कैग रिपोर्ट से उजागर होती सरकारी नाकामियों और योजनाओं की खामियों पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

सवाल है कि कैग की रिपोर्ट पर आखिर मीडिया क्यों खामोश रहा और संसद में पेश इन खुलासों पर कोई जन विरोध भी क्यों नहीं नजर आया? किसी ने सरकार से जवाबदेही की मांग तक क्यों नहीं की, जबकि ऐसी ही रिपोर्ट्स पर अतीत में देशव्यापी आंदोलन हो चुके हैं।

सांकेतिक तस्वीर
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ए जे प्रबल

बीते साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर 2025 में नियंत्रक एंव महालेखा परीक्षक यानी कैग ने कई मोर्चों पर केंद्र सरकार की नाकामी को उजागर करतीं, धोखाधड़ी, योजनाओं के प्रबंधन की गड़बड़ी और पैसे के हेरफेर की तमाम रिपोर्ट संसद को सौंपी। हैरानी की बात है कि मुख्यधारा के मीडिया ने मोटे तौर पर इन रिपोर्ट्स को अनदेखा कर दिया और अधिकतर लोगों ने सरकारी तौर पर जीएसटी कलेक्शन, स्वास्थ्य बीमा, आवास योजनाओं और सीधे लाभ हस्तांतरण यानी डीबीटी के घोटालों से मुंह फेरे रखा।

सवाल है कि आखिर मीडिया इस सब पर क्यों खामोश रहा और संसद में पेश इन खुलासों पर कोई जन विरोध भी क्यों नहीं नजर आया? लेकिन मनीलाइफ की प्रबंध संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सुचेता दलाल ने इस बाबत सनसनीखेज रिपोर्ट सामने रखी है। अपने वीडियो पोस्ट में सुचेता दलाल ने इस बात पर हैरानी भी जताई है कि आखिर 2012-13 के मुकाबले अब ऐसा क्या बदल गया है कि किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। याद दिला दें कि 2012-13 में कैग की रिपोर्ट के आधार पर ही कथित 2-जी घोटाले का गूंज देश भर में सुनाई गई थी और देश व्यापी विरोध प्रदर्शनों के बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में तब की यूपीए सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा था।

सत्ता में आई मोदी सरकार का दावा है कि उसने अब तक 34 लाख करोड़ रुपए विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों के सीधे खाते में ट्रांसफर किए हैं और इसके लिए ‘डिजिटल इंडिया’ को माध्यम बनाया गया है। दावा है कि डिजिटल तौर पर इस पैसे को ट्रांसफर किए जाने से बिचौलियों को बीच से हटा दिया गया और इस तरह सरकार ने 2.7 लाख करोड़ से ज्यादा की बचत की। सरकार का यह भी दावा है कि उसने डिलिवरी सिस्टम से भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म कर दिया है। ऐसे दावे करते वक्त पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के 1985 के उस कथित बयान को दोहराना सरकार और बीजेपी नेता नहीं भूलते जिसमें कहा गया था कि सरकार से तरफ से भेजे गए एक रुपए में से सिर्फ 15 पैसे ही असली लाभार्थी तक पहुंचते हैं।

लेकिन इस दौरान एक तथ्य यह भी है कि 2014 के बाद से मोदी सरकार ने सीएजी (कैग) को पूरी तरह पंगु सा बना दिया है। यूं तो कैग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसका जिम्मा सरकार के हर लेनदेन का ऑडिट कर उसमें होने वाली खामियों और गड़बड़ियों को देश के सामने लाना है। लेकिन इसमें सरकार से नजदीकी वाले सेवानिवृत्त अधिकारियों की तैनाती ने इस संस्था की कार्यप्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कैग की रिपोर्ट से सरकार को शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।


परंपरा है कि कैग की रिपोर्ट पर संसद में चर्चा हो और लोकलेखा समिति अपनी चर्चाओं में खामियों पर विमर्श करे। लेकिन ऐसा कुछ भी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आता है।

