जंतर-मंतर पर धरना : मोदी सरकार से जवाबदेही के लिए 'बच्चों की ख़ातिर तो यहां आना ही था'

रमेश मीणा राजस्थान के नागौर से और आशु लुधियाना से आए हैं। ऐसे अनेक लोग जंतर-मंतर पर दिन-रात डेरा डाले रहते हैं। लोनी की सत्तर साल की दादी कहती हैं, “मैं अपनी पोतियों को लेकर यहां आई हूं। यह आना मेरी जिद थी… बच्चों की खातिर हमें आना ही था।”

फोटो: सोशल मीडिया
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राजस्थान के कोटा से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक युवा पीढ़ी (जेन जी) विरोध-प्रदर्शन कर रही है, उस सरकार से जवाबदेही मांग रही है जिसने उनके भविष्य के सपनों को खतरे में झोंक दिया है।

आस्था बिहार से हैं, नीट की तैयारी कर रही हैं। 17 जून को, यानी दोबारा परीक्षा (पेपर लीक के बाद) से ठीक चार दिन पहले, उन्हें लगा कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाले ‘छात्रों की गूंज’ अभियान में उन्हें शामिल होना चाहिए। आस्था कहती हैं: “2024 में भी नीट का पेपर लीक हुआ था, लेकिन सरकार मानी ही नहीं! इस साल पेपर लीक होने के बाद, एक दर्जन से ज्यादा छात्र आत्महत्या कर चुके हैं (ताजा आंकड़ों के मुताबिक 20)। अगर मोदी सरकार ठीक से परीक्षा भी नहीं करवा सकती, तो उसे सत्ता से हट जाना चाहिए!”

हमारे देश में पेपर लीक होना इतना आम है, कि अब हमें इसकी आदत-सी हो गई है। अक्सर तो यह खबर सुर्खियों में भी नहीं आती। लेकिन इस साल नीट पेपर लीक और सीबीएसई क्लास 12 के ऑनलाइन मूल्यांकन में हुई गड़बड़ी ने ऐसी आग भड़काई कि सरकार भी हतप्रभ रह गई। सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी जैसे युवाओं ने अपनी तकनीकी समझ का इस्तेमाल कर सीबीएसई की पोल क्या खोली, आस्था और खुशी जैसे तमाम युवा सड़कों पर उतर आए। ये चारों उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो नरेन्द्र मोदी के दौर में बड़ी हुई है।


सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन करने वाले सिर्फ स्कूली छात्र नहीं हैं। 14 जून को, बीपीएसएससी (बिहार पुलिस सबऑर्डिनेट सर्विसेज कमीशन) के तहत होने वाली मद्य निषेध विभाग की परीक्षा देने वाले उम्मीदवार पटना रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो पता चला कि उनकी ट्रेन लेट है। बार-बार झटका खाते, सिस्टम से निराश अभ्यर्थियों ने नाराज होकर हंगामा और पुलिस पर पथराव किया। प्रयागराज में, छात्रों ने उत्तर प्रदेश लेखपाल भर्ती परीक्षा की गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ विरोध किया और दोबारा परीक्षा कराने की मांग की। 12 जून को, लखनऊ के इको गार्डन में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला।

एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पेपर लीक मामलों में कार्रवाई की मांग को लेकर कई शहरों में प्रदर्शन कर रहे हैं, तो अभिजीत दिपके के नेतृत्व में बनी नई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर मोर्चा जमा रखा है। उनका कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक वे वहां से हटने वाले नहीं।

वे अपनी बात को लेकर इतना स्पष्ट और मुखर हैं कि 22 जून के प्रदर्शन के दौरान एक छात्र ने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, “लोग पूछते हैं कि एक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से क्या होगा? तो मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि एक मंत्री का भी इस्तीफा हो गया, तो बाकी मंत्रियों में डर पैदा होगा।”

जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन में वामपंथी छात्र संगठन, आम आदमी पार्टी की छात्र शाखा, कई मजदूर संगठन और भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) जैसे किसान संगठन शामिल हैं। इसी मेल-जोल का नतीजा है कि यहां ‘मजदूर-छात्र-किसान एकता’ और ‘जल्द ही होने वाले’ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में भी नारे सुनाई दे रहे हैं।


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हमारी बातचीत राउरकेला (ओडिशा) से आए राजा से हुई। वह अपनी मां के साथ आए हैं, जो कैंसर की मरीज हैं। राजा कहते हैं, “मेरे परिवार से किसी ने भी नीट का एग्जाम नहीं दिया है, लेकिन पेपर लीक की वजह से अनेक छात्रों ने आत्महत्या की है। इसीलिए मैं और मेरी मां यहां आए हैं। ... हम दिन में बारह घंटे पढ़ाई करते हैं! धर्मेंद्र प्रधान को अंदाजा भी नहीं है कि बच्चे कितनी मेहनत करते हैं। मेरे हॉस्टल में टीचर मुझसे कपड़े धुलवाते हैं, जूते साफ करवाते हैं। स्कूल में बने रहने के लिए मुझे यह सब करना पड़ता है।”

भीषण गर्मी में जंतर-मंतर पर जमे राजा कहते हैं- “एक दिन मेरी मां बहुत बीमार हो गईं। दिपके और अन्य लोगों ने हमारी मदद की। हम यहां बिछी दरियों पर सोते हैं और सामाजिक कार्यकर्ता जो कुछ लाते हैं, वही खाते हैं।”

यहां कई लोग बतौर स्वयंसेवक भी स्वेच्छा से सक्रिय हैं। प्रदर्शनकारियों के लिए केले लेकर आई दिल्ली की प्रेरणा कहती हैं: “मैं छात्रों के समर्थन में आई हूं, उनकी मांगें जायज हैं।”

मोहम्मद जुनैद गाजियाबाद से आए हैं। वह अपने हिन्दू और सिख मित्रों के साथ यहां खाने-पीने का स्टॉल चला रहे हैं। कहते हैं, “मेरे पास जो कुछ भी था, लेकर जंतर-मंतर पर आ गया। फिर यहां मौजूद लोगों ने मदद करना शुरू कर दिया।” जनैद मुस्कुराते हुए मजरूह सुल्तानपुरी की एक पंक्ति दोहरा देते हैं: “मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।”

इसी साल एलएलबी पूरी करने वाले जुनैद ने पानी की ढेरों बोतलें स्टाल पर जुटा रखी हैं। आने वाले लोग भी अपनी तरफ से जो कुछ हो सकता है, मदद करते हैं। मसलन पेशे से टीचर अमिताभ अपने साथ लाए बिस्कुट जुनैद को देते हैं; और जुनैद उन्हें चाय-पकौड़ों के साथ लोगों में बांटने लगते हैं।

अमिताभ कहते हैं: “ट्रेन हादसा हो या पेपर लीक, कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। नहीं पता कि सीजेपी सफल होगी या नहीं, लेकिन मैं छात्रों के समर्थन में यहां आया हूं।”

खुशी अपनी बहन के साथ 22 जून को जंतर-मंतर पहुंचीं। 11वीं और 12वीं क्लास की ये छात्राएं बेहिचक कहती हैं: “हमें पता है कि भाजपा कैसे जीतती है। हमारी मां भाजपा की नेता हैं। दिल्ली चुनावों के दौरान, उन्हें पैसे मिले थे ताकि पड़ोस के लोगों को पैसे बांटकर उनके वोट लिए जा सकें।”

उनकी बहन बीच में ही बोल पड़ती है: “लोगों को भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए!” दोनों पश्चिमी दिल्ली के शादीपुर की रहने वाली हैं। उन्हें यहां आने के लिए घर वालों से अच्छी-खासी बहस करनी पड़ी। जिसके बाद घर के जरूरी काम निपटाकर वे जंतर-मंतर पहुंचीं थीं।


पाखी और उनकी सहेली 23 जून को पहली बार जंतर-मंतर आईं। दोनों ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज से हाल ही में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। पाखी पूछती हैं, “अगर दुनिया भर के देशों में विरोध-प्रदर्शन बदलाव ला सकता है, तो भारत में क्यों नहीं?”

क्या उन्हें किसी तरह की प्रतिक्रिया या विरोध का डर है? वह कहती हैं: “अप्रैल में, हमारे कॉलेज की प्रिंसिपल का एक वीडियो भाजपा के सोशल मीडिया पेज पर शेयर किया गया था। हमने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया। अगर प्रिंसिपल को अपनी राय रखने का अधिकार है, तो हमें भी है। इसके बाद से अब हमें कोई डर नहीं लगता।”

यहां मौजूद हर कोई समर्थक ही हो, ऐसा नहीं। कुछ उपद्रवी तत्व भी हैं जो घुसपैठ कर, माहौल बिगाड़ने और उकसाने की कोशिश करते हैं। कई बार जब मीडिया के ‘माइक-धारी’ लोग भीड़ में घुसकर उकसावे भरे सवाल पूछने लगते हैं, युवा प्रदर्शनकारियों का समूह उन्हें “गोदी मीडिया वापस जाओ!” जैसे जवाबी नारों के साथ परे धकेलने में पीछे नहीं रहता है।

23 जून की शाम आम्बेडकरवादी युवा इन्फ्लुएंसर निशु के पिता एक हाथापाई में घायल हो गए। निशु ‘वॉइस ऑफ निशु’ नामक इंस्टाग्राम अकाउंट चलाती हैं (जिसके 3,00,000 से ज्यादा फॉलोअर हैं)। निशु अपने पिता के साथ जंतर-मंतर आती-जाती हैं, विरोध प्रदर्शन कवर करती हैं और लोगों से इसमें शामिल होने की अपील भी करती हैं। मानती हैं कि ‘बस इसी वजह से उन पर और उनके पिता पर हमला हुआ’। हालांकि प्रदर्शनकारी जानते हैं कि निशु जैसी इन्फ्लुएंसर ही उनके सच्चे साथी-सहयोगी हैं और उनकी बात दूर तक पहुंचाने में असली मददगार।

जेएनयू छात्र संघ की संयुक्त सचिव दानिश कहती हैं, “पुलिस को ऊपर से आदेश है कि यह आंदोलन किसी भी तरह खत्म किया जाए। इसीलिए कभी पानी की सप्लाई काट दी जाती है, तो कभी बिजली बंद हो जाती है। कभी लोगों को अंदर आने से रोकने के लिए बैरिकेड्स लगा दिए जाते हैं।”


वामपंथी छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा कहती हैं, यह तो होना ही था: “इस सरकार ने दमन और हिंसा की सारी हदें पर कर दी हैं। बेरोजगारी, खोखली होती अर्थव्यवस्था और दलितों, मुसलमानों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर लोगों में भारी निराशा है। विपक्ष को सोचना होगा कि युवाओं के इस गुस्से को किस तरह सही दिशा दी जाए।”

जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के चौथे दिन भीड़ पहले दिन के मुकाबले कम जरूर दिखी, लेकिन लोगों का जोश कम नहीं है। अब भी प्रदर्शन स्थल पर लोगों का आना-जाना दिन भर लगा रहता है। रमेश मीणा राजस्थान के नागौर से और आशु लुधियाना से आए हैं। ऐसे ही अनेक लोग जंतर-मंतर पर दिन-रात डेरा डाले रहते हैं।

मेरी नजर गाजियाबाद के लोनी की रहने वाली एक सत्तर साल की दादी पर पड़ी। पूछा कि क्या उनकी पोतियां उन्हें यहां लेकर आई हैं, तो उन्होंने तत्काल जवाब दिया: “नहीं, मैं उन्हें यहां लेकर आई हूं। यह मेरी जिद थी…बच्चों की खातिर हमें यहां आना ही था।”

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