अधौरा के आदिवासियों का जंगल किसने छीना?

जानवरों के रहने का इंतजाम हो रहा, लेकिन वन-आश्रितों का क्या? उन्हें डर है कि अगर यहां टाइगर रिजर्व बना, तो उनका जीवन हमेशा खतरे में रहेगा। आदिवासी कहते हैं कि अगर सरकार हमसे हमारा जंगल छीन लेगी, तो हम खत्म हो जाएंगे। हम जीवित नहीं रह पाएंगे।

अधौरा के आदिवासियों का जंगल किसने छीना?
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श्रीनाथ सिंह खरवार वे दिन याद करते हैं, जब साथियों संग तेंदू (डायोस्पायरोस मेलानोक्सिलोन) के पत्ते तोड़ने अधौरा के घने जंगलों में जाते थे। जंगल की खामोशी जल्द ही उनके साथी आदिवासियों की बातचीत और गीतों से भर जाती। श्रीनाथ कहते हैं, “हम घर से खाना-पानी लेकर जाते। आपस में बातें करते, गाते-बतियाते, तो पूरा जंगल जीवंत हो उठता।”

श्रीनाथ (47) लगभग ढाई दशक पुरानी यादें ताजा कर रहे हैं। हम दोनों अधौरा की पहाड़ियों की ओर जाने वाली बस में साथ बैठे हैं, जो बिहार के दक्षिणी छोर पर कैमूर जिले के मुख्यालय भभुआ से सुबह-सुबह रवाना हुई है। अधिकांश सहयात्री रोजगार के लिए बाहर गए आदिवासी हैं, जो गांव लौट रहे हैं। 

श्रीनाथ भी अपने गांव चनपुरा जा रहे हैं। झारखंड के पतरातू स्थित एक सीमेंट फैक्टरी में काम करते हैं। दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे दूर-दराज के राज्यों की फैक्ट्रियों में काम कर चुके हैं। वह कहते हैं, “दिल्ली या महाराष्ट्र की तुलना में पतरातू से घर जल्दी पहुंचना आसान है।”

श्रीनाथ हमेशा से प्रवासी मजदूर नहीं थे। वह और उनका परिवार, वास्तव में तो अधौरा के लगभग सभी आदिवासी तेंदू पत्ता इकट्ठा करने और अन्य छोटे-मोटे वन उपज पर निर्भर रहते थे। श्रीनाथ बताते हैं, “हममें से हर कोई कम से कम 300 रुपये रोज कमा लेता था। मेरे माता-पिता, मेरा भाई और मैं- सब मिल एक महीने तक पत्ते तोड़ते हुए अच्छी कमाई कर लेते थे।”

सन् 2000 में कैमूर वन्यजीव अभयारण्य घोषित होने के बाद सबकुछ बदल गया। तेंदू पत्ता तोड़ने के अधिकांश ठेके लेने वाला एक व्यापारी बताता है, “तेंदू के 80 प्रतिशत से अधिक पेड़ अभयारण्य क्षेत्र में चले गए,” और इस तरह पेड़ और पत्ते उनकी पहुंच से दूर हो गए।

साल 2000 के बाद राज्य के वन विभाग ने वन उपज इकट्ठा करने और बेचने पर सख्त नियंत्रण लगा दिया। श्रीनाथ कहते हैं, “अभयारण्य बनने के साथ ही तेंदू पत्ते तोड़ने का काम खत्म हो गया।” जून में ठेकेदारों द्वारा तेंदू पत्ते तोड़ने के लिए रखे जाने वाले अधौरा के आदिवासी अचानक बेरोजगार हो गए। पचास तेंदू पत्तों का गट्ठर बनाकर एक रुपये कमाने का उनका जरिया बंद हो गया। तेंदू पत्तों का उपयोग मुख्यतः बीड़ी बनाने में होता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) की धारा 3(1)(सी) अनुसूचित जनजातियों को लघु वन उपज पर स्वामित्व तथा उसके संग्रहण, उपयोग और बिक्री का अधिकार देती है, जिन्हें पारंपरिक रूप से गांव की सीमा के भीतर या बाहर से इकट्ठा किया जाता है। यह अधिनियम ग्राम सभा को जंगल और आसपास रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के अधिकार निर्धारित करने का अधिकार भी देता है। लेकिन लगता है कि अधौरा में एफआरए अस्तित्व में ही नहीं है, जिससे जंगल पर निर्भर हजारों लोगों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है।

बहेरा गांव के सुकऊ सिंह खरवार कहते हैं, “साल के छह से सात महीने हमारी आजीविका वन उपज पर निर्भर रहती थी। हम महुआ, पियार, हर्रे और बहेरा जैसी चीजें इकट्ठा करके बेचते। इसी आय से इलाज करवाते, खाना पकाने के लिए तेल, मसाले और कपड़े खरीदते थे।” सुकऊ (50) कहते हैं, “यहां कोई फैक्ट्री भी तो नहीं है जहां हम काम करने जा सकें।”


बिहार जाति सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार, बिहार में 33 जनजातीय समुदायों की कुल आबादी लगभग 21 लाख है। अविभाजित बिहार में आदिवासियों की संख्या काफी अधिक थी, जिससे उनकी आवाज को पर्याप्त महत्व मिलता था। लेकिन 2000 में झारखंड अलग होने के बाद राज्य में उनकी संख्या काफी कम हो गई और यह भी सही है कि आबादी कम होने के कारण वे राज्य सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहे।

झारखंड में, जहां उनकी संख्या ज्यादा है, राज्य सरकार झारखंड राज्य वन विकास निगम लिमिटेड के जरिये आदिवासियों से लघु वन उत्पाद खरीदती है। इसके अलावा, झारखंड सरकार ने 2023 में सिदो-कान्हु कृषि एवं वन उत्पाद संघ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य वनोपज की ब्रांडिंग और विपणन है। वहां आदिवासियों को वन उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी मिलता है, जबकि बिहार में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। बिहार में सिर्फ दो विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा में एक भी नहीं।

सुकऊ कहते हैं, “चुनाव के समय वन उपज बेचने के लिए सरकारी केन्द्र खोलने के वादे होते हैं, लेकिन चुनाव होते ही सब भूल जाते हैं।”

कैमूर वन्यजीव अभयारण्य (डब्ल्यूएलएस) विंध्य पर्वत शृंखला का हिस्सा है, जिसे कैमूर पर्वतमाला भी कहते हैं। यह पर्वत शृंखला मध्य प्रदेश के कटंगी से शुरू होकर कैमूर होते हुए रोहतास जिले के सासाराम तक जाती है। अभयारण्य में 40 प्रकार के वृक्ष, 45 प्रकार की झाड़ियां और 110 प्रकार की जड़ी-बूटियां और बाघ, तेंदुआ, जंगली सूअर, सांभर, चीतल, चौसिंगा हिरण सहित 16 प्रकार के वन्य जीव और लगभग 100 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं।

करीब 1,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य अधौरा प्रखंड के 100 आदिवासी-बहुल गांवों की जीवनरेखा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि साल 2000 में अभ्यारण्य की घोषणा से पहले तेंदू के 90 प्रतिशत पेड़ इसी क्षेत्र से आते थे। इसके बाद, सबसे पहले तेंदू पत्ता तोड़ना बंद हुआ, फिर अन्य वन उपज और ईंधन की लकड़ी पर भी प्रतिबंध बढ़ते गए।

आज भी आदिवासियों की आजीविका जंगल पर निर्भर है, लेकिन प्रतिबंधों के कारण वे न सिर्फ खुले तौर पर अपनी उपज बेचने से डरते हैं, मजबूरन कम कीमत पर बेच देते हैं। उन्हें भभुआ से 70 किलोमीटर दूर बरकठा के साप्ताहिक इतवारी हाट का इंतजार रहता है, जहां खाने-पीने की चीजों से लेकर घरेलू सामान तक बिकता है, और 6-7 व्यापारी (सभी गैर-आदिवासी) चिरौंजी, महुआ आदि जैसे वन उपज खरीदने आते हैं।

शाहिद अफरीदी (28) ऐसे ही व्यापारी हैं जो हाट में वन उपज खरीदने आते हैं। पहले उनके पिता यह काम करते थे। शाहिद कहते हैं, “आदिवासी अपनी उपज शहरी बाजारों तक नहीं ले जा पाते, क्योंकि वन विभाग की कार्रवाई का डर रहता है और ग्रामीण बाजारों में उचित कीमत नहीं मिलती।” वह बताते हैं कि नियमों की सख्ती से वन उपज की आमद अब काफी कम हो गई है। वह कहते हैं, “पहले मैं यहां से दो गाड़ियां भरकर ले जाता था, लेकिन इस बार केवल एक गाड़ी ही भर पाई।”


साल 2022 में, अधौरा बाजार स्थित अफरीदी की दुकान पर छापा पड़ा और कई क्विंटल महुआ तथा अन्य वन उपज जब्त हुई। इससे व्यापारी भयभीत हुए और कीमतें और नीचे चली गईं।

लाल बिहारी उरांव कहते हैं, “वन अधिकारी हमें महुआ के पेड़ तो दूर, अब लकड़ी भी नहीं छूने देते। हम जंगल में जाएं, तो धमकाते हैं।” लाल बिहारी दिहाड़ी मजदूर हैं और बरकठा हाट में वन उपज पैक करने का काम करते हैं।

श्रीनाथ बताते हैं कि पहले लोग अपनी उपज वहां बेचने ले जाते थे जहां बेहतर दाम मिलता था। कहते हैं, “पहले हम महुआ, पियार, हर्रे और अन्य वन उपज ट्रकों में भरकर गया जिले के शेरघाटी तक ले जाते थे, क्योंकि वहां दाम अच्छा मिलता था।” लेकिन अब यह प्रथा समाप्त हो गई है। ट्रक चालक भी अब फंसने के डर से वन उपज ढोने से डरते हैं। नतीजतन “हमें अपनी उपज चोरी-छिपे बेचनी पड़ती है। महुआ का बाजार भाव 80 रुपये प्रति किलो है, लेकिन हम स्थानीय व्यापारियों को 50 रुपये से भी कम पर बेचने को मजबूर हैं।”

दिसंबर 2025 में, अधौरा प्रखंड के बहेरा गांव का 12 वर्षीय कैर सिंह खरवार अपनी 20 बकरियां चराने जंगल गया तो जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए एक टांगी (कुल्हाड़ी) भी साथ ले गया। शाम को लौटते समय वन विभाग के अधिकारियों ने कैर सिंह को दो थप्पड़ मारकर कुल्हाड़ी जब्त कर ली।

उनके चाचा सुकऊ खरवार बताते हैं, “उसके साथ तीन-चार और लोग भी बकरियां चराकर लौट रहे थे; सबकी टांगियां छीन ली गईं; किसी को दो थप्पड़ मारे गए, तो किसी को चार।” इस घटना से यह परिवार और पूरा गांव अपमान और बेबसी महसूस कर रहा है। उनमें भय, ग़ुस्सा और अनिश्चितता स्पष्ट दिखाई देती है।

सारोदाग गांव के निकट स्थित कोरवा आदिवासी टोले में आधा दर्जन से अधिक मध्यम आयु की औरतों और बुज़ुर्ग महिलाओं ने बताया कि वन विभाग की पाबंदियों ने उनका जीवन दूभर कर दिया है। सब एक स्वर में कहते हैं- वन विभाग के अधिकारी कई बार उनकी कुल्हाड़ियां जब्त कर चुके हैं। एक कुल्हाड़ी की कीमत लगभग 400 रुपये होती है, और वह जलावन की लकड़ी जुटाने तथा आत्मरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

सुकृति कोरवा (35) की कुल्हाड़ी भी वन विभाग ने जब्त कर ली थी। कहती हैं, “उन्होंने हम पर जंगल में पेड़ काटने का आरोप लगाया। अब अगर हम जलावन की लकड़ी नहीं लाएंगे, तो खाना कैसे पकाएंगे?” सुकृति के पति सुरेन्द्र कोरवा (45) प्रवासी मजदूर हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी हैं; जो स्थानीय सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। बिहार में कोरवा आदिवासियों की आबादी मात्र 1,357 है। उन्हें विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। सुकृति ने कहा, “हम सिर्फ जंगल में जाने और वन उपज इकट्ठा करने की आजादी चाहते हैं।”

हालांकि, कैमूर के प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) संजीव रंजन विभागीय सख्ती वाली बात खारिज करते हैं। वह कहते हैं, “वन उपज इकट्ठा करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही आदिवासियों की कुल्हाड़ियां जब्त की जाती हैं। हम केवल उन्हें जंगल में पेड़ काटने से रोकते हैं।”


अधौरा का जंगल अब टाइगर रिजर्व बनने की दिशा में बढ़ रहा है। यहां बाघों की मौजूदगी भी दर्ज हो चुकी है। राज्य में बाघों की संख्या बढ़ने के कारण राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

वर्तमान में बिहार में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व ही एकमात्र बाघ अभयारण्य है। हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला में स्थित यह रिजर्व 1994 में प्रोजेक्ट टाइगर का हिस्सा बना था। इसके बाद, यहां बाघों की संख्या 2006 में 10 से बढ़कर 2022 में 54 हो गई।

एक और टाइगर रिजर्व बनने का मतलब उन जंगलों का और ज्यादा  प्रतिबंधित हो जाना होगा, जिन पर आदिवासियों और अन्य वन समुदायों का जीवन निर्भर है। चिंतित सुकऊ सिंह कहते हैं, “अगर यहां और बाघ लाए गए, तो हम जंगल में कैसे जा पाएंगे? हमारी पूरी जीवन-शैली तबाह हो जाएगी।”

डीएफओ संजीव रंजन का कहना है कि विभाग “केन्द्र सरकार से अंतिम मंजूरी का इंतजार कर रहा है। उसके बाद कैमूर वन्यजीव अभयारण्य को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया जाएगा।”

सुकृति कोरवा इस बात से क्षुब्ध हैं कि जानवरों के रहने की व्यवस्था तो हो रही है, लेकिन वन-आश्रितों की ओर सरकार का ध्यान नहीं है। उन्हें डर है कि अगर यहां टाइगर रिजर्व बना, तो आदिवासियों का जीवन हमेशा खतरे में रहेगा। वह कहती हैं, “हम जंगल में रहने वाले लोग हैं। यहां बाघ होंगे, तो वे हमें ही खा जाएंगे।”

आदिवासी समुदाय वन विभाग द्वारा जंगल में प्रवेश को लेकर बढ़ती सख्ती को अपने अस्तित्व के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखता है।

सांझ ढलने लगती है और जब मैं वापसी की यात्रा के लिए सुकऊ सिंह से विदा लेता हूं, तो वे कहते हैं: “अगर सरकार हमसे हमारा जंगल छीन लेगी, तो हम खत्म हो जाएंगे। हम जीवित नहीं रह पाएंगे।”

(यह रिपोर्ट तक्षशिला-पारी सीनियर फेलोशिप 2025 के तहत प्रकाशित की गई है। साभारः ruralindiaonline.org)