मोदी द्वारा श्रीधर वेम्बू की सार्वजनिक तारीफ़ के बाद ज़ोहो फिर से चर्चा के केंद्र में क्यों?
केंद्र सरकार का ज़ोहो को अपनाना, सिर्फ़ टेक्नोलॉजी खरीदने के फ़ैसले से कहीं ज़्यादा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमवार (22 जून, 2026) को एक कार्यक्रम में ज़ोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बु की सार्वजनिक रूप से तारीफ़ किए जाने के बाद, इस कंपनी को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरु हो गई है। ज़ोहो एक टेक्नॉल़जी कंपनी है। पीएम द्वारा की गई है जब कुछ ही महीने पहले केंद्र सरकार ने ज़रूरी सरकारी कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ज़ोहो पर तेज़ी से निर्भरता बढ़ाई है। पीएम के ताजा बयान के बाद ज़ोहो डिजिटल संप्रभुता, डेटा सुरक्षा और सरकारी कामकाज में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका पर चल रही व्यापक बहस के केंद्र में आ गई है। आलोचकों का कहना है कि इस बदलाव से कुछ मुश्किल सवाल भी उठते हैं—मसलन क्या संवेदनशील सरकारी कम्युनिकेशन को संभालने के लिए भारत के अपने सरकारी टेक्नोलॉजी संस्थानों को दरकिनार करके किसी प्राइवेट वेंडर को प्राथमिकता दी गई है?
सरकार की ज़ोहो पर बढ़ती निर्भरता से इसके फाउंडर, श्रीधर वेम्बू की अहमियत में भी इजाफा हुआ है। वेम्बू लंबे समय से देश में ही टेक्नोलॉजी विकसित करने की वकालत करते रहे हैं। उनका कहना है कि भारत को विदेशी सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए और देश में ही इनके विकल्प तैयार करने चाहिए। भारतीय टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट बनाने और विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम करने पर वेम्बू का ज़ोर सरकार के 'डिजिटल संप्रभुता' के एजेंडे से काफी मेल खाता है। सरकारी सिस्टम में ज़ोहो की भूमिका बढ़ने के साथ ही यह तालमेल और भी साफ़ तौर पर दिखाई देने लगा है।
जैसे-जैसे सरकारी सिस्टम में ज़ोहो की भूमिका बढ़ी है, लोगों का ध्यान वेम्बू के सार्वजनिक विचारों पर भी गया है। उनके विचार अक्सर स्वदेशी टेक्नोलॉजी, आत्मनिर्भरता और आर्थिक राष्ट्रवाद पर सरकार के ज़ोर से मेल खाते हैं। आरएसएस के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी और तमिलनाडु की राजनीति पर उनकी टिप्पणियों से यह धारणा बनी है कि ज़ोहो का विकास सत्ताधारी व्यवस्था के साथ एक व्यापक वैचारिक तालमेल के साथ हो रहा है।
वेम्बू ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद में भी काम किया है। ऐसे में सरकारी सिस्टम में उनकी कंपनी की बढ़ती मौजूदगी ने कुछ हलकों में सवाल खड़े किए हैं कि नीति प्राथमिकताओं और एक ही टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर की कमर्शियल सफलता के बीच कितनी नज़दीकी है। हालांकि, किसी भी तरह की गड़बड़ी का कोई संकेत नहीं है, लेकिन ज़ोहो की सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर में बढ़ती भूमिका के कारण इस बात पर ध्यान गया है।
फिर भी, ज़ोहो की बढ़ती अहमियत के साथ-साथ उस पर कड़ी नज़र भी रखी जाने लगी है।
चिंताओं का एक मुख्य पहलू यह है कि सरकार के ज़रूरी कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर का कंट्रोल एक प्राइवेट कंपनी के पास है। हालांकि अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ज़ोहो एक भारतीय कंपनी है और डेटा देश के अंदर ही रहता है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि डिजिटल संप्रभुता का मतलब सिर्फ़ विदेशी प्रोवाइडर्स की जगह घरेलू प्रोवाइडर्स को लाना नहीं है। उनका कहना है कि बड़ा मुद्दा यह है कि क्या ज़रूरी सरकारी सिस्टम किसी एक प्राइवेट वेंडर पर निर्भर होने चाहिए।
शॉर्टलिस्ट किए गए वेंडर्स और सरकारी यूज़र्स के साथ 'प्रूफ-ऑफ-कांसेप्ट' मूल्यांकन वाली प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के बाद ज़ोहो को चुना गया। सरकारी ईमेल अकाउंट्स को माइग्रेट करने का काम 2024-25 में शुरू हुआ और विभिन्न मंत्रालयों व विभागों में इसमें तेज़ी आई।
