महाराष्ट्र: बीजेपी को क्यों चाहिए राज ठाकरे की बैसाखी और राहुल गांधी की 'शक्ति' से विचलित सत्ता

लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी को महाराष्ट्र में राज ठाकरे के सहारे की जरूरत पड़ रही है, लेकिन सियासी गणित में इससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है। उधर मुंबई में राहुल गांधी की 'शक्ति' ने सत्ता को विचलित कर दिया है।

राज ठाकरे और अमित शाह के बीच पिछले दिनों दिल्ली में मुलाकात हुई थी
राज ठाकरे और अमित शाह के बीच पिछले दिनों दिल्ली में मुलाकात हुई थी
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नवीन कुमार

 महाराष्ट्र में बीजेपी की ऐसी क्या मजबूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिटलर, फेंकू और झूठा कहने वाले राज ठाकरे के साथ लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन करने को तैयार हो गई। महाराष्ट्र में राज ठाकरे उत्तर भारतीय विरोधी चेहरा भी हैं। बीजेपी महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के टूटे हुए धड़ों के साथ सरकार चला रही है और मोदी की गारंटी के बल पर लोकसभा चुनाव में राज्य की 48 में से 45 सीटें जीतने का दावा कर रही है।

दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से राज ठाकरे की मुलाकात के बाद गठबंधन के लिए बातचीत के दौर पर तंज कसते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि 'महाराष्ट्र में मोदी के नाम पर नहीं बल्कि ठाकरे के नाम पर वोट डाले जाते हैं। इसलिए बीजेपी अब शिवसेना के बाद ठाकरे की चोरी कर रही है। लेकिन इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है।'

उद्धव की बात याद दिलाती है कि बाल ठाकरे की पार्टी शिवसेना के साथ बीजेपी का लगभग तीन दशकों तक चुनावी गठबंधन रहा है। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर बीजेपी और शिवसेना की राह अलग हो गई। 2024 के चुनावी समर में ठाकरे ब्रांड के बिना मैदान में उतरने में बीजेपी को पसीने आ रहे हैं, इसलिए बीजेपी ठाकरे ब्रांड अपने साथ करने के लिए राज ठाकरे से समझौता कर रही है।

बीजेपी से गलबहियों में मराठी मानुस का मुद्दा भूली मनसे

वैसे बीजेपी को राज की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की जमीनी हकीकत पता है। बाल ठाकरे के जमाने में ही 2006 में राज ठाकरे शिवसेना से अलग हो गए थे और मनसे पार्टी बना ली थी। 2008 में उत्तर भारतीयों की पिटाई के बाद 2009 में मनसे को राजनीतिक फायदा भी मिला और उसने 13 विधानसभा सीटें जीत ली। मुंबई, ठाणे, कल्याण और नाशिक में भी दबदबा बढ़ा ली। लेकिन इसके बाद मराठी माणुस के बीच राज का ग्राफ गिरता चला गया।

अपनी हैसियत को समझते हुए ही राज ठाकरे 2019 के लोकसभा चुनाव में नहीं उतरे और फिर उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में भी वह एक ही सीट जीत पाई। अब 18 साल बाद मनसे का जनाधार सिकुड़ चुका है।

राज ठाकरे की राजनीति का आधार मराठी माणुस रहा है। लेकिन बीजेपी से मेल-मिलाप के चक्कर में यह मुद्दा गौण हो रहा है। ऐसे में वर्तमान राजनीतिक हवा के हिसाब से राज ने अपनी पार्टी को हिंदुत्व का मुखौटा पहना दिया है। इससे बीजेपी को कोई बहुत राहत नहीं मिलने वाली है, क्योंकि राज का असली चेहरा अब भी उत्तर भारतीय विरोधी ही है।


राज के साथ में उत्तर भारतीयों को कैसे संभालेगी बीजेपी

कल्याण स्टेशन पर यूपी-बिहार के रेलवे परीक्षार्थियों को पीटने और बिहारी ठेले वालों की पिटाई करके राज ने मनसे को चमकाया था। आज भी उत्तर भारतीयों के बीच राज का चेहरा दहशत वाला है। इसका किसी भी चुनाव पर बुरा असर दिख जाता है। यही वजह है कि बीजेपी भी मनसे से दूरी बनाती रही है। लेकिन जब मोदी की बात आती है तो बीजेपी ने अपनी अंदरूनी रणनीति के सहारे सिर्फ उद्धव ठाकरे को हराने के लिए दूसरे ठाकरे से चुनावी गठबंधन करने का मन बना लिया है।

राज से यह दोस्ती बीजेपी को कई मोर्चो पर महंगी पड़ सकती है। उत्तर भारतीयों की नाराजगी मुंबई और महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि यूपी, बिहार और झारखंड में भी देखने को मिल सकती है। मुंबई में ही लगभग 35 लाख यूपी और बिहार के लोग हैं।  मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के चुनाव में भी उत्तर भारतीय बीजेपी को मजा चखा सकते हैं।

इसके अलावा बीजेपी के सत्तारूढ़ साथी खासकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को भी महाराष्ट्र में राज से नुकसान होने का खतरा सता रहा है। बताया जाता है कि राज ने जिन दो लोकसभा सीटों की मांग की है उस पर शिंदे गुट पहले से दावा कर चुका है। मुंबई दक्षिण की सीट है जहां वर्तमान में उद्धव गुट के अरविंद सावंत सांसद हैं। नाशिक और शिर्डी की सीट पर शिंदे गुट के सांसद हैं।

राज आए तो शिंदे का घटेगा कद

बीजेपी पहले ही अपने अंदरूनी सर्वे से दबाव बनाते हुए शिंदे गुट को कम सीटें देने की रणनीति पर काम कर रही है, और अब शिंदे गुट के हिस्से की सीटों में से राज को सीट देने का दबाव बनाया गया है। राज से झटके मिलने पर शिंदे गुट में यह भावना है कि ठाकरे के सामने उसका ओहदा कम हो सकता है, जबकि शिंदे की मदद से ही बीजेपी सत्तारूढ़ हो पाई है।

बीजेपी के साथ जुड़ने के पीछे राज का निजी स्वार्थ भी बताया जा रहा है। पांच साल पहले 91 हजार करोड़ रुपए के कर्ज और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ईडी ने राज से आठ घंटे से ज्यादा देर तक पूछताछ की थी। दादर में कोहिनूर सीटीएनल में राज पार्टनर थे। कोहिनूर सीटीएनएल ने कर्ज लिया था और उसके पेटेंट में गड़बड़ी थी। चर्चा है कि राज औरों की तरह बहती गंगा में हाथ धोते हुए खुद के दाग को मिटाना चाहते हैं।

वहीं बीजेपी भी चाहती है कि दक्षिण मुंबई सीट पर मनसे नेता बाला नांदगांवकर की जगह राज के पुत्र अमित ठाकरे चुनाव लड़ें और उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे को जवाब दें। बीजेपी को लगता है कि राज की वजह से उद्धव के मराठी वोट को बांटा जा सकता है।


अपने ही परिवार में बेगाने अजित पवार

कहते हैं कि राजनीति में महत्वाकांक्षा के आगे रिश्ते मायने नहीं रखता है। अजित पवार मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को लेकर अपने चाचा शरद पवार से बगावत करके बीजेपी के साथ सत्ता में सहभागी बन गए। वैसे तो पवार परिवार ने कभी भी राजनीतिक रूप से पारिवारिक मतभेदों को सामने नहीं रखा है, लेकिन अजित ने जिस तरह से शरद के साथ और उनकी बनाई हुई एनसीपी पार्टी को लेकर ओछी राजनीति की, उससे पवार परिवार बंट गया है और अजित अलग थलग पड़ गए हैं।

अजित के भाई श्रीनिवास पवार और भाभी ने सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना की है। भाई श्रीनिवास ने उन्हें नालायक तक कह दिया। ऐसा महाराष्ट्र के किसी राजनीतिक परिवार में देखने को नहीं मिला है। पवार परिवार में अपनों से बड़े के सम्मान की बात होती है। शरद पवा ने अपनी गरिमा बनाए रखी है। लेकिन अजित बहुत कुछ भूल गए हैं। अब बारामती में अजित के खिलाफ पूरा पवार परिवार खड़ा हो गया है।

शरद की बहन सरोज पाटील ने भी शरद का ही समर्थन किया है। उन्हें विश्वास है कि बारामती में शरद और सुप्रिया को बीजेपी की कोई रणनीति हरा नहीं सकती। क्योंकि, बारामती में इनके काम बोलते हैं। बारामती से अजित अपनी पत्नी सुनेत्रा को मैदान में उतारना चाहते हैं। इससे इस सीट पर ननद-भौजाई के बीच मुकाबला होने की संभावना बन गई हैै। ननद सुप्रिया सुले पहले से ही सांसद हैं। सुप्रिया शरद की बेटी हैं और अपनी यह सीट बचाने के लिए डटी हुई हैं।

