उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष से दहशत में ग्रामीण, पलायन को हुए मजबूर
पौड़ी जिले के चौरां गांव में बलबीर सिंह बिष्ट ने अपने पुश्तैनी मकान की मरम्मत इस उम्मीद से कराई थी कि वह वहीं बसेंगे, लेकिन तेंदुओं, भालुओं, जंगली सूअरों, बंदरों और लंगूरों के उत्पात ने उन्हें अपना इरादा बदलने को मजबूर कर दिया।

‘‘हमारे गांव में जंगली जानवरों का आतंक ऐसा है कि रात में जब घर का एक सदस्य शौचालय जाता है, तो दूसरा बाहर बंदूक लेकर पहरा देता है।’’ दहशत से भरी यह कहानी सेना से सूबेदार पद से सेवानिवृत्त होने के बाद बागेश्वर जिले के अपने पैतृक गांव कनलगढ़ में बसे मोहन सिंह की है, जिसे हाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर साझा किया।
स्थिति पर चिंता जताते हुए रावत ने कहा कि जिन लोगों को बंदूक चलानी नहीं आती, वे ऐसी स्थिति का सामना कैसे कर रहे होंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता की सलाह पर सिंह ने एक दशक पहले अपने गांव में खेती शुरू की, नींबू और माल्टा के पेड़ लगाए और दुग्ध व्यवसाय के लिए गायें भी खरीदीं। कुछ समय तक उनका जीवन खुशहाल रहा, लेकिन पिछले सात से आठ वर्षों में तेंदुओं, जंगली सूअरों और भालुओं का आतंक उनके गांव तक आ पहुंचा।
सिंह ने बताया कि कुछ समय पहले तेंदुए के हमले में घायल हुई उनकी एक गाय की मौत हो गई।
उन्होंने कहा, ‘‘हालात ऐसे हो गए हैं कि रात में जब घर का एक सदस्य शौचालय जाता है, तो दूसरा बाहर बंदूक लेकर पहरा देता है।’’
देहरादून में वर्ष 2023 में नौकरी से सेवानिवृत्त हुए बलबीर सिंह बिष्ट की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
पौड़ी जिले के चौरां गांव में बलबीर सिंह बिष्ट ने अपने पुश्तैनी मकान की मरम्मत इस उम्मीद से कराई थी कि वह वहीं बसेंगे, लेकिन तेंदुओं, भालुओं, जंगली सूअरों, बंदरों और लंगूरों के उत्पात ने उन्हें अपना इरादा बदलने को मजबूर कर दिया।
बिष्ट ने कहा, ‘‘हम गांव में रहकर क्या करेंगे। तेंदुओं और भालुओं का आतंक और फिर जंगली सूअरों, बंदरों व लंगूरों का तांडव-जीना दूभर कर दिया है।’’
इन हालातों को बयां करता एक गीत भी सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो रहा है, जिसकी पंक्तियों में भालू, तेंदुए और बंदरों के आतंक का जिक्र करते हुए कहा गया है, ‘‘गांव-गली में डर है छाया, फसल चौपट- सब तेरी माया।’’
कहा जा रहा है कि यह गीत पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल क्षेत्र के विधायक एवं प्रदेश सरकार में मंत्री सतपाल महाराज को संबोधित कर लिखा गया है।
प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से एक गंभीर समस्या रहा है। जंगलों के आसपास बसे लोग अक्सर बाघों और तेंदुओं के हमलों का शिकार होते रहे हैं, जबकि जंगली सूअर, बंदर और लंगूर उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते रहे हैं।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इस समस्या में और इजाफा हुआ है। उत्तराखंड में वर्ष 2025 में तेंदुओं, बाघों और भालुओं के हमलों में करीब 30 लोगों की मौत हुई।
पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों का उल्लेख करते हुए रावत ने कहा कि वर्ष 2010 के बाद से वन्यजीवों का आतंक तीन से चार गुना बढ़ गया है और इससे बढ़ी कठिनाइयों के कारण पिछले 12 से 14 वर्षों में सात से 10 प्रतिशत तक पलायन हुआ है।
ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने भी माना है कि हाल के वर्षों में जंगली जानवरों के आबादी क्षेत्रों में बढ़ते उत्पात के कारण पलायन के मामलों में कुछ वृद्धि हुई है।
आयोग के अध्यक्ष एस.एस. नेगी ने कहा कि प्रदेश से पलायन का मुख्य कारण रोजगार की तलाश है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘‘जंगली जानवरों का आतंक भी पलायन का एक कारण है और करीब सात से आठ प्रतिशत लोगों ने इसे अपने पलायन की वजह बताया है।’’
प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार ने इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए राज्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर विशेषज्ञों से एक अध्ययन कराए जाने का आदेश दिया है।