कुछ लोगों ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि इस माइग्रेशन से नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) की क्षमताओं के बारे में क्या पता चलता है, जो दशकों से सरकार के टेक्नोलॉजी सिस्टम की रीढ़ रहा है। लाखों सरकारी ईमेल अकाउंट्स को NIC द्वारा मैनेज किए जाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर से हटाकर एक प्राइवेट प्लेटफ़ॉर्म पर ले जाने के फ़ैसले ने इस बहस को हवा दी है कि क्या सरकार देश की अपनी टेक्नोलॉजी क्षमता को मज़बूत कर रही है या फिर एक ऐसे अहम काम को आउटसोर्स कर रही है जिसे सरकारी संस्थाओं को खुद करना चाहिए।
ज़ोहो के कुछ प्रोडक्ट्स को लेकर प्राइवेसी और सिक्योरिटी से जुड़ी चिंताएं भी सामने आई हैं। कंपनी के मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म, 'अरट्टई' (Arattai) की आलोचना तब हुई थी जब यूज़र्स ने बताया था कि कुछ कम्युनिकेशन फ़ीचर्स में डिफ़ॉल्ट एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन की सुविधा नहीं है। हालांकि वेम्बू ने कहा है कि ज़ोहो का बिज़नेस मॉडल यूज़र डेटा से पैसे कमाने पर निर्भर नहीं है और उन्होंने बेहतर एन्क्रिप्शन क्षमताएं देने का वादा भी किया है, लेकिन इस घटना ने यह साफ़ कर दिया है कि सरकारी सिस्टम में कंपनी की बढ़ती भूमिका के साथ-साथ उस पर कड़ी निगरानी भी रखी जाएगी।
'द वायर' के लिए लिखे एक कॉलम में पूर्व आईएएस अधिकारी के बी एस सिद्धू ने यह तर्क दिया है कि जब बड़े पैमाने पर सरकारी बातचीत या सूचनाओं को किसी प्राइवेट प्लेटफ़ॉर्म को सौंपा जाए, तो उससे पहले स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए गए सुरक्षा फ़्रेमवर्क, मज़बूत एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था का होना ज़रूरी है। ये चिंताएं तब और भी अहम हो जाती हैं जब बातचीत में कैबिनेट के दस्तावेज़, नीतिगत विचार-विमर्श और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पत्र-व्यवहार शामिल हों।
सरकार का कहना है कि माइग्रेशन के दौरान एनआईसी (NIC) और सीईआरटी-इन (CERT-In) जैसी एजेंसियों ने व्यापक सुरक्षा जांच की थी और ज़ोहो के सिस्टम का नियमित ऑडिट किया जाता है। फिर भी, चूंकि सरकारी कामकाज का एक बड़ा हिस्सा निजी तौर पर मैनेज किए जाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए हो रहा है, इसलिए पारदर्शिता, जवाबदेही, मज़बूती और वेंडर पर निर्भरता से जुड़े सवाल शायद ही खत्म हों।
इसलिए, केंद्र सरकार का ज़ोहो को अपनाना सिर्फ़ टेक्नोलॉजी खरीदने के फ़ैसले से कहीं ज़्यादा है। यह भारत के डिजिटल भविष्य को बनाने के तरीके के बारे में एक व्यापक नीतिगत फ़ैसले को दिखाता है: चाहे वह सरकारी प्लेटफ़ॉर्म को मज़बूत करके हो, घरेलू प्राइवेट कंपनियों के साथ साझेदारी करके हो, या फिर दोनों के मेल से हो।
मोदी के वेम्बू का समर्थन करने से उस कंपनी पर ध्यान और बढ़ गया है जो टेक्नोलॉजी पॉलिसी, राष्ट्रीय सुरक्षा और इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी के बीच एक अहम जगह रखती है। समर्थकों के लिए, ज़ोहो इस बात का सबूत है कि भारतीय कंपनियां वर्ल्ड-क्लास डिजिटल प्रोडक्ट बना सकती हैं। वहीं, आलोचकों के लिए इसकी तेज़ी से बढ़ती कामयाबी कई अहम सवाल भी खड़े करती है - जैसे कि निगरानी, पावर का एक जगह जमा होना और यह कि देश के ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राइवेट टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स पर कितना निर्भर होना चाहिए।
जैसे-जैसे सरकार घरेलू डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बढ़ा रही है, ज़ोहो की सफलता की कहानी अब सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर तक सीमित नहीं रह गई है। यह इस बात का एक उदाहरण बन गई है कि भारत अपने डिजिटल सिस्टम के प्रबंधन में आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और जवाबदेही के बीच कैसे संतुलन बनाता है।