बारामती की जंग है असली मुद्दा

बारामती से शरद के वर्चस्व को खत्म करने के लिए बीजेपी पिछले कई चुनावों से मेहनत कर रही है। इस बार बीजेपी यह काम अजित के सहारे करने की जुगत में है। लेकिन लंबे अर्से तक शरद की छाया में रहने वाले अजित के लिए यह काम आसान नहीं है। पारखी शरद की सलाह नहीं मानने से अजित अपने बेटे पार्थ को लोकसभा का चुनाव नहीं जिता पाए थे, तब शरद उनके साथ थे।

वैसे, चाचा शरद के आगे अजित कितने कमजोर हैं यह इससे भी उजागर हुआ है कि वह चुनावी पोस्टर-बैनर में चाचा शरद के फोटो का इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि चुनाव आयोग ने उन्हें पार्टी और पार्टी का चुनाव चिह्न दे दिया है। शरद को अपनी पार्टी का नया नाम और निशान मिला है। अजित को शरद के फोटो इस्तेमाल करने पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है। अब अजित चाचा का फोटो इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। अगर अजित चाचा शरद से अलग अपनी पहचान नहीं बना सकते हैं तो उनके लिए चुनाव में बाजी मारना कठिन काम है।


महाराष्ट्र: बीजेपी को क्यों चाहिए राज ठाकरे की बैसाखी और राहुल गांधी की 'शक्ति' से विचलित सत्ता

राहुल गांधी की 'शक्ति' से विचलित सत्ता

भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन के बाद मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई रैली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से गर्जना की उससे भयभीत बीजेपी को कोई मुद्दा हाथ नहीं लग पाया। आलोचना के लिए 'शक्ति' को मुद्दा बनाने की कोशिश में बीजेपी पिछड़ गई। उसने शक्ति को नारी शक्ति से जोड़ दिया। जबकि राहुल ने नरेंद्र मोदी के पास जो शक्ति है उसकी बात की थी। उन्होंने कहा था, 'यह शक्ति ईडी, सीबीआई और आईटी वाली है। मोदी एक मुखौटा हैं जो वह शक्ति के लिए इस्तेमाल करते हैं।'

राहुल की इस दमदार 'शक्ति' से परेशान बीजेपी इसके अलग ही अर्थ तलाशने लगी। इसी रैली में राहुल ने विपक्ष की एकता की 'शक्ति' का भी प्रदर्शन किया। राहुल ने एक और 'शक्ति' का प्रदर्शन किया जिसका असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। उन्होंने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के स्मारक पर श्रद्धा सुमन अर्पित करके शिवसैनिकों की 'शक्ति' को बीजेपी के खिलाफ उत्प्रेरित किया है।

धारावी के हुनरमंदों की आवाज

मुंबई की झुग्गी बस्ती धारावी पूरे एशिया में मशहूर है जहां कई तरह की संस्कृति जीवित है। इस धारावी के बारे में राहुल गांधी की राय है कि यह कौशल के हुनरमंदों का केंद्र है। यहां ऐसे संसाधन हैं जिसके बल पर चीन से मुकाबला किया जा सकता है। उन्होंने चीन के शेन्जेन शहर का जिक्र करते हुए कहा कि धारावी शेन्जेन से मुकाबला कर सकता है। यहां के बच्चों के लिए बैंक के दरवाजे खोलिए फिर देखिए कैसे ये मेड इन चाइना को हवा में उड़ा देंगे। अब इस धारावी का पुनर्विकास किया जा रहा है। इसका ठेका अडानी ग्रुप को मिला है।

धारावी पुनर्विकास परियोजना प्राइवेट लिमिटेड एक विशेष परियोजना है जो महाराष्ट्र सरकार और अडानी ग्रुप का संयुक्त उद्यम है। यहां डिजिटल सर्वे का काम शुरू हुआ है जिसका विरोध भी हो रहा है। यह डर बना हुआ है कि मूल धारावीकरों को विस्थापित करने की साजिश रची जा रही है। धारावीकरों की मांग है कि सर्वे से पहले कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाए। यह क्षेत्र अभी तक आधिकारिक तौर पर धारावी अनुसूचित क्षेत्र में शामिल नहीं है। पर एक सर्वे करने का दबाव है। रेलवे की ओर से अवैध बस्ती की घोषणा कर देने से लोगों में भय है। रेलवे की जमीन के नए हिस्से को किसी क्षेत्र से जोड़ा नहीं गया है। लेकिन सत्ताधारी नेता लोगों को गुमराह कर रहे हैं। 

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