उत्तर प्रदेशः योगी सरकार के लिए गले की हड्डी बना कोटे में कोटा

एससी-एसटी एक्ट पर अगड़ों की नाराजगी झेल रही बीजेपी की योगी सरकार कोटे में कोटा कर पिछड़ी जातियों के एक बड़े तबके की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती। यही वजह है कि इस कोटे का पैमाना तय करने वाली कमेटी की रिपोर्ट को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी है।

फोटोः सोशल मीडिया
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रंजीव

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने कोटे में कोटा की रणनीति के तहत पिछड़ी जातियों के आरक्षण में बंटवारा कर विपक्षी दलों के मुकाबले जो सियासी लाभ लेने की सोची थी, वह अब खुद उसपर ही भारी पड़ती लग रही है। एससी-एसटी एक्ट पर अगड़ों की नाराजगी झेल रही बीजेपी कोटे में कोटा कर पिछड़ी जातियों के एक बड़े तबके की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती। यही वजह है कि कोटे में कोटा का पैमाना तय करने वाली कमेटी की रिपोर्ट मिल जाने के बावजूद इसे ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी है।

योगी सरकार ने आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक पिछड़ेपन और नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी का अध्ययन कर कोटे में कोटा तय करने के लिए इस साल के शुरू में हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस राघवेंद्र कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी बनाई थी। इसमें बीएचयू के प्रोफेसर भूपेंद्र विक्रम सिंह, रिटायर्ड आईएएस जेपी विश्वकर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक राजभर शामिल थे।

कमेटी ने दो बार कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद हाल में अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। सूत्रों के मुताबिक इसे लागू करने पर नफा से अधिक नुकसान भांपते हुए सरकार लोकसभा चुनाव तक इसे ठंडे बस्ते में डालना चाहती है। सूत्रों का कहना है कि सरकार यह मानती है कि यूपी में कोटे में कोटा लागू करने के सारे आधार मौजूद हैं लेकिन राजनीतिक कसौटी पर इसके नफा-नुकसान को तौलना जरूरी हो गया है।

चूंकि लोकसभा चुनाव नजदीक है, ऐसे में कमेटी की सिफारिश के मुताबिक सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग में शामिल होने वाली 79 जातियों को इसका फायदा समझाने के लिए वक्त कम बचा है। इसके अलावा कोटे में कोटा करने पर यादव, कुर्मी और जाट को नुकसान होगा। लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी इससे बचना चाहती है। वजह यह है कि 2014 के लोकसभा और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलने के बाद अब हालात बदले हैं।

बीजेपी को पिछड़ा बहुल गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। बाद में कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में जाटों ने भी बीजेपी का साथ नहीं दिया। इतना ही नहीं, प्रदेश में विपक्षी दलों के महागठबंधन के भी मजबूत आकार लेने की भी तैयारी है। लिहाजा कोटे में कोटा के जरिये सियासी लाभ का बीजेपी का गणित अब उसके लिए नुकसान की आशंकाएं पैदा कर रहा है। वहीं इसे ठंडे बस्ते में डाले रखने में यूपी में एनडीए की सहयोगी पार्टियों का रुख भी अहम होगा। सरकार में शामिल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर बंटवारे के पक्ष में बयान देते रहे हैं लेकिन कुर्मी बिरादरी की सियासत करने वाला अनुप्रिया पटेल का अपना दल इससे सहमत नहीं होगा। यानी बीजेपी के लिए न निगल पाने और न उगल पाने के हालात बन गए हैं।

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