एसआईआर और मतदाता सूची: डेटाबेस में गड़बड़ियों के लिए किसी ठहराएं दोषी?
चुनाव आयोग का मतदाता डेटाबेस व्यापक है। टेक्नोलॉजी का उपयोग डुप्लिकेट का पता लगाने और अन्य अनियमितताओं को दूर करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि इसका उपयोग हेरफेर के लिए भी किया जा सकता है।

लगभग दो दशकों के चुनाव संचालन के अनुभव वाले पूर्व उप चुनाव आयुक्त नूर मोहम्मद का कहना है कि यदि भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) वास्तव में मतदाता सूची संशोधन की चल रही प्रक्रिया में विश्वास जगाने में रुचि रखता, तो वह और अधिक कर सकता था। उनका यह भी कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय भी कुछ उत्तर मांगकर बेहतर कर सकता था- उदाहरण के लिए, वह आयोग से पूछ सकता था कि बिहार एसआईआर ने वास्तव में क्या हासिल किया है। उनके साथ हुई बातचीत के संपादित अंशः
क्या आप चल रही एसआईआर प्रक्रिया को वोटर लिस्ट से लोगों को हटाए जाने (एक्सक्लूजनरी) वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं? क्या यह नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर रही है?
कानून में 'गहन पुनरीक्षण' के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है। केवल 'विशेष' शब्द जोड़ने से चुनाव आयोग को कानून में उल्लिखित प्रक्रिया से विचलित होने का अधिकार नहीं मिल जाता।
नागरिकों को वोटर लिस्ट से हटाने के जरिये मताधिकार से वंचित किया जा सकता है - या तो किसी कानून के जरिये या ऐसी प्रक्रिया के जरिये जिसमें ऐसे दस्तावेजों की मांग की जाती है जो नागरिकों के पास नहीं होते हैं। लेकिन चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि कोई भी मतदाता छूटे नहीं। इसलिए, यदि एसआईआर के तहत बड़ी संख्या में नागरिक इसलिए मतदान से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वे चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकते, तो यह चुनाव आयोग की ही गलती है कि वह यह सुनिश्चित करने में विफल रहा है कि कोई भी मतदाता छूटे नहीं।
क्या हमें एसआईआर को चुनाव परिणामों में हेरफेर करने के एक तरीके के रूप में देखना चाहिए?
चुनावों में कई तरह से हेरफेर किया जा सकता है। अमेरिका में 'गेरीमैंडरिंग' इसका हालिया उदाहरण है। इसके कई रूप हैं, जैसे निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन; मतदान केन्द्रों के क्षेत्रों का सीमांकन; पक्षपाती जमीनी स्तर के अधिकारियों की तैनाती; या चुनावी अभियानों या राजनीतिक चंदे में हेरफेर की अनुमति देना...
क्या यह संभव है कि टेक्नोलॉजी के उपयोग से शरारतपूर्ण तरीके से नाम हटाने के लिए जगह बन रही हो?
चुनाव आयोग का मतदाता डेटाबेस व्यापक है। टेक्नोलॉजी का उपयोग डुप्लिकेट का पता लगाने और अन्य अनियमितताओं को दूर करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि इसका उपयोग हेरफेर के लिए भी किया जा सकता है। एक ही तस्वीर के साथ कई नाम; मतदाता सूची में विदेशियों की तस्वीरें; या इस तरह की कई प्रविष्टियां - ये केवल केन्द्रीय स्तर पर ही हो सकती हैं। इसकी जांच होनी चाहिए और दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए। डेटाबेस में प्रविष्टियां जोड़ने, हटाने या सुधारने वाले व्यक्तियों का रिकॉर्ड रखने का प्रावधान है। इससे हमेशा पता लगाया जा सकता है कि ऐसी प्रविष्टियां करने के लिए कौन जिम्मेदार है और उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है। क्या किसी को दोषी ठहराया गया है?
चुनाव आयोग मतदाता सूचियों और अन्य आंकड़ों को मशीन रीडेबल प्रारूप में सौंपने में आनाकानी क्यों कर रहा है?
मतदाता सूचियों को मशीन रीडेबल प्रारूप में उपलब्ध न कराने का कोई ठोस कारण नहीं है, और चुनाव आयोग को स्वच्छ मतदाता सूचियों को सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों का सहयोग लेना चाहिए। यही कारण है कि मतदाता सूचियों की प्रतियां राजनीतिक दलों को उपलब्ध कराई जाती हैं ताकि स्वच्छ सूची बनाने में उनका सहयोग लिया जा सके।
मशीन रीडेबल प्रारूप का विश्लेषण करना आसान होगा और इससे सूची को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इससे उन शोध संस्थानों को भी मदद मिलेगी जो आयोग के डेटा तक पहुंच की मांग कर रहे हैं। एआई के युग में, संरक्षित (प्रोटेक्टेड) पीडीएफ फाइलों को खोलने के तरीके खोजना भी संभवहो सकता है।
क्या सर्वोच्च न्यायालय एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, बिहार में चलाए गए अभियान का चुनाव आयोग द्वारा विश्लेषण करने का आदेश दे सकता है?
चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए डेटाबेस से सभी प्रकार की रिपोर्ट तैयार की जा सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय किसी भी रिपोर्ट की मांग कर सकता है। जबकि अनुच्छेद 324(9) चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप न करने का प्रावधान करता है, एसआईआर चुनाव से पहले आता है; यह एक तैयारी प्रक्रिया है, और सर्वोच्च न्यायालय आसानी से स्पष्ट दिशानिर्देश दे सकता था।
न्यायालय चुनाव आयोग से गहन पुनरीक्षण के संबंध में पूर्व प्रथा से हटकर निर्णय लेने के कारणों को भी पूछ सकता था। वह यह भी पूछ सकता था कि एक बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) को नागरिकता सत्यापित करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? वह यह भी पूछ सकता था कि सरकार नागरिकता के प्रमाण के रूप में कौन से दस्तावेज जारी करती है?
चुनाव कराना एक विशेष प्रक्रिया है, और न्याय दिलाने के लिए अदालतों को स्वतंत्र विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ती है।
हालांकि, मेरा मानना है कि एसआईआर के खिलाफ दायर याचिकाएं और अधिक शार्प हो सकती थीं।
क्या विपक्ष द्वारा ईवीएम की संरचना को सार्वजनिक करने की मांग करना उचित है? क्या चुनावों में विश्वास बहाल करने के लिए हमें बैलेट पेपर पर लौटना होगा?
अगर ईवीएम अपनी लोकप्रियता खो रही है, तो पारदर्शिता का इस्तेमाल इसे बचाने के लिए किया जाए। अगर यह कसौटी पर खरी नहीं उतरती, तो इसे बदल दिया जाए।
यह कहना गलत नहीं होगा कि ईवीएम बैलेट पेपर से कहीं बेहतर थे। मेरे ख्याल से, बैलेट पेपर को वापस लाना उलटा असर डालेगा। लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारी ईवीएम इसलिए अनोखी थी क्योंकि मशीन को यह पता नहीं होता था कि किस उम्मीदवार का बटन किस बटन से जुड़ा होगा। साथ ही, उम्मीदवारों के नामांकन के बाद कोई भी इन मशीनों से छेड़छाड़ नहीं करता था। मतपत्रों पर नाम वर्णमाला क्रम में लिखे होते थे और नामांकन से पहले किसी को यह पता नहीं होता था कि किस पार्टी का उम्मीदवार किस सीरियल नंबर पर होगा।
वीवीपैट आने से सब कुछ बदल गया, जिसने उस सरलता को खत्म कर दिया। वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल को यह बताना पड़ता है कि बैलेट यूनिट के किस बटन पर कौन सा उम्मीदवार दिखाई दे रहा है ताकि स्लिप प्रिंट की जा सकें; इस चरण में कोई भी मशीन के साथ छेड़छाड़ कर सकता है।
यह तय था कि संदेह होने पर वीवीपैट पर्चियों की गिनती की जाएगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। कम-से-कम कुछ चुनावों में या जब भी दोबारा गिनती की मांग हो, सभी वीवीपैट पर्चियों की गिनती होनी चाहिए थी। दुर्भाग्य से इसकी अनुमति नहीं दी गई।
एक और समस्या जो सामने आई, वह यह थी कि बैलेट यूनिट से वोट पहले वीवीपैट में जाता है, जो पर्ची छापता है, और फिर स्टोरेज के लिए कंट्रोल यूनिट में जाता है। इसे श्रृंखला में जुड़ाव कहा जाता है। चूंकि नामांकन के बाद उम्मीदवार का डेटा वीवीपैट में दर्ज किया गया था, इसलिए आदेशों में हेरफेर करके एक उम्मीदवार के लिए पर्ची छापना और उसे दूसरे उम्मीदवार के नाम पर संग्रहीत करना संभव है। बेहतर तरीका यह होता कि इन इकाइयों को समानांतर रूप से जोड़ा जाता, ताकि मतदान इकाई से वीवीपैट और नियंत्रण इकाई तक वोट सीधे और एक साथ पहुंच सके। वीवीपैट वाली नई ईवीएम को छेड़छाड़-रोधी साबित करना होगा।
सरकार द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को नियंत्रित करने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?
चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया हमेशा से अपारदर्शी रही है। लेकिन नियुक्त किए गए अधिकांश सदस्यों ने चुनावी प्रक्रिया में सुधार किया। यही कारण है कि भारत के चुनावों को सर्वोत्कृष्ट माना जाता था। नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए सुधारों की आवश्यकता थी और 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद और सरकार को इस दिशा में प्रेरित करते हुए दिशानिर्देश भी जारी किए। दुर्भाग्यवश, सरकार फिर से पुरानी अपारदर्शी प्रणाली पर लौट गई।
[इन परिस्थितियों में] विकल्प सीमित हैं। संसद द्वारा पारित कानून में बदलाव की संभावना कम है क्योंकि वर्तमान सरकार अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
वर्तमान कानून और प्रक्रियाओं के अनुसार, राजनीतिक दलों को मतदाता सूची संशोधन के दौरान बीएलए की नियुक्ति करनी होती है, मतदान केन्द्रों पर मतदान एजेंट तैनात करने होते हैं और सूचियों में सुधार के लिए आयोग को राजनीतिक दलों को मतदाता सूचियों की प्रतियां उपलब्ध करानी होती हैं। ग्राम सभाओं और वार्ड समितियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सूची पढ़कर सुनाएं और आवश्यक जोड़-घटाव करें। क्या इस प्रक्रिया को छोड़ दिया गया है? क्या धांधली रोकने की जिम्मेदारी चुपचाप राजनीतिक दलों और नागरिक समाज पर डाल दी गई है? यदि भारत निर्वाचन आयोग अपनी छवि की परवाह नहीं करता या निष्पक्ष रूप से काम करने को तैयार नहीं है, तो फिलहाल हर कदम पर सतर्कता ही एकमात्र उपाय हो सकता है।
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia