उत्तराखंड: SIR प्रक्रिया सवालों के घेरे में, 45 सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या 2022 की जीत के अंतर से ज़्यादा

उत्तराखंड के जिन ज़िलों में ज्यादा मुस्लिम आबादी है,वहां नाम हटाने की दर भी ज़्यादा रही है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि एसआईआर के नाम पर मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है।

उत्तरखांड में एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं
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मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बीजेपी शासित उत्तराखंड सरकार की कार्य प्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं। एसआईआर प्रक्रिया के अब तक हुए विश्लेषण से सामने आया है कि अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में रिकॉर्ड स्तर पर वोटरों को नाम डिलीट किए जा रहे हैं।

सबर इंस्टीट्यूट के एक विश्लेषण में सामने आया है कि उत्तराखंड के जिन जिलों में मुस्लिम आबादी अधिक है वहां मतदाता सूची से वोटरों के नाम डिलीट करने की जानकारियां अधिक मिल रही हैं।

इस रिपोर्ट में पता चला है कि उत्तराखंड की कुल 70 विधानसभा सीटों में से 45 सीटों पर वोटरों को नाम डिलीट करने की संख्या 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों में जीत के अंतर से भी अधिक हैं। यह भी सामने आया है कि बीजेपी से जुड़े लोगों द्वारा वोटरों को नामों को लेकर बड़े पैमाने पर आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं।

इस बीच न्यूज लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीजेपी से जुड़े पांच लोगों ने अलग-अलग 5 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 6500 आपत्तियां दर्ज कराकर मुस्लिम वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में अब तक 262 आपत्तिकर्ताओं ने प्रत्येक ने 10 से अधिक लोगों के नाम हटाए जाने की अर्जी दी है।

बता दें कि चुनाव आयोग के 2023 के मैन्युअल के मुताबिक कोई भी व्यक्ति एक दिन में 10 से अधिक आपत्तियां दर्ज नहीं करा सकता है। लेकिन  उत्तराखंड के मामले में कुछ लोगों ने सैकड़ों और कुछ ने हजारों आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इन आपत्तियों के चलते उत्तराखंड की वोटर लिस्ट में कुल नाम 79.6 लाख से घटकर 71.3 लाख रह गए हैं।

इस बीच हिंदी अखबार अमर उजाला ने एक रिपोर्ट में कहा है कि जिन जिलों में सर्वाधिक नाम काटे जाने की अर्जियां मिली हैं उनमें नैनीताल, उधम सिंह नगर और हरिद्वार प्रमुख हैं। इन तीनों ही जिलों में अच्छी खासी मुस्लिम आबादी है।


उधमसिंह नगर की किच्छ सीट पर 4857 आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं, जिनमें से 4855 अकेले राजेश तिवारी नाम के एक ही व्यक्ति ने दायर की हैं। राजेश तिवारी बूथ लेवल एजेंट के तौर पर काम करता है। तिवारी की आपत्तियों में मुख्यतया पहले से दर्ज श्रेणी की आपत्ति है। गौरतलब है कि किच्छा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 28.4 फीसदी है। 2022 में इस सीट से कांग्रेस के तिलक राज बेहर ने जीत हासिल की थी। उन्होंने बीजेपी को दो बार के विधायक शुक्ला को 10000 से अधिक वोटों से हराया था।

इसी तरह का पैटर्न गदरपुर में भी देखने को मिला है जहां 670 आपत्तियां दर्ज की गई हैं।  2022 में बीजेपी ने यह सीट मात्र 1120 वोटों के अंतर से जीती थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक इलाके के बीजेपी कार्यकर्ता चंकित हुरिया ने यहां 670 आपत्तियां दर्ज कर मुस्लिम वोटरों के नाम काटने की सिफारिश की है।

इतना ही नहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्वाचन क्षेत्र खटीमा में भी 392 आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इनमें से 392 आपत्तियां अकेले  बीजेपी कार्यकर्ता अमित कुमार पांडे के नाम से दर्ज हुई हैं। खटीमा यूं भी अहम सीट है क्योंकि इस सीट से मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2012 और 2017 में चुनाव जीते थे लेकिन 2022 में कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी से 6579 वोटों से हार गए थे। बाद में उन्होंने चंपावत में हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की थी।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी ने उन 23 सीटों पर माइक्रो मैनेजमेंट शुरु किया है जो वह 2022 के चुनाव में हार गई थी। इनमें खटीमा भी शामिल है। खटीमा में करीब 8 फीसदी वोटर मुस्लिम हैं।

उधर उधमसिंह नगर के रुद्रपुर में 2818 आपत्तियां दर्ज कर वोटरों के नाम डिलीट करने की अर्जी दी गई है। इनमें से अकेले सनी पासवान नाम के शख्स ने 230 नाम  हटाने की मांग की है। पासवान के फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वह बीजेपी के एससी मोर्चा का नगर महासचिव है।


जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है, वहां नाम हटाने और आपत्तियों के ज़्यादा मामलों को देखते हुए कांग्रेस ने चुनाव आयोग के सामने यह मुद्दा उठाया है। पार्टी का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया का इस्तेमाल सोच-समझकर मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस ने आपत्तियों व नाम हटाने की प्रक्रिया की जांच की मांग की है। पार्टी का कहना है कि वेरिफिकेशन के लिए कम समय, नामों और पतों में गड़बड़ी, लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने और "लॉजिकल गड़बड़ी" जैसी वजहों से बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हट सकते हैं, खासकर उन इलाकों में जहां अल्पसंख्यक मतदाता ज़्यादा हैं।

उत्तराखंड में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) 2026 की शुरुआत 8 जून को हुई थी और अंतिम वोटर लिस्ट 15 सितंबर को जारी की जानी है।

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