गिराने का आदेश दिया था, जिनका व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा था। इनमें से कुछ सील कर दिए गए और कुछ को गिरा दिया गया। जुलाई 2026 में, सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि भवन संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की संख्या 859 तक हो सकती है। लेकिन सितंबर में एक ही सर्वे ज़ोन में ‘अवैध निर्माण’ की संख्या बढ़कर 16,726 पहुंच गई।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सम्पत्तियां सील करने का आदेश दिया जिनमें से ज़्यादातर का इस्तेमाल स्कूल, नर्सिंग होम, ज्वेलरी और मिठाई की दुकानों और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए बने घर के तौर पर किया जा रहा था।

हुआ यह कि बिना कानूनी मंज़ूरी के रिहायशी सम्पत्ति के व्यावसायिक इस्तेमाल, अनधिकृत निर्माण और अनिवार्य रूप से खाली छोड़ी जाने वाली जगहों (सेटबैक एरिया) पर अतिक्रमण के मामलों की पहचान की गई। अदालत ने महज इस आधार पर उन्हें नियमित करने से इनकार कर दिया कि वे निर्माण काफ़ी पुराने थे या अधिकारियों ने पहले कार्रवाई नहीं की थी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि अवैध निर्माण हमेशा अवैध ही रहते हैं, चाहे कितने भी पुराने क्यों न हों।  

हालांकि पारंपरिक रूप से बीजेपी समर्थक रहे व्यापारी और कारोबारी सरकार द्वारा उनके हितों और निवेश की सुरक्षा न कर पाने से ख़ासे नाराज़ हैं, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वे कोर्ट के आदेश से बंधे हुए हैं। लोग अब सवाल पूछने लगे हैं कि यह ‘बुलडोज़री न्याय’ कब और कहां जाकर विराम लेगा? यूपी में कहीं भी अवैध या अनधिकृत निर्माण कोई नई बात नहीं, और अगर मेरठ में इसी तरह तोड़-फोड़ चली तो बाकी स्थानों पर यह किस तर्क से आधार रुकेगा यह सवाल लोगों को परेशान कर रहा है?


सही है कि राज्य में बुलडोज़र की मार अब तक मुख्य रूप से मुसलमानों, मस्जिदों और कथित अपराधियों पर ही पड़ती रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर इसके ‘उपयोग’ और ‘दुरुपयोग’ के लिहाज़ से खासे दूरगामी नतीजों वाला हो सकता है। अधिकारी भी मानते हैं कि इसके लिए बस नगर निकायों से अवैध और अनधिकृत निर्माणों के बारे में आरटीआई के जरिये जानकारी हासिल करनी होती है और फिर उन्हें गिराने को अदालत में याचिका दायर करनी होती है। अब तक जो लोग मस्जिदों, मज़ारों और मुसलमानों की संपत्तियों को लक्षित कर गिराए जाने का जश्न मना रहे थे, इस बात से डरे हुए हैं कि योगी आदित्यनाथ का ‘बुलडोज़र जस्टिस’ कहीं अब उन पर ही भारी न पड़ जाए।

क्या सब कुछ ठीक नहीं है?

बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में बीजेपी समर्थकों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। एक मंत्री का कहना था कि समाजवादी पार्टी के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) यह सुनिश्चित करने की दिशा में कहीं बेहतर काम कर गए कि इस प्रक्रिया में मुस्लिम वोटरों के नाम हटने न पाएं। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इससे नाराज़ हैं, और यही वजह है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं से ‘नए वोटरों’ का रजिस्ट्रेशन तेज़ करने और इसके लिए फॉर्म 6 और फॉर्म 6A भरने को कहा जा रहा है। उन्हें उम्मीद है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हालात ठीक हो जाएंगे।

यह बात अब जाने-अनजाने चर्चा में है कि बीजेपी के लिए 2027 के चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। पार्टी को सत्ता-विरोधी लहर के साथ हवा में आए ठहराव या माहौल में उपजी निराशा से निपटना होगा। आरएसएस ने लखनऊ की समन्वय बैठक में इस पर ‘चिंतन’ भी किया है, जिसमें चार चिंताएं प्रमुख थीं। बीजेपी के विधायकों और स्थानीय नेताओं के प्रति लोगों में नाराज़गी बढ़ रही है। पार्टी कार्यकर्ता निराश और नाखुश हैं; और इसके पीछे महंगाई, बेरोजगारी और अयोध्या में राम मंदिर के लिए इकट्ठा किए गए चंदे में हेराफेरी जैसे कारण हैं, और यह भी कि अधिकारी और पुलिस अब पार्टी विधायकों और कार्यकर्ताओं की बात पहले की तरह नहीं सुनते। बैठक में सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार और ‘जेन-ज़ी’ के साथ बढ़ती दूरी का मुद्दा भी उठा।

लेकिन आरएसएस का बीजेपी के लिए संदेश बहुत साफ था: “आपसी मतभेदों और शिकायतों को भूलकर चुनाव की तैयारियों में जुट जाइए।”

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए