क्या चीन आ गया है और अब नहीं जाएगा, मोदी सरकार बताए ‘कूटनीतिक बातचीत’ की आड़ में क्या छिपा रही है!

पिछले 50 साल में दो बार भारी खुफिया विफलताएं हुई हैं जब विदेशी शक्तियों ने हमारी सीमा में घुसपैठ किया। पहली बार 1999 में जब पाकिस्तानियों ने कारगिल में घुसपैठ किया और इस बार जब चीनी लद्दाख में घुस आए। दोनों ही अवसरों पर कथित ‘राष्ट्रवादियों’ की सरकार थी।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

संसद में 1962 और 1994 में पारित प्रस्तावों में दोहराया गया कि अक्साई चीन और पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) भारत का अभिन्न अंग है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर भारत ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) को पाकिस्तान के साथ वास्तविक सीमा स्वीकार कर लिया था और चीन के हाथों अक्साई चीन को गंवाने की बात मान ली थी। लेकिन पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अब रक्षा सेवाओं के प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने रणनीतिक बदलाव के संकेत दिए।

इन सभी ने पीओके और अक्साई चीन को वापस लेने का संकल्प जताया। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की घोषणा करने के अगले दिन गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में स्पष्ट तौर पर यह बात कही। इन बयानों ने पाकिस्तान और चीन, दोनों को सतर्क कर दिया। वैसे, विशेषज्ञों ने कहा कि ये बयान भारत की सैन्य क्षमताओं से मेल नहीं खाते। कुछ अन्य लोगों ने प्राथमिकता पर सवाल उठाए। लेकिन जो होना था, वह तो हो चुका था।

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क्या चीन आ गया है और अब नहीं जाएगा, मोदी सरकार बताए ‘कूटनीतिक बातचीत’ की आड़ में क्या छिपा रही है!

जिस दिन भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल और चीनी मेजर जेनरल के बीच लद्दाख में सैन्य स्तर की बात हो रही थी, चीन ने आधिकारिक तौर पर एक वीडियो क्लिप जारी किया। इसे उसी दिन सरकारी प्रसारण सीसीटीवी पर भी प्रसारित किया गया। इस क्लिप में लद्दाख में भारत की सीमा पर हजारों पैराट्रूपर, बख्तरबंद वाहनों और हथियारों की तैनाती के दृश्य थे। इस क्लिप में दावा किया गया कि इस तरह की तैनाती में कुछेक घंटे ही लगे।

खास बात यह है कि सैनिक और वाहन हुबेई से लाए गए थे। यह राज्य केंद्रीय चीन में है जहां पिछले साल के अंतिम महीनों में कोविड-19 फैला था। साउथ चाइना मॉर्नगिं पोस्ट ने विशेषज्ञों के हवाले से दी एक रिपोर्ट में कहा कि इस क्लिप का उद्दे्श्य यह संकेत देना था कि वैश्विक महामारी कोविड-19 ने चीन की सैन्य क्षमता पर कुछ भी असर नहीं डाला है और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पूरी तरह तैयार है।

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सामरिक मामलों और सैन्य मामलों के विशेषज्ञ अजय शुक्ला ने अनिर्णायक बातचीत के बाद ट्वीट किया किः चीन ने लद्दाख और कब्जा किए गए भारतीय क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में बदलाव कर लिया है... और भारत ‘लंबे रास्ते’ और ‘सैन्य और कूटनीतिक बातचीत’ के बारे में बात कर रहा है! अगर इस तरह का दयनीय समर्पण करना था, तो ‘पर्वतारोही आक्रमण सैन्य दल’ को भंग कर देना चाहिए और लद्दाख से बख्तरबंद ब्रिगेड हटा लेना चाहिए।

लद्दाख में चीनी आक्रामकता पर इस कायरतापूर्ण समर्पण को ढंकने के लिए सरकार के पास पत्रकारों को इसे कवर न करने या अभी जारी ‘बातचीत’ पर लिखने को कहने का साहस होना चाहिए था। ऐसा नई स्थिति से सामंजस्य बिठाने में सार्वजनिक मत को सुविधा होती... यह कि चीन आ गया है और अब नहीं जाएगा! यह बात बहुत साफ है।

‘सैन्य और राजनयिक बातचीत’ की आड़ में जो सच्चाई नहीं है, उसे भी स्वीकार करा लेने की सरकार कोशिश कर रही है, जबकि चीन पैर जमा लेगा और नई सीमा को स्थायी बना लेगा। 1962 में सेना ने कम-से-कम एक युद्ध तो लड़ा था और चीन को क्षति भी पहुंची थी। इस बार तो यह घृणित आत्मसमर्पण है।

वैसे, पिछले 50 साल के दौरान दो बार भारी खुफिया विफलताएं हुई हैं, जब विदेशी शक्तियों ने भारत की सीमा में घुसपैठ कर लिया। पहली बार 1999 में जब पाकिस्तानियों ने कारगिल में घुसपैठ किया और इस बार 2020 में जब चीनी लद्दाख में घुस गए। दोनों ही अवसरों पर कथित ‘राष्ट्रवादियों’ की सरकार थी।

लेकिन इसके लिए किसे दोष दिया जाए? वह सरकार, जिसने चीन के साथ ‘अनौपचारिक वार्ताओं’ का दिशाहीन राजनयिक रास्ता अख्तियार किया? या सेना को जो अपनी संख्या तो निरंतर बढ़ा रही थी, लेकिन हतप्रभ रह गई जैसा कि कारगिल में हुआ? या वे ‘राष्ट्रद्रोही पत्रकार’ जो असफलता को सामने ला रहे हैं? वैसे, इसका उत्तर हैः नंबर 3- निश्चित तौर पर।

Published: 12 Jun 2020, 5:05 PM
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