उत्तर प्रदेश चुनाव : जब वोटर को दिया जाए व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान तो कैसे लगे किसी और की नैया पार

"बेचारे मोदी करें भी तो क्या? 70 साल में न सेना को बढ़िया हथियार दिए गए, न सीमाओं तक सड़कें बनाई गईं। पेट्रोल-डीजल के पैसों से ही यह सब जुटाया जा रहा। यह जरूरी है।" उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में जब वोटर वाट्सएप फॉरवर्ड के जरिये मिली इन जानकारियों को सामने रखने लगे कोई भी पस्त हो ही जाएगा।

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दिवाकर / नागेंद्र

उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश का किसान खासा आंदोलित है और माना जा रहा है कि किसान का संघर्ष इस बार चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाएगा। लेकिन क्या पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही है। इसे जानने के लिए दिवाकर ने उत्तर प्रदेशं के गांवों मं जाने की योजना बनाई। लखनऊ पहुंचने पर उन्हें नागेन्द्र का साथ मिला। इन दोनों ने जो देखा-समझा, उससे शायद जमीनी हालात का कुछ अंदाजा मिले। पढ़िए इस दौरे की तीसरी किस्त

तस्करी की आशंका के नाम पर गोवंश के पशुओं की खरीद-बिक्री यूपी में जिस तरह ‘लगभग प्रतिबंधित’ हो गई है और ऐसे में, लोग पालतू पशुओं को जिस तरह छोड़ दे रहे हैं, पहले गांवों में रह चुके हमारे-जैसे लोगों को ऐसा अनुभव नहीं रहा है। हमें लगा कि शायद इस स्थिति की वजह महंगाई हो सकती है।

हम जिस कार से यात्रा कर रहे थे, उसमें सीएनजी लगी थी। गोरखपुर में तो इसकी सप्लाई पाइप से होती है लेकिन बगल के देवरिया, बलिया, गाजीपुर, मऊ वगैरह में पंपों पर सिलिंडर के जरिये इसे भरते हैं जिससे प्रेशर कम होता है और मात्रा कम ही भरी जाती है। इस संयोग का लाभ लेकर हमने कम-से-कम दस पंपों पर तेल-गैस की बिक्री को लेकर पूछताछ की। देश के कई राज्यों में हुए विधानसभा-लोकसभा सीटों के उपचुनावों के रिजल्ट नहीं आए थे और पेट्रोल-डीजल के रेट तब तक कम नहीं हुए थे। सभी पंपों पर सबने यही कहा कि बिक्री में कमी के कोई लक्षण नहीं हैं। रेट बढ़ने-घटने से कमीशन में कमी-बेसी नहीं होती इसलिए हमें कोई अंतर नहीं हो रहा।

लेकिन अन्य लोगों से बात करने पर पता चला कि डीजल की बिक्री कम न होने पर भी उन पर क्या असर हो रहा है। आखिर, सामान ढोने के लिए कमोबेश ट्रक तो उतने ही चल रहे हैं और वे सामान इसलिए भी महंगे हो गए हैं क्योंकि ट्रक भाड़ा बढ़ गया है। लखनऊ में ओला कैब चला रहे अरविंद गुप्ता महंगाई के बारे में चर्चा करने पर यह तक कह गए कि ‘हाल यह है कि सरकार को पता चले कि आपने नया अंडरपैंट पहना है, तो वह भी उतरवा ले।’ कैब ही चलाने वाले कन्नौज के राजू पाल ने भी कहा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से चाहे भाजपा अगले चुनाव में भी बेहतर कर जाए लेकिन लोग यह तो समझ ही गए हैं कि इनलोगों को सरकार चलाने का शऊर नहीं है।

पर लखनऊ में ही ओला कैब चला रहे उन्नाव के अखिलेश पांडे मानने को तैयार ही नहीं थे कि कहीं महंगाई है। उन्होंने कहा कि दीपावली पर शॉपिंग के लिए निकली भीड़ के बाद भी अगर आप महंगाई की बात कर रहे हैं, तो इसका मतलब आप आंखें मूंदे हैं। गाजीपुर में हमारे साथ के एक सज्जन ने आरटीआई के हवाले से मिली जानकारी के आधार पर छपी एक खबर के हवाले से जब कहा कि भारत 15 देशों को 34 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल और 29 देशों को 37 रुपये में डीजल बेच रहा है, तो वहीं खड़े भाजपा किसान मोर्चा के एक नेता बरस ही पड़े, ‘पिछले 70 साल में हम इतना ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर पाए हैं कि हम दो दिनों से अधिक का पेट्रोलियम पदार्थों का भंडारण नहीं कर सकते। इसलिए मजबूरी में हमें यह अन्य देशों को भेजना पड़ता है।’ इस जानकारी का स्रोत पूछने पर उन्होंने कहा कि गूगल सर्फ कर लीजिए। एक अन्य सज्जन ने कहा, ‘बेचारे मोदी करें भी तो क्या? 70 साल में न सेना को बढ़िया हथियार दिए गए, न सीमाओं तक सड़कें बनाई गईं। पेट्रोल-डीजल के पैसों से ही यह सब जुटाया जा रहा। यह जरूरी है।’

आखिर, वाट्सएप फॉरवर्ड के जरिये जुटाई गई इन जानकारियों से कोई भी व्यक्ति पस्त हो ही जाएगा।

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