कैग की ताजा रिपोर्ट्स पर सुचेता दलाल ने अपने वीडियो ब्लॉग और लेख में बताया है कि, पिछले छह हफ़्तों में संसद में पेश की गई कैग रिपोर्टें खासकर चौंकाने वाली हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि 'डिजिटल इंडिया' का आर्किटेक्चर गंभीर खामियों से भरा है और इसने असल में धोखाधड़ी को बढ़ावा दिया है। रिपोर्टों से पता चलता है कि 2012-13 के बाद से असल में कुछ भी नहीं बदला है, फर्जी लाभार्थी भरे पड़े हैं, डिजिटल सिस्टम ने ऐसे फ़ोन नंबर और फर्जी पतों पर रहने वाले लोगों को असली हकदारों की जगह फ़ायदा पहुंचाया है। इतना ही नहीं, 'सिस्टम' ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (स्किल इंडिया) के तहत एक ट्रेनर को यह दावा करने तक का मौका दे दिया कि ट्रेनिंग सेशन "31 फरवरी" को हुए थे।

सुचेता दलाल कहती हैं कि इन रिपोर्ट्स पर खामोशी और किसी भी किस्म की जांच या जवाबदेही की मांग न होना इस बात का संकेत है कि देश ने सरकार की नाकामियों को भी सामान्य ही मान लिया है। सुचेता दलाल के ब्लॉग से कुछ बिंदु उभरकर सामने आते हैं:

  • कैग ने जीएसटी कलेक्शन में 21,695 करोड़ रुपये की गड़बड़ियों का खुलासा किया है, और इसके लिए कमजोर मॉनिटरिंग, अधूरा ऑटोमेशन और अमल में लाने के लिए जरूरी जांच में कमियों को वजह बताया गया है। रिपोर्ट में रिटर्न फाइल करने, टैक्स के भुगतान और इस पर निगरानी रखने से जुड़ी समस्याओं पर भी ज़ोर दिया गया है।

  • डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (सीधे लाभ हस्तांतरण) पर एक परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में असली लाभार्थी को योजना से बाहर करना यानी एक्सक्लूजन, एक ही नाम या नंबर के कई लाभार्थी होना यानी डुप्लीकेशन और कमजोर मॉनिटरिंग मैकेनिज्म पर ज़ोर दिया गया है।

  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (स्किल इंडिया) में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं, जिनमें फर्जी लाभार्थी डेटा, वेरिफाई न हो पाने वाली प्लेसमेंट, कमजोर फाइनेंशियल कंट्रोल और मॉनिटरिंग में सिस्टमैटिक कमियां शामिल हैं। इस योजना में कैग ने ट्रेनिंग, सर्टिफिकेशन और रोजगार के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • केंद्र सरकार की आवास योजनाओं में जरूरत से ज्यादा समय लगना, लागत बढ़ जाना, खराब योजना बनाना और कमजोर ठेकेदारों को काम देने जैसी तमाम खामियां सामने आई है। कैग ने योग्य परिवारों की पहचान में गड़बड़ियों को भी नोट किया, जिसमें कुछ हकदार परिवारों को योजना से बाहर कर दिया गया जबकि अयोग्य लोगों को फायदा पहुंचाया गया।

  • कैग ने अपनी रिपोर्ट में बताया गया कि प्रधानमंत्री कौशल  विकास योजना के जिन लाभार्थियों का ऑडिट किया गया, उनमें से 94-95 प्रतिशत के बैंक अकाउंट फर्जी पाए गए। एक करोड़ उम्मीदवारों के ईमेल और फोन नंबर एक जैसे पाए गए। 61 लाख प्रशिक्षकों यानी ट्रेनर्स के रिकॉर्ड अधूरे पाए गए और लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा किए गए प्लेसमेंट के दावों को बड़े पैमाने पर वेरिफाई नहीं किया जा सका।


ध्यान रहे कि कैग टेस्ट ऑडिट करता है, जो एक सैंपल होता है और यह स्कीम और सरकार के खर्च की पूरी जांच नहीं होती। कैग की रिपोर्ट भी पहले सरकारी एजेंसियों को कमेंट्स और स्पष्टीकरण के लिए दी जाती हैं और पब्लिश रिपोर्ट में सिर्फ़ वही बातें शामिल की जाती हैं जिनका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलता है।

सुचेता दलाल की पूरी रिपोर्ट नीचे दिए वीडियो लिंक में देखी जा सकती है।